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सबसे बड़ा भ्रम दो शब्द : ‘सरकारी पैसा’!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
September 2, 2026
in विशेष
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money laundering
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सी एम जैन


एक गरीब पिता का बच्चा बाज़ार में खिलौना देखकर जिद करता है। पिता कीमत पूछता है, जेब टटोलता है, फिर बच्चे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ जाता है। बच्चा सोचता है कि शायद पिताजी उसे खिलौना नहीं दिलाना चाहते। लेकिन पिता जानता है कि महीने की तनख्वाह अभी आधी भी नहीं बची और घर में राशन, बिजली का बिल, स्कूल की फीस और दवा के खर्च अभी बाकी हैं। उसी शहर में कोई माँ अपनी बेटी की कोचिंग का सपना टाल रही है, कोई बुज़ुर्ग डॉक्टर की पूरी पर्ची नहीं खरीद पा रहा, कोई परिवार बरसों से अपने घर की टूटी छत को प्लास्टिक से ढँककर मानसून निकाल रहा है। भारत के करोड़ों घरों में हर दिन इच्छाओं की हत्या होती है ताकि बजट जीवित रह सके।

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लेकिन इसी कहानी का एक दूसरा पात्र भी है, जिसके बारे में बहुत कम बात होती है।

वही पिता जब पेट्रोल भरवाता है, टैक्स देता है। वही मजदूर जब मोबाइल रिचार्ज कराता है, टैक्स देता है। वही किसान जब डीज़ल खरीदता है, टैक्स देता है। वही गृहिणी जब साबुन, तेल, कपड़ा, दवा या बच्चों की कॉपी खरीदती है, तब भी टैक्स देती है। भारत में करोड़ों लोग आयकर न देते हों, लेकिन कर-मुक्त जीवन लगभग कोई नहीं जीता। वस्तु एवं सेवा कर, ईंधन कर, शुल्क, उपकर और अनेक अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से हर दिन जनता का पैसा सरकारी खजाने तक पहुँचता है। यानी जो परिवार अपने घर का हर रुपया बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, वही परिवार हर दिन सरकार की तिजोरी भी भर रहा है।

यहीं से लोकतंत्र का सबसे बड़ा विरोधाभास शुरू होता है।

हम अपने घर में सौ रुपये के अतिरिक्त खर्च पर बहस कर लेते हैं। बच्चा महंगा खिलौना मांग ले तो उसे समझा देते हैं। घर में पुताई टाल देते हैं। पुरानी बाइक कुछ साल और चलाते हैं। शादी-ब्याह में खर्च काट देते हैं। लेकिन उसी समय लाखों करोड़ रुपये के सार्वजनिक खर्च पर लगभग मौन रहते हैं। जिस देश में एक परिवार पंखा बदलने से पहले दस बार सोचता है, उसी देश में सार्वजनिक धन के उपयोग पर नागरिक बहस कितनी होती है? शायद उतनी नहीं जितनी किसी क्रिकेट मैच, फिल्म या चुनावी नारे पर होती है।

सबसे बड़ा भ्रम दो शब्दों में छिपा है—“सरकारी पैसा”।

यह शब्द सुनते ही नागरिक और धन के बीच का रिश्ता टूट जाता है। जैसे वह पैसा किसी और का हो। जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। सरकार का अपना कोई खेत नहीं है जहाँ से फसल उगती हो। उसका कोई निजी कारखाना नहीं है जहाँ से मुनाफा आता हो। सरकार की तिजोरी में रखा लगभग हर रुपया किसी न किसी नागरिक की जेब से आया है। लेकिन जैसे ही वह रुपया सरकारी खजाने में पहुँचता है, जनता उससे अपना भावनात्मक और नैतिक स्वामित्व छोड़ देती है।

यही लोकतंत्र की सबसे महंगी भूल है।

भारत का केंद्रीय बजट अब दर्जनों लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुँच चुका है। राज्यों के बजट जोड़ दिए जाएँ तो सार्वजनिक धन का आकार और भी विशाल हो जाता है। यह राशि इतनी बड़ी है कि सामान्य नागरिक उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। लेकिन समस्या राशि की विशालता नहीं है। समस्या यह है कि जिन लोगों की मेहनत से यह धन एकत्र होता है, वे ही अक्सर उसके उपयोग पर सबसे कम निगरानी रखते हैं।

ज़रा सोचिए, एक परिवार पाँच लोगों के साथ एक मोटरसाइकिल पर बैठकर बाज़ार जा रहा है। बच्चे बीच में दबे हुए हैं, माँ पीछे किसी तरह संतुलन बनाए हुए है। उसी सड़क पर एक चमचमाती सरकारी गाड़ी निकलती है। गाड़ी में एक बड़ा अधिकारी बैठा है, अपने पालतू कुत्ते को सेहला रहा है। गाड़ी गलत नहीं है। सरकारी कामकाज के लिए वाहन आवश्यक हैं। प्रश्न वाहन का नहीं है। प्रश्न उस मानसिक दूरी का है जो धीरे-धीरे नागरिक और व्यवस्था के बीच पैदा हो गई है। जिस व्यवस्था का खर्च नागरिक उठा रहा है, क्या वह व्यवस्था नागरिक के जीवन की कठिनाइयों को उसी गंभीरता से महसूस करती है?

कबीर ने लिखा था—“साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।” यह केवल व्यक्ति का नहीं, शासन का भी आदर्श हो सकता है। किसी भी सभ्य शासन की महानता उसके खर्च की मात्रा से नहीं, बल्कि उसके खर्च की नैतिकता और उपयोगिता से मापी जानी चाहिए। क्योंकि सार्वजनिक धन केवल लेखांकन की इकाई नहीं होता; वह किसी की अधूरी पढ़ाई, किसी की छूटी हुई दवा, किसी का टला हुआ इलाज, किसी की स्थगित शादी और किसी बच्चे के अधूरे सपनों का संचित रूप होता है।

यहीं एक और असुविधाजनक प्रश्न सामने आता है। यदि जनता अपने पैसे की रखवाली नहीं करेगी, तो कौन करेगा?

सूचना का अधिकार कानून इसी प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास था। RTI केवल कागज़ देखने का अधिकार नहीं है। वह लोकतंत्र का स्मरणपत्र है। वह नागरिक को याद दिलाता है कि वह केवल मतदाता नहीं, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों का संरक्षक भी है। जब कोई व्यक्ति पूछता है कि सड़क निर्माण के लिए कितना बजट स्वीकृत हुआ, अस्पताल के लिए कितना धन आया, स्कूल की मरम्मत पर कितना खर्च हुआ, तब वह केवल सूचना नहीं मांग रहा होता; वह लोकतंत्र को उसकी मूल स्थिति में वापस लाने की कोशिश कर रहा होता है।

लेकिन यहाँ एक और विडंबना है। हम अपने बच्चों को बचत सिखाते हैं, पर नागरिकता नहीं। हम उन्हें गुल्लक देते हैं, पर यह नहीं बताते कि देश का बजट भी एक राष्ट्रीय गुल्लक है। हम उन्हें कमाना सिखाते हैं, पर यह नहीं सिखाते कि उनके नाम पर खर्च होने वाले धन का हिसाब मांगना भी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। हम उन्हें अधिकार बताते हैं, लेकिन अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक सजगता नहीं सिखाते।

कहावत है—“बूंद-बूंद से घड़ा भरता है।” लेकिन लोकतंत्र में एक और सच्चाई है—बूंद-बूंद से भरा घड़ा चुप्पी से खाली भी हो सकता है। सार्वजनिक धन हमेशा किसी एक बड़े घोटाले से नष्ट नहीं होता। वह कई बार नागरिक उदासीनता, कमजोर निगरानी, अधूरी परियोजनाओं, अनुत्तरदायी प्रशासन और उस सामूहिक मानसिकता से क्षीण होता है जो मान बैठती है कि यह सब उसका विषय नहीं है।

शायद इसलिए आज भारत के सामने सबसे बड़ा आर्थिक प्रश्न यह नहीं है कि सरकार कितना खर्च कर रही है, और न ही यह कि नागरिक कितना कमा रहा है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इस देश का नागरिक अपने नाम पर खर्च होने वाले धन को वास्तव में अपना मानता भी है या नहीं।

क्योंकि जिस दिन जनता यह समझ जाएगी कि सरकारी खजाना वास्तव में जनता की सामूहिक तिजोरी है, उस दिन लोकतंत्र केवल चुनावों की व्यवस्था नहीं रहेगा। वह वास्तविक जन-स्वामित्व की व्यवस्था बन जाएगा। उस दिन परिवर्तन किसी नए नेता, नई योजना या नए नारे से नहीं आएगा। वह उस साधारण नागरिक से आएगा जो पहली बार यह तय करेगा कि जैसे वह अपने घर के खर्च पर नज़र रखता है, वैसे ही अपने देश के खर्च पर भी रखेगा।

और तब इतिहास शायद हमसे यह नहीं पूछेगा कि हमने कितना कमाया।

वह यह पूछेगा कि हमने अपने बच्चों को कमाई की कला तो सिखा दी, लेकिन क्या हमने उन्हें यह भी सिखाया कि उनकी मेहनत से बनने वाले राष्ट्रीय खजाने का प्रहरी कौन होगा?

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