प्रकाश मेहरा
एक्जीक्यूटिव एडिटर
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जल शक्ति मंत्रालय द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय विभागीय शिखर सम्मेलन के समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए देश की जल सुरक्षा को मजबूत करने के लिए राज्यों और केंद्र के बीच बेहतर समन्वय, जनभागीदारी और आधुनिक तकनीक के व्यापक इस्तेमाल पर जोर दिया।
यह सम्मेलन प्रधानमंत्री की उस सोच के अनुरूप आयोजित विभागीय शिखर सम्मेलनों की श्रृंखला का पहला आयोजन है, जिसका उद्देश्य ‘टीम इंडिया’ की भावना को मजबूत करना, सहकारी संघवाद को बढ़ावा देना और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर केंद्र एवं राज्यों की सामूहिक जिम्मेदारी सुनिश्चित करना है। सम्मेलन में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के जल संसाधन से जुड़े मंत्री तथा वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।
शिखर सम्मेलन के फैसलों की लगातार समीक्षा पर जोर
प्रधानमंत्री ने सम्मेलन के दौरान हुई व्यापक चर्चाओं की सराहना करते हुए कहा कि इससे सामने आए समयबद्ध और लागू किए जा सकने वाले कार्य बिंदुओं पर लगातार समीक्षा और फॉलो-अप होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे सम्मेलन केवल एक बार होने वाले आयोजन तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि इनके निष्कर्षों को जमीन पर उतारने की निरंतर प्रक्रिया विकसित की जानी चाहिए।
जल संरक्षण को जन आंदोलन बनाने की अपील
प्रधानमंत्री ने जल संरक्षण में जनभागीदारी को महत्वपूर्ण बताते हुए लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने के लिए ‘जल उत्सव’ जैसे आयोजनों को बढ़ावा देने का सुझाव दिया। उन्होंने गाद निकालने की प्रक्रिया को नियमित कार्यक्रम बनाने तथा इसके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करने पर भी जोर दिया।
बांधों की सुरक्षा को लेकर प्रधानमंत्री ने हर मानसून से पहले व्यापक तैयारियां सुनिश्चित करने, निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन करने और स्कूली विद्यार्थियों के बीच जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने जल सुरक्षा से जुड़े विषयों को शिक्षा के पाठ्यक्रम से जोड़ने का भी सुझाव दिया।
एआई से बेहतर होगा जल डेटा प्रबंधन
प्रधानमंत्री ने जल क्षेत्र में मजबूत डेटा गवर्नेंस की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने जल से जुड़े विभिन्न आंकड़ों को एकीकृत करने, उनका व्यवस्थित प्रबंधन करने और बेहतर विश्लेषण के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का प्रभावी इस्तेमाल करने की अपील की।
उन्होंने एक समान प्रारूप में जल संबंधी आंकड़े एकत्र करने और उनके विश्लेषण की व्यवस्था विकसित करने का सुझाव दिया, ताकि नीतियां और योजनाएं अधिक प्रभावी तरीके से तैयार की जा सकें।
शहरीकरण और भविष्य की जल जरूरतों पर तैयारी
प्रधानमंत्री ने तेजी से बढ़ते शहरीकरण को जल प्रबंधन के लिए बड़ी चुनौती बताते हुए शहरी स्थानीय निकायों को भविष्य की पानी की जरूरतों के लिए अभी से तैयार करने पर जोर दिया। उन्होंने शहरी निकायों के लिए भी इसी तरह के चिंतन शिविर आयोजित करने का सुझाव दिया।
उन्होंने जल बचाने वाली तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाने और भारतीय निर्माताओं तथा संबंधित हितधारकों को प्रभावी समाधान विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करने की बात कही। इसके लिए प्रदर्शनियों और कार्यशालाओं के आयोजन तथा दुनिया के सफल जल प्रबंधन मॉडल से सीखने पर भी जोर दिया।
राज्यों के बीच अध्ययन-दौरे का सुझाव
प्रधानमंत्री ने पानी से जुड़े सफल प्रयोगों को दूसरे क्षेत्रों में लागू करने के लिए अंतर-राज्यीय अध्ययन-दौरों का सुझाव दिया। इनमें जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और किसानों की भागीदारी सुनिश्चित करने की बात कही गई, ताकि राज्यों को एक-दूसरे के सफल अनुभवों से व्यावहारिक सीख मिल सके।
उन्होंने विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में जल प्रबंधन तथा जल शासन से जुड़ी जानकारी और क्षमता निर्माण को भी बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई।
उपचारित पानी के इस्तेमाल पर जोर
प्रधानमंत्री ने पानी की कमी से निपटने के लिए कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों में उपचारित पानी के उचित उपयोग की दिशा में पहले से योजना बनाने पर जोर दिया। उन्होंने जल प्रबंधन को एकीकृत दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाने की आवश्यकता बताई।
गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में अपने अनुभव का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि सही योजना, मजबूत इच्छाशक्ति, पर्याप्त संसाधन और सक्षम अधिकारियों की टीम के जरिए पानी की कमी जैसी चुनौती को भी अवसर में बदला जा सकता है।
जल शक्ति मंत्री ने गिनाए चार प्रमुख लक्ष्य
केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल ने सम्मेलन के चार प्रमुख परिणामों पर जोर दिया। इनमें जल क्षेत्र की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को तेजी से पूरा करना, जल संरक्षण को निरंतर जन आंदोलन के रूप में मजबूत करना, पेयजल स्रोतों की दीर्घकालिक उपलब्धता सुनिश्चित करना तथा ग्रामीण पेयजल योजनाओं के प्रभावी संचालन और रखरखाव को संस्थागत बनाना शामिल है।
सम्मेलन में सामने आए सुझावों और कार्य बिंदुओं को राज्यों तथा केंद्र के बीच बेहतर समन्वय के साथ लागू करने पर जोर दिया गया, ताकि देश की बढ़ती जल जरूरतों और भविष्य की जल चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके।







