सुदर्शन व्यास (पत्रकार एवं शोधार्थी)
नई दिल्ली। किसी संगठन की सौ वर्ष की यात्रा को समझना केवल उसके इतिहास के पन्ने पलटना नहीं होता। उसके विचार, कार्यपद्धति, सामाजिक सरोकार और समय के साथ बदलती चुनौतियों को भी देखना पड़ता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी के अवसर पर प्रकाशित ‘आरएसएस@100’ इसी दृष्टि से एक महत्वपूर्ण पुस्तक के रूप में सामने आती है। प्रो. संजय द्विवेदी और डॉ. लोकेंद्र सिंह के संपादन में शिल्पायन पब्लिशर्स, दिल्ली से प्रकाशित इस पुस्तक में 35 लेखकों और विचारकों के आलेख शामिल हैं। इन आलेखों के माध्यम से संघ के विचार और कार्य को अलग-अलग दृष्टियों से समझने का प्रयास किया गया है।
आरएसएस@100 पुस्तक की विशेषता केवल इसमें शामिल लेखों की संख्या नहीं, बल्कि विषय और दृष्टिकोण की विविधता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सामान्यतः एक संगठन के रूप में देखा जाता है, लेकिन उसके लगभग सौ वर्ष के विस्तार को समझने के लिए उसके पीछे की वैचारिक दृष्टि और सामाजिक कार्यपद्धति को समझना भी आवश्यक है। पुस्तक के विभिन्न आलेख इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य को सामने लाते हैं। कहीं संघ के विचार का पक्ष दिखाई देता है, कहीं उसके सामाजिक कार्य का विस्तार, तो कहीं उसके साथ जुड़े अनुभवों और विमर्शों की झलक मिलती है।
संघ की यात्रा को समझने में ‘राष्ट्र’ और ‘समाज’ की उसकी अवधारणा केंद्रीय रही है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सामाजिक समरसता संघ के सार्वजनिक विमर्श में लगातार प्रमुख विषय रहे हैं। शताब्दी वर्ष में भी संघ ने सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी और नागरिक कर्तव्य जैसे विषयों पर विशेष जोर दिया है। ऐसे समय में आरएसएस@100 का महत्व इसलिए बढ़ जाता है कि यह इन व्यापक अवधारणाओं को एक ही आलेख के बजाय अनेक लेखकों की दृष्टि से देखने का अवसर देती है।
पुस्तक की एक और उपलब्धि यह है कि इसमें संघ को केवल अतीत के संदर्भ में देखने की कोशिश नहीं की गई है। सौ वर्ष की यात्रा अपने आप में महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे अधिक महत्वपूर्ण यह प्रश्न है कि बदलते भारत और बदलती दुनिया में संघ की भूमिका को किस तरह समझा जाए। तकनीक, वैश्वीकरण, सामाजिक परिवर्तन और नई पीढ़ी की बदलती आकांक्षाओं के बीच संगठन की विचार-यात्रा और सामाजिक उपस्थिति को देखने के लिए पुस्तक कई संदर्भ उपलब्ध कराती है।
विभिन्न लेखकों और विचारकों का एक साथ आना पुस्तक को संवाद का स्वरूप देता है। अलग-अलग लेखकों की भाषा, अनुभव और दृष्टिकोण पाठक को एक ही विषय के कई पहलुओं तक ले जाते हैं। यही कारण है कि यह पुस्तक केवल संघ के स्वयंसेवकों के लिए ही नहीं, बल्कि उन पाठकों के लिए भी उपयोगी हो सकती है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समझना चाहते हैं और उसके बारे में प्रचलित धारणाओं से आगे जाकर उसके विचार और कार्य को पढ़ना चाहते हैं।
हालांकि किसी भी बहुआयामी संगठन को एक पुस्तक में पूरी तरह समेटना संभव नहीं है। सौ वर्षों की यात्रा में अनेक घटनाएं, व्यक्तित्व, विचार-विमर्श और सामाजिक अनुभव जुड़े हैं। ऐसे में इस किताब को संघ पर अंतिम शब्द के बजाय एक महत्वपूर्ण वैचारिक पड़ाव के रूप में देखना अधिक उचित होगा। इसकी उपयोगिता इसी में है कि यह पाठक के सामने कई प्रश्न और संदर्भ रखती है तथा संघ की यात्रा को समझने के लिए आगे पढ़ने की जिज्ञासा पैदा करती है।
शताब्दी वर्ष में प्रकाशित आरएसएस@100 इसलिए महज एक स्मृति-पुस्तक नहीं, बल्कि एक वैचारिक संकलन के रूप में सामने आती है। 35 लेखकों की दृष्टियों से गुजरते हुए पाठक संघ के विचार, उसके सामाजिक कार्य और उसकी दीर्घ यात्रा को अलग-अलग कोणों से देख सकता है। संघ को जानने की इच्छा रखने वालों के लिए यह एक उपयोगी प्रवेश-द्वार है और स्वयंसेवकों के लिए अपनी यात्रा तथा विचारों को नए संदर्भों में देखने का अवसर। सौ वर्ष पूरे कर चुका संगठन जब अगले चरण की ओर बढ़ रहा है, तब उसके अतीत, वर्तमान और भविष्य पर विचार करने वाली ऐसी पुस्तक का सामने आना निश्चित रूप से समकालीन हिंदी वैचारिक साहित्य में उल्लेखनीय घटना है।

- पुस्तक : आरएसएस@100
- संपादक : प्रो. संजय द्विवेदी एवं डॉ. लोकेन्द्र सिंह
- मूल्य : 450 रुपये
- प्रकाशक : शिल्पायन पब्लिशर्स, दिल्ली







