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Home राजनीति

पश्चिम बंगाल चुनाव : जहां वोट सबसे ज़्यादा कटे, वहीं रिकॉर्ड मतदान; क्या हैं इसके मायने?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
April 26, 2026
in राजनीति, राज्य, विशेष
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west bengal election
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प्रकाश मेहरा
विशेष रिपोर्ट


कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण में रिकॉर्ड मतदान ने राजनीतिक विश्लेषकों और चुनावी विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है। Election Commission of India द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, इस चरण में 92.88% वोटिंग दर्ज की गई—जो राज्य के इतिहास में अब तक का सबसे अधिक मतदान है। दिलचस्प बात यह है कि जिन क्षेत्रों में मतदाता सूची (SIR प्रक्रिया) के दौरान सबसे अधिक नाम हटाए गए थे, वहीं सबसे ज़्यादा मतदान दर्ज हुआ।

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रिकॉर्ड तोड़ मतदान, पुराना रिकॉर्ड ध्वस्त

इससे पहले 2011 के विधानसभा चुनाव में 84.72% मतदान हुआ था, जिसे लंबे समय तक रिकॉर्ड माना जाता रहा। उसी चुनाव में ममता बनर्जी ने 34 वर्षों से सत्ता में रही लेफ्ट फ्रंट सरकार को हटाकर राज्य की सत्ता संभाली थी। लेकिन 2026 में मतदान का आंकड़ा उस रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ गया है।

भीषण गर्मी के बावजूद भारी उत्साह

मतदान के दिन तापमान कई जगहों पर 41°C के पार था, फिर भी सुबह से ही मतदान केंद्रों पर लंबी कतारें देखने को मिलीं। वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक प्रकाश मेहरा के अनुसार, “आमतौर पर दोपहर बाद भीड़ बढ़ती है, लेकिन इस बार सुबह से ही लगातार वोटरों की संख्या बढ़ती रही—जो असाधारण है।” नंदीग्राम जैसे संवेदनशील और हिंसा-प्रभावित क्षेत्रों में भी इस बार शांतिपूर्ण और उत्साहपूर्ण मतदान दर्ज किया गया, जो एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

कहां कितना मतदान हुआ ?

कई विधानसभा क्षेत्रों में 95% से अधिक मतदान हुआ, खासकर मुस्लिम बहुल इलाकों में:

  • शीतलकुची – 97.53%
  • भगवानगोला – 96.95%
  • जंगीपुर – 95.72%
  • चोपड़ा – 96.02%
  • हेमताबाद – 96.40%

वहीं डोमकल (96.43%), रेजीनगर (92.17%) और कुमारगंज (95.87%) जैसे क्षेत्रों में भी, शुरुआती गड़बड़ियों के बावजूद, उच्च मतदान दर्ज किया गया। पश्चिम मेदिनीपुर, झाड़ग्राम, जलपाईगुड़ी और पुरुलिया जैसे जिलों में भी अधिकांश सीटों पर 90% से अधिक वोटिंग हुई।

इस चुनाव से पहले मतदाता सूची संशोधन (SIR) को लेकर बड़ा विवाद रहा, जिसमें करीब 91 लाख नाम हटाए गए। इससे आम मतदाताओं में डर और असमंजस का माहौल बन गया। कई लोगों को यह आशंका थी कि अगर उन्होंने इस बार वोट नहीं डाला, तो भविष्य में उनकी नागरिकता या मतदाता पहचान पर सवाल उठ सकते हैं। इसी वजह से बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर भी अपने गृह क्षेत्रों में लौटे और मतदान किया।

जहां नाम कटे, वहां मतदान क्यों बढ़ा ?

आंकड़े बताते हैं कि जिन इलाकों में नाम हटाने की दर अधिक थी—जैसे मुर्शिदाबाद, मालदा, बीरभूम और उत्तर दिनाजपुर—वहीं मतदान प्रतिशत भी सबसे ज्यादा रहा। यह संकेत देता है कि मतदाताओं ने अपने अधिकार को बचाने के लिए सक्रिय रूप से भागीदारी की।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं ?

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त S. Y. कुरैशी का मानना है कि इस रिकॉर्ड मतदान को पूरी तरह असाधारण मानना सही नहीं होगा। उनके अनुसार “पश्चिम बंगाल हमेशा से उच्च मतदान वाला राज्य रहा है। अगर 91 लाख नाम हटाए गए हैं, तो संशोधित सूची के आधार पर प्रतिशत स्वाभाविक रूप से ज्यादा दिखाई देगा।”

हालांकि वे यह भी मानते हैं कि डर के कारण कुछ लोग विशेष रूप से वोट डालने लौटे, लेकिन वास्तविक वृद्धि संभवतः 2% के आसपास ही होती अगर पुरानी सूची लागू रहती।

राजनीतिक संकेत क्या हैं ?

भारतीय चुनावी इतिहास में आमतौर पर उच्च मतदान को सत्ता विरोधी लहर (anti-incumbency) से जोड़ा जाता है। लेकिन कुरैशी इस चुनाव में इस तर्क को पूरी तरह लागू नहीं मानते। दिलचस्प रूप से, जिन जिलों—जैसे पुरुलिया, कलिम्पोंग और झाड़ग्राम—में SIR के दौरान कम नाम हटाए गए, वहां मतदान प्रतिशत राज्य के औसत से कम रहा। कलिम्पोंग में सबसे कम, लगभग 83% मतदान दर्ज किया गया।

पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 का पहला चरण कई मायनों में ऐतिहासिक रहा। रिकॉर्ड मतदान। शांतिपूर्ण चुनावी माहौल। SIR प्रक्रिया के कारण मतदाताओं की बढ़ी सक्रियता। ये सभी संकेत देते हैं कि इस बार चुनाव सिर्फ राजनीतिक मुकाबला नहीं, बल्कि मतदाता पहचान और अधिकारों की रक्षा का भी मुद्दा बन गया है। आने वाले चरणों में यह रुझान जारी रहता है या नहीं, यह देखना दिलचस्प होगा—क्योंकि यही तय करेगा कि यह रिकॉर्ड मतदान सत्ता परिवर्तन का संकेत है या सिर्फ एक सांख्यिकीय उछाल।

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