प्रकाश मेहरा
एग्जीक्यूटिव एडिटर
नई दिल्ली। छात्र आंदोलन के दौरान गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए ऐसे विद्यार्थियों को, जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होने के आधार पर छात्रों के खिलाफ कठोर या दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कथित ज्यादतियों और बल प्रयोग के आरोपों की निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए, ताकि पूरे मामले की सच्चाई सामने आ सके और यदि किसी स्तर पर अधिकारों का उल्लंघन हुआ है तो उसकी जवाबदेही तय की जा सके।
राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साथ ही सभी संबंधित राज्यों को निर्देश दिया गया है कि जांच से जुड़े सभी सीसीटीवी फुटेज, वीडियो रिकॉर्डिंग और अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्यों को सुरक्षित रखा जाए, ताकि जांच प्रक्रिया प्रभावित न हो।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार को पहले से दर्ज एफआईआर की जांच जारी रखने की अनुमति दी है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच के दौरान प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ किसी प्रकार की दंडात्मक, जबरन या कठोर कार्रवाई नहीं की जाएगी।
छात्रों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा
अदालत ने अपने आदेश में यह भी साफ किया कि यह राहत केवल उन विद्यार्थियों को मिलेगी जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। जिन लोगों के खिलाफ पहले से आपराधिक मामले दर्ज हैं या जिनकी भूमिका गंभीर आपराधिक गतिविधियों में पाई जाती है, उन पर यह राहत स्वतः लागू नहीं होगी। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्पक्ष जांच और छात्रों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा पर विशेष जोर दिया है। मामले की अगली सुनवाई में संबंधित राज्यों से जवाब मिलने के बाद अदालत आगे की कार्यवाही करेगी।







