प्रकाश मेहरा
विशेष डेस्क
नई दिल्ली। सिख धर्म के सबसे पवित्र स्थल स्वर्ण मंदिर के निर्माण की कहानी आस्था, धैर्य और दूरदर्शिता का अद्भुत उदाहरण है। पंजाब के अमृतसर में स्थित यह पवित्र गुरुद्वारा दुनिया भर के सिखों के लिए आध्यात्मिक केंद्र है। लेकिन इस महान धरोहर की शुरुआत कई शताब्दियों पहले सिखों के तीसरे गुरु गुरु अमर दास की सोच से हुई थी।
शांत वातावरण में चुनी गई पवित्र जगह
इतिहास के अनुसार गुरु अमर दास ने एक ऐसे स्थान की तलाश की, जहां आध्यात्मिक साधना के लिए शांति और पवित्रता का वातावरण हो। उन्होंने पंजाब के एक शांत और प्राकृतिक क्षेत्र को चुना, जो आगे चलकर अमृतसर शहर के रूप में विकसित हुआ। यही स्थान बाद में सिख धर्म के सबसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थल का केंद्र बना।
गुरु राम दास ने आगे बढ़ाया निर्माण कार्य
गुरु अमर दास की इस योजना को उनके उत्तराधिकारी और चौथे सिख गुरु गुरु राम दास ने आगे बढ़ाया। उन्होंने यहां एक पवित्र सरोवर की खुदाई शुरू करवाई, जिसे बाद में अमृत सरोवर के नाम से जाना गया। इसी सरोवर के कारण इस क्षेत्र का नाम अमृतसर पड़ा।
गुरु अर्जन देव ने बनवाया हरमंदिर साहिब
स्वर्ण मंदिर के वास्तविक निर्माण का कार्य सिखों के पांचवें गुरु गुरु अर्जन देव के समय पूरा हुआ। उन्होंने सरोवर के बीच में हरमंदिर साहिब का निर्माण कराया, जिसे इस तरह बनाया गया कि चारों दिशाओं से इसमें प्रवेश किया जा सके। इसका प्रतीकात्मक अर्थ यह था कि यह स्थान सभी धर्मों और समुदायों के लिए खुला है।
बाद में स्वर्ण से मढ़ा गया मंदिर
समय के साथ यह पवित्र स्थल सिख आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बन गया। 19वीं शताब्दी में सिख साम्राज्य के संस्थापक महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के ऊपरी हिस्से को सोने से मढ़वाया, जिसके बाद यह “स्वर्ण मंदिर” के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
आज विश्वभर के श्रद्धालुओं का केंद्र
आज स्वर्ण मंदिर न केवल सिख धर्म का सबसे पवित्र स्थल है, बल्कि यह दुनिया भर के लोगों के लिए आध्यात्मिक शांति और मानवता का प्रतीक भी है। यहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु माथा टेकने आते हैं और गुरुद्वारे में चलने वाले लंगर में बिना किसी भेदभाव के भोजन करते हैं।इस प्रकार, गुरु अमर दास द्वारा चुनी गई एक शांत जगह से शुरू हुई यह यात्रा आज मानवता, सेवा और समानता का वैश्विक प्रतीक बन चुकी है।







