सतीश मुखिया
मथुरा: हम सब लोग कुछ दिन बाद 15 अगस्त पर स्वतंत्रता दिवस मना रहे होंगे और आजादी की खुशी प्रदर्शित करते हुए पंचायत स्तर से लेकर के लाल किले की प्राचीर तक लच्छेदार भाषणों के द्वारा एक बार फिर से भारत को विकसित भारत बनाने का संकल्प दोहराएंगे लेकिन आज भी भारत के गांव और पंचायतें अपनी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। हमारा सबका साथ, सबका विकास लक्ष्य जब तक हासिल नहीं होगा जब तक हम समाज के अंतिम पायदान पर खड़े हुए व्यक्ति तक उसकी मूल जरूरत की हर चीज ना पहुँचा पाए।मिशन अंतोदय के नायक पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भी कहा कि अंतिम व्यक्ति का विकास ही मेरा लक्ष्य है और उस विकास यात्रा में शामिल होने के लिए लोकतंत्र बचा रहना चाहिए और उसे लोकतंत्र की मौजूद कड़ी है चुनाव।
त्रिस्तरीय पंचायत राज व्यवस्था को मजबूत करने हेतु देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने एक सपना देखा और उन्होंने कहा कि जब तक गांव का विकास नहीं होगा देश का विकास नहीं होगा और इसी कड़ी को आगे बढ़ते हुए भारत के अंदर विभिन्न राज्यों में समय-समय पर पंचायत राज व्यवस्था के तहत पंचायत चुनाव कराए जाते हैं लेकिन हाल ही के दिनों में देखने में आ रहा है कि पंचायत चुनाव हार 5 वर्ष में हो जाना चाहिए लेकिन राज्यों में पंचायत चुनाव अपने समय पर नहीं हो पा रहे हैं इसके विभिन्न कारण नजर आते हैं।
वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा पंचायत में महिला सशक्तिकरण को लेकर के विभिन्न कार्य कराए जा रहे हैं और महिलाओं को पंचायत राज व्यवस्था में 50% आरक्षण देकर उनके जीवन स्तर को सुधारने हेतु एक अहम पहल की गई है और उसी कड़ी में आज पिछड़ों की स्थिति को सुधारने हेतु पंचायत राज व्यवस्था में उनको आरक्षण देने हेतु विभिन्न आयोग का गठन करके उनकी वास्तविक स्थिति का पता कराया जा रहा है लेकिन मूल सवाल यह है कि जब चुनाव समय से नहीं होंगे तब गांव में रहने वाली आम जनता की अधिकारों का क्या होगा इस पर कोई बात करने को तैयार नहीं है।
ग्रामीण प्रवेश में प्रधान के पद का अपना एक महत्व है जो कि गांव का प्रमुख व्यक्ति होता है हम बोलचाल में हिंदी भाषा बेल्ट में उत्तर प्रदेश में प्रधान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान में सरपंच और बिहार, झारखंड में आज भी मुखिया का पद बना हुआ है। प्रधान कोई आम व्यक्ति नहीं है प्रधान जिसकी समझ में प्रतिष्ठा है और देखने में ऐसा प्रतीत होता है कि जब भी पंचायत का चुनाव आता है तब यहां अपने आप में एक उत्सव का माहौल पैदा करता है और हालिया दिनों में प्रधानी का चुनाव लड़ना भी बड़ा महंगा हो गया है पहले प्रधान को सर्वसम्मति से चुन लिया जाता था लेकिन आज प्रधान बना बड़ा कठिन है और लोकसभा सांसद बनना आसान क्योंकि स्थानीय स्तर पर भाई भतीजा बाद जातिवाद दबंग गई आडे आती है।
उत्तर प्रदेश में वर्ष 2026 में पंचायत चुनाव होना था लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अति पिछड़ा आयु का गठन करके और मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित होने के कारण चुनाव चलता हुआ नजर आता है जो कि आगामी विधानसभा चुनाव वर्ष 2027 के बाद ही होने की उम्मीद है अभी मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित चल रहा है और आम जनता द्वारा की गई जन शिकायतों पर सुनवाई जारी है। अब यह भविष्य के गर्त में है कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पंचायत राज व्यवस्था को मजबूत करने हेतु पंचायत चुनाव कब कराया जाता है।







