नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) चुनाव के नतीजों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने चार में से तीन प्रमुख पदों पर जीत दर्ज की है। अध्यक्ष पद पर यश डबास, सचिव पद पर रिया छावड़ी और संयुक्त सचिव पद पर लक्ष्य राज सिंह विजयी हुए। वहीं उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने जीत दर्ज की। आइये एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा से विस्तार में समझते हैं।
इन नतीजों के बाद छात्र राजनीति के साथ-साथ जेन ज़ी के राजनीतिक रुझान, विपक्षी वोटों के बंटवारे और छात्र संगठनों की रणनीति को लेकर भी बहस तेज हो गई है।
एबीवीपी की जीत पर बीजेपी नेताओं की प्रतिक्रिया
डूसू चुनाव के नतीजों के बाद बीजेपी के कई वरिष्ठ नेताओं ने एबीवीपी को बधाई दी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एबीवीपी की जीत पर कार्यकर्ताओं को बधाई दी। बीजेपी नेताओं ने इन नतीजों को युवाओं और छात्रों के बीच राष्ट्रवादी विचारधारा तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों के समर्थन से जोड़कर देखा है।
दिल्ली से बीजेपी सांसद बांसुरी स्वराज ने कहा कि “चुनाव परिणामों से यह स्पष्ट होता है कि छात्रों ने एबीवीपी के पक्ष में मतदान किया है। उन्होंने यह भी कहा कि चार में से तीन पदों पर जीत और एनएसयूआई का एक भी पद नहीं जीत पाना कांग्रेस के लिए गंभीर राजनीतिक संकेत है।”
हालांकि, चुनाव परिणामों की राजनीतिक व्याख्या को केवल डूसू के नतीजों तक सीमित रखना भी सवालों के घेरे में है, क्योंकि विश्वविद्यालय चुनाव का परिणाम पूरे देश के युवाओं की राजनीतिक सोच का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करता है, ऐसा निष्कर्ष निकालने के लिए व्यापक आंकड़ों की आवश्यकता होगी।
एनएसयूआई ने उठाए मतदान और मतगणना पर सवाल
कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई को इस बार चारों प्रमुख पदों में से कोई भी पद नहीं मिला। एनएसयूआई के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार विजय शंकर मीणा ने कुछ कॉलेजों में कथित फर्जी मतदान और चुनावी अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं। उन्होंने स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज, रामजस कॉलेज और शिवाजी कॉलेज में कथित घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई गई है और मामले को अदालत में ले जाने की बात कही।
कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने भी मतगणना और मतदान केंद्रों को लेकर सामने आए आरोपों की जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि यदि कम अंतर से तय हुई सीटों पर अनियमितताओं का प्रभाव पड़ा है, तो इसकी जांच होनी चाहिए। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही इनके आधार पर चुनाव परिणामों पर अंतिम निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
सबसे ज्यादा चर्चा निर्दलीय दीपांशु शौकीन की जीत की
डूसू चुनाव में उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन की जीत ने राजनीतिक विश्लेषण को एक अलग दिशा दी है। उनकी जीत को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वे छात्र राजनीति में संगठनात्मक टिकट के बजाय स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में मैदान में थे।
दीपांशु शौकीन ने चुनाव के बाद कहा कि उनका संघर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए रहा है और आगे भी वह छात्रों के मुद्दों को उठाते रहेंगे। यहीं से एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—क्या छात्र मतदाता पारंपरिक राजनीतिक संगठनों से अलग होकर भी अपनी पसंद तय कर रहे हैं?
प्रकाश मेहरा का विश्लेषण: बंटे हुए वोटों की भूमिका
पत्रकार और लेखक प्रकाश मेहरा के मुताबिक डूसू के नतीजों को केवल एबीवीपी की जीत और एनएसयूआई की हार के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। उन्होंने कहा कि “जब एनएसयूआई से जुड़े एक बागी उम्मीदवार ने निर्दलीय के रूप में उपाध्यक्ष पद पर बड़ी जीत दर्ज की है, तो यह कांग्रेस और उसके छात्र संगठन की चुनावी रणनीति पर विचार करने का विषय जरूर है।”
उनके अनुसार, एबीवीपी संगठन और संसाधनों के स्तर पर चुनाव के लिए बेहतर तरीके से तैयार दिखाई दी और चार में से तीन पदों पर जीत इसका परिणाम है। इसके साथ ही विपक्षी या गैर-एबीवीपी वोटों के बंटवारे ने भी परिणामों को प्रभावित किया हो सकता है।
प्रकाश मेहरा का कहना है कि “जेन ज़ी का वोट किसी एक राजनीतिक संगठन के साथ स्थायी रूप से जुड़ा हुआ मानना सही नहीं होगा। युवा मतदाताओं के मुद्दे और राजनीतिक प्राथमिकताएं अलग-अलग हो सकती हैं और विभिन्न संगठनों के बीच उनका समर्थन बंट सकता है।”
जेन ज़ी के वोट को लेकर क्यों बढ़ी बहस ?
डूसू परिणामों के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या जेन ज़ी का बड़ा हिस्सा मौजूदा राजनीतिक विकल्पों से दूरी बनाए हुए है या फिर वह अलग-अलग मुद्दों और उम्मीदवारों के आधार पर मतदान कर रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रवक्ता सौरव दास ने डूसू चुनाव के नतीजों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि विपक्षी वोटों के बंटने से एबीवीपी को फायदा मिला।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि एक छात्र संघ चुनाव को पूरे देश की युवा पीढ़ी के राजनीतिक मूड का पैमाना मानना उचित नहीं है। उन्होंने गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय में एबीवीपी की हार का उदाहरण देते हुए सवाल उठाया कि अलग-अलग विश्वविद्यालयों के परिणामों को एक ही राजनीतिक निष्कर्ष से कैसे जोड़ा जा सकता है। सौरव दास ने विपक्षी दलों और संगठनों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
डूसू का परिणाम क्या संकेत देता है ?
डूसू चुनाव का परिणाम तीन अलग-अलग तस्वीरें सामने रखता है। पहली, एबीवीपी ने संगठनात्मक स्तर पर मजबूत प्रदर्शन करते हुए चार में से तीन प्रमुख पद हासिल किए हैं।
दूसरी, एनएसयूआई कोई प्रमुख पद हासिल नहीं कर सकी, जबकि उसके एक बागी उम्मीदवार का निर्दलीय के तौर पर जीतना संगठन और उम्मीदवार चयन की रणनीति पर सवाल खड़े करता है।
तीसरी, जेन ज़ी के राजनीतिक व्यवहार को केवल किसी एक चुनाव के परिणाम से समझना मुश्किल है। अलग-अलग विश्वविद्यालयों और चुनावों में अलग-अलग परिणाम सामने आ सकते हैं। इसलिए डूसू चुनाव को युवाओं की पूरी पीढ़ी की राजनीतिक पसंद का अंतिम प्रमाण मानने के बजाय इसे छात्र राजनीति के एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
चुनावी अनियमितताओं को लेकर आरोप
डूसू चुनाव में एबीवीपी की तीन पदों पर जीत निश्चित रूप से संगठन की चुनावी ताकत को दिखाती है। लेकिन इसके साथ ही निर्दलीय उम्मीदवार की जीत, एनएसयूआई की हार, विपक्षी वोटों का बंटवारा और चुनावी अनियमितताओं को लेकर लगाए गए आरोप—ये सभी ऐसे पहलू हैं जिन पर आगे भी चर्चा होती रहेगी।
प्रकाश मेहरा के विश्लेषण के अनुसार, इस चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण सवाल केवल यह नहीं है कि कौन जीता और कौन हारा, बल्कि यह भी है कि “बदलती हुई युवा राजनीति को राजनीतिक संगठन किस तरह समझते हैं और जेन ज़ी के बिखरे हुए राजनीतिक समर्थन को वे किस तरह संबोधित करते हैं।”







