नई दिल्ली। पहलगाम में हुए कायरतापूर्ण आतंकी हमले के जवाब में भारत ने पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए ऐतिहासिक सिंधु जल समझौते को स्थगित करने का ऐतिहासिक फैसला लिया था. भारत के इस कड़े रुख के बाद से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जाकर भारत के खिलाफ माहौल बनाने में जुटा है. हालांकि, कूटनीतिक स्तर पर इतना बड़ा कदम उठाए जाने के 17 महीने बीत जाने के बाद भी जमीनी हकीकत यह है कि भारत ने अभी तक पाकिस्तान की तरफ जाने वाले पानी को पूरी तरह से नहीं रोका है. इस वजह से देश के आम नागरिकों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर भारत सरकार ने समझौता रद्द करने के बावजूद पश्चिमी नदियों के बहाव को क्यों नहीं मोड़ा, चलिए समझें.
पहलगाम हमले के बाद भारत का कड़ा रुख
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत अप्रैल 2025 में कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले से हुई थी, जिसमें 26 पर्यटकों की जान चली गई थी. इसके जवाब में भारत ने 1960 से चले आ रहे सिंधु जल समझौते को तुरंत प्रभाव से निलंबित करने का ऐलान कर दिया था. भारत ने साफ कहा था कि जब तक सीमा पार से जारी प्रायोजित आतंकवाद पूरी तरह खत्म नहीं होता, तब तक यह संधि बेअसर रहेगी. बौखलाहट में पाकिस्तान हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत पहुंचा, लेकिन भारत ने उस ट्रिब्यूनल के गठन को ही असंवैधानिक करार देते हुए उसके किसी भी फैसले को मानने से साफ मना कर दिया था.
क्या है सिंधु जल समझौता और किस देश को कितना मिलता है पानी?
वर्ष 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुए इस समझौते के तहत सिंधु नदी तंत्र की छह प्रमुख नदियों का बंटवारा किया गया था. इसमें पूर्वी नदियों- रावी, ब्यास और सतलुज के पूरे जल का इस्तेमाल भारत के अधिकार क्षेत्र में दिया गया, जिनमें सालाना लगभग 33 मिलियन एकड़-फीट पानी रहता है. दूसरी तरफ, पश्चिमी नदियों- सिंधु, झेलम और चिनाब का अधिकांश पानी पाकिस्तान को आवंटित किया गया था, जिनमें सालाना 135 MAF विशाल जलराशि बहती है. संधि के तहत भारत को सीमित खेती, घरेलू उपयोग और पनबिजली के अलावा इन नदियों पर 3.6 MAF तक पानी जमा करने की छूट भी दी गई थी.
पाकिस्तान का पानी रोकना भारत के लिए आसान क्यों नहीं?
जल संसाधन विशेषज्ञों के मुताबिक, किसी भी विशाल नदी के प्राकृतिक बहाव को कागजी फैसलों या सरकारी आदेशों के जरिए अचानक से नहीं रोका जा सकता है. पानी को रोकने या उसका रास्ता बदलने के लिए विशालकाय इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है. भारत के पास फिलहाल इन पश्चिमी नदियों पर केवल 1 MAF पानी जमा करने लायक ही बांध मौजूद हैं. इसका मतलब यह है कि भारत अभी तक संधि में मिली अपनी कानूनी छूट के स्तर को भी नहीं छू पाया है. मौजूद बुनियादी ढांचे के दम पर इतने बड़े पैमाने पर तेज बहाव वाली नदियों का पानी रोकना तकनीकी रूप से नामुमकिन है.
नदी घाटी परियोजनाओं के निर्माण में जटिलताएं
किसी भी नई जल परियोजना या विशाल जलाशय के निर्माण में कई साल का लंबा वक्त लगता है. किसी भी बड़े बांध को बनाने के लिए सबसे पहले विस्तृत भूमि सर्वेक्षण करना पड़ता है, उसके बाद विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार की जाती है. इसके उपरांत सख्त पर्यावरणीय मंजूरियां ली जाती हैं, हजारों करोड़ रुपये का बजट पास होता है और फिर वर्षों तक भारी इंजीनियरिंग काम चलता है. जिस गति से वर्तमान में इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम चल रहा है, उसे देखते हुए भारत को केवल अपनी कानूनी सीमा यानी 3.6 MAF क्षमता हासिल करने में ही 2030 तक का समय लग सकता है.
गर्मियों के भयंकर जल बहाव की बड़ी चुनौती
हिमालय से निकलने वाली चिनाब और झेलम जैसी नदियों का मिजाज मौसम के हिसाब से बहुत तेजी से बदलता है. गर्मी के मौसम में बर्फ पिघलने और मानसून की मूसलाधार बारिश के कारण इन नदियों में जल स्तर अपने उफान पर होता है. उस वक्त जल स्तर इतना विकराल होता है कि अगर बेहद मजबूत और विशाल बांध न हों, तो पानी को रोक पाना संभव ही नहीं है. भारत को असली जरूरत सर्दियों के सूखे महीनों के लिए पानी बचाने की होती है, लेकिन गर्मियों में बहने वाले उस विशाल जल प्रवाह को स्टोर करने के लिए हमारे पास फिलहाल पर्याप्त संख्या में बड़े जलाशय नहीं हैं. यही वजहें हैं कि यह नल की टोंटी से पानी बंद कर देने जैसा आसान काम नहीं है.







