नई दिल्ली। बांग्लादेश में आम चुनावों के बाद लोकतांत्रिक सरकार की वापसी से जिस अमन और बहुलवाद की उम्मीद जताई जा रही थी, उस पर एक बार फिर कट्टरपंथी ताकतों ने पानी फेरना शुरू कर दिया है. ताजा जानकारी के मुताबिक, बांग्लादेश के गाइबांधा जिले के पलाशबाड़ी में स्थित एक बेहद भव्य और ऐतिहासिक सनातन धार्मिक परिसर को निशाना बनाकर कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों ने एक बड़ा अभियान छेड़ दिया है. जो मामला शुरुआत में एक स्थानीय विवाद लग रहा था, वह अब हिंदू धार्मिक प्रतीकों और आस्था के केंद्रों के खिलाफ एक राष्ट्रव्यापी वैचारिक और सांप्रदायिक आंदोलन का रूप ले चुका है.
देश की सबसे ऊंची कृष्ण प्रतिमा और शिव-राम मंदिर निशाने पर
बता दें कि ये पूरा विवाद हुसैनपुर यूनियन के रामचंद्रपुर गांव में स्थित एक विशाल धार्मिक परिसर को लेकर है, जो देश-विदेश के श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आस्था का बड़ा केंद्र बन चुका है. इस परिसर की सबसे बड़ी खासियत भगवान कृष्ण की लगभग 50 फीट ऊंची भव्य काली प्रतिमा है, जिसका औपचारिक उद्घाटन 25 नवंबर, 2025 को राजशाही में भारत के सहायक उच्चायुक्त मनोज कुमार ने किया था.
मंदिर समिति के केयरटेकर हरिदास बाबू की देखरेख में चल रहे इस प्रोजेक्ट के तहत परिसर में भगवान राम और भगवान शिव सहित विभिन्न हिंदू देवी-देवताओं की 144 अलग-अलग मूर्तियां और कलाकृतियां स्थापित की जानी हैं. लेकिन अब चरमपंथी इस भव्य कलात्मक और धार्मिक विरासत को नष्ट करने पर अड़ गए हैं.
गजवा-ए-हिंद की गूंज
इस विवाद को हवा देने के लिए पाकिस्तान और तुर्किये समर्थक ऑनलाइन एक्टिविस्ट्स के एक बड़े नेटवर्क का इस्तेमाल किया जा रहा है. सोशल मीडिया पर बिना किसी ठोस सबूत के यह अफवाह फैलाई जा रही है कि इस मंदिर को भारत की खुफिया एजेंसी RAW से फंडिंग मिल रही है. फ्रांस और अमेरिका जैसी विदेशी जमीनों से चलाए जा रहे इस डिजिटल प्रोपेगेंडा के जरिए बांग्लादेशी मुस्लिमों को भारत के खिलाफ जिहाद छेड़ने, गजवा-ए-हिंद को हकीकत में बदलने और हिंदुओं का बड़े पैमाने पर कत्लेआम (नरसंहार) शुरू करने के लिए उकसाया जा रहा है. यही नेटवर्क इससे पहले इस्कॉन (ISKCON) के खिलाफ नफरत फैलाने और हिंदू साधु चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी में मुख्य भूमिका निभा चुका है.
हिफाजत-ए-इस्लाम की एंट्री
ये ऑनलाइन नफरत का खेल तब और खतरनाक हो गया, जब जमीनी स्तर पर कट्टरपंथी संगठन ‘हिफाजत-ए-इस्लाम’ ने भी इस मंदिर को गिराने की मांग का खुला समर्थन कर दिया. संगठन के बड़े नेता केफायतुल्लाह अजहरी और मौलाना मामूनुल हक ने इस अभियान की कमान संभाल ली है, जिससे मैदानी स्तर पर टकराव और सांप्रदायिक तनाव का माहौल बन गया है.
मौलाना मामूनुल हक के तार कथित तौर पर ईरान के प्रॉक्सी संगठन हमास से जुड़े होने की बात कही जाती है, वहीं केफायतुल्लाह अजहरी को पूर्व में मिस्र के ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ से संबंधों के आरोप में गिरफ्तार किया जा चुका है. शेख हसीना के शासनकाल के दौरान अजहरी पर पाकिस्तान और तुर्किये से हवाला के जरिए 132 करोड़ टका मंगाने और मदरसों को जिहादी ट्रेनिंग सेंटर में बदलने का आरोप लगा था, लेकिन तत्कालीन खुफिया प्रमुख (NSI) मेजर जनरल टीएम जुबायर ने भारी रिश्वत लेकर उनकी गिरफ्तारी रुकवा दी थी.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह हमला सिर्फ किसी एक हिंदू मंदिर पर नहीं, बल्कि बांग्लादेश के उस धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताने-बाने पर है जिसकी गारंटी उसका संविधान देता है. अगर समय रहते इन चरमपंथियों और नफरत के सौदागरों पर सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं की गई, तो बांग्लादेश एक बार फिर सांप्रदायिक हिंसा के उस खतरनाक दलदल में धंस जाएगा जहां से निकलना नामुमकिन होगा. जानकारों का कहना है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय हिंदुओं और उनके पूजास्थलों की सुरक्षा के लिए बांग्लादेशी प्रशासन पर कड़ा दबाव नहीं बनाता, तब तक यह अंदेशा सच साबित हो सकता है कि बांग्लादेश अल्पसंख्यक हिंदुओं के लिए किसी कत्लगाह में तब्दील हो जाए.







