प्रकाश मेहरा
विशेष डेस्क
नई दिल्ली। देश में परीक्षा व्यवस्था से शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची के विवाद तक पहुंच गया है। सोशल मीडिया से उभरे कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) आंदोलन ने पहले NEET और अन्य परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की। इसके बाद स्कूलों के सोशल ऑडिट और अब Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तेज हो गई है।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सवाल सिर्फ सरकार और संवैधानिक संस्थाओं से जवाब मांगने का नहीं है। सवाल यह भी है कि विरोध का तरीका क्या होना चाहिए, सोशल मीडिया पर वायरल दावों की सच्चाई क्या है और क्या आंदोलन के नाम पर लगाए जा रहे हर आरोप को बिना स्वतंत्र पुष्टि के स्वीकार किया जा सकता है ?
NEET विवाद से CJP के आंदोलन की शुरुआत
2026 में NEET और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक और अनियमितताओं को लेकर छात्रों के बीच नाराजगी बढ़ी। इसी माहौल में CJP सोशल मीडिया पर तेजी से उभरा और दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन आयोजित किया गया।
6 जून को CJP ने तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर बड़ा प्रदर्शन किया। आंदोलन के नेताओं ने सरकार को कार्रवाई के लिए समय देने और मांग पूरी नहीं होने पर आंदोलन को देशभर में फैलाने की चेतावनी दी थी।
इसके बाद 25 जुलाई 2026 को राष्ट्रपति भवन की आधिकारिक विज्ञप्ति के मुताबिक धर्मेंद्र प्रधान का केंद्रीय मंत्रिपरिषद से इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया। शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार प्रह्लाद जोशी को दिया गया।
यह तथ्य जरूर दर्ज किया जाना चाहिए कि “CJP ने इस्तीफे की मांग को अपने आंदोलन का प्रमुख मुद्दा बनाया था और इस्तीफे के बाद आंदोलन स्थल पर इसे अपनी जीत के तौर पर पेश किया गया। हालांकि, किसी मंत्री के इस्तीफे का कारण केवल एक आंदोलन को मान लेना राजनीतिक विश्लेषण होगा; आधिकारिक तौर पर राष्ट्रपति की विज्ञप्ति इस्तीफे की स्वीकृति की पुष्टि करती है, लेकिन इस्तीफे का कारण नहीं बताती।
आंदोलन के तरीके पर भी उठे सवाल
लोकतंत्र में सरकार से सवाल करना, जवाब मांगना और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का अधिकार है। लेकिन लोकतांत्रिक विरोध की सीमा और उसकी भाषा को लेकर भी बहस जरूरी है।
CJP के विभिन्न प्रदर्शनों से जुड़े सोशल मीडिया वीडियो और रिपोर्टों में तीखी राजनीतिक भाषा और विवादित नारों को लेकर बहस हुई है। हालांकि, वायरल वीडियो, पोस्टर या नारे के आधार पर पूरे आंदोलन या उसके सभी समर्थकों को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा। लेकिन हां प्रदर्शन अमर्यादित जरूर हुआ।
स्कूलों के निरीक्षण तक पहुंचा अभियान
शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद CJP ने सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं को लेकर “School Thik Karo” अभियान शुरू किया। संगठन ने सरकारी स्कूलों में बिजली, पानी, शौचालय और मिड-डे मील जैसी सुविधाओं की जांच के लिए सोशल ऑडिट का आह्वान किया। कई स्थानों पर CJP की टीमों ने स्कूलों की स्थिति पर सवाल उठाए। वहीं कुछ जगहों पर प्रशासन और स्कूल प्रबंधन ने संगठन के दावों का खंडन भी किया। राजस्थान के एक स्कूल निरीक्षण के दौरान CJP कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों के बीच टकराव की खबर सामने आई।
इसलिए स्कूलों की खराब स्थिति से जुड़े प्रत्येक दावे को “CJP का आरोप” कहकर रिपोर्ट करना अधिक पत्रकारिता-सम्मत होगा, जब तक संबंधित शिक्षा विभाग या स्वतंत्र जांच से उसकी पुष्टि न हो। यह दावा भी सही नहीं होगा कि यह अभियान केवल BJP शासित राज्यों तक सीमित रहा। उपलब्ध रिपोर्टों में महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में भी CJP के स्कूल अभियान का उल्लेख मिलता है।
झारखंड में CJP की भूमिका को लेकर भी तस्वीर अलग है
झारखंड में JPSC और JSSC की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के आरोपों को लेकर छात्रों का आंदोलन हुआ। छात्रों ने जांच, परीक्षाओं को लेकर कार्रवाई और सुधार जैसी मांगें उठाईं। CJP पर इस मामले में चुप रहने का आरोप लगाना भी पूरी तरह सही नहीं होगा। लेकिन कई छात्रों ने पूछा CJP संस्थापक अभिजीत दीपके ने सार्वजनिक रूप से झारखंड के छात्रों के आंदोलन को समर्थन दिया लेकिन गए नहीं क्यों ?। ये भी सच है कि “झारखंड के छात्रों ने CJP का विरोध किया था और कहा गया कि देशविरोधी नारे की कोई जगह नहीं,आजादी के नारे नहीं ”
हालांकि, यह भी रिपोर्ट हुआ कि CJP के प्रमुख चेहरे झारखंड आंदोलन में सामने नहीं आए और संगठन ने स्थानीय छात्र नेतृत्व को आंदोलन का चेहरा बनाए रखने की बात कही। यानी यहां भी तस्वीर “CJP ने कुछ नहीं किया” जैसी है।
अब मुद्दा SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा
अब CJP का नया अभियान चुनावी प्रक्रिया को लेकर है। विवाद Special Intensive Revision यानी SIR और मतदाता सूची से जुड़ी प्रक्रिया को लेकर सामने आया। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट में Form 6 में किए गए बदलावों को लेकर सवाल उठाए गए। रिपोर्ट के अनुसार नए मतदाताओं से पुराने SIR के दौरान स्वयं, माता-पिता या दादा-दादी का नाम मतदाता सूची में होने से संबंधित जानकारी मांगी गई थी। दो चुनाव आयुक्तों ने इस बदलाव को “illegal” और “unauthorised” बताते हुए आपत्ति जताई थी।
इसके बाद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हुआ और विपक्षी दलों के साथ CJP ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग शुरू कर दी।
मामला अब न्यायपालिका तक भी पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने 5 अक्टूबर को केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया और CEC ज्ञानेश कुमार के निलंबन की मांग वाली याचिका पर जवाब मांगा। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि अगर कोई निर्णय कानून के विपरीत पाया जाता है तो उसे रद्द किया जा सकता है। इसलिए SIR विवाद को केवल राजनीतिक आरोप के रूप में देखना भी सही नहीं होगा— मामला न्यायिक जांच के दायरे में है।
विपक्ष का प्रदर्शन और आकाशवाणी भवन का विवाद
6 अक्टूबर को INDIA ब्लॉक के सांसदों ने चुनाव आयोग की ओर मार्च किया। पुलिस द्वारा मार्च रोके जाने के बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी समेत कई विपक्षी नेता आकाशवाणी भवन के बाहर धरने पर बैठ गए। दोनों कई घंटे वहां रहे और बाद में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को वहां से हटाया।
इस घटनाक्रम पर राजनीतिक सवाल भी उठे कि जब प्रदर्शन चुनाव आयोग के खिलाफ था तो आकाशवाणी भवन के बाहर धरना क्यों दिया गया। हालांकि, इसे “चुनाव आयोग के मुद्दे से कोई संबंध नहीं” कहना भी अतिशयोक्ति होगी, क्योंकि प्रदर्शन का तत्काल संदर्भ चुनाव आयोग तक मार्च को पुलिस द्वारा रोका जाना था।
AI वीडियो ने बढ़ाई फेक न्यूज की चिंता
इसी प्रदर्शन के दौरान सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें एक पुलिस अधिकारी पर महिला के साथ कथित बदसलूकी का आरोप लगाया गया था। दिल्ली पुलिस के मुताबिक जांच में वीडियो AI-generated/manipulated पाया गया और इस मामले में नदीन अहमद अमीन नाम के एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने उसे एक न्यूज हैंडल चलाने वाला व्यक्ति बताया और कहा कि उसके खिलाफ फर्जी वीडियो प्रसारित करने के आरोप में कार्रवाई की गई।
यह घटना एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा करती है- प्रदर्शन स्थल से जुड़ी किसी भी सनसनीखेज तस्वीर या वीडियो को पत्रकारिता की पुष्टि के बिना खबर बनाना कितना उचित है ? किसी व्यक्ति की शैक्षणिक योग्यता या उसके द्वारा खुद को पत्रकार बताने का दावा भी तभी खबर का हिस्सा बनना चाहिए जब वह सार्वजनिक रिकॉर्ड या पुलिस/अदालती दस्तावेजों से पुष्ट हो।
10 अक्टूबर को CJP का अगला बड़ा प्रदर्शन
अब CJP ने 10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर बड़े प्रदर्शन का ऐलान किया है। 2 अक्टूबर को मुंबई के शिवाजी पार्क में CJP के प्रदर्शन के बाद अभिजीत दीपके ने 10 अक्टूबर को दिल्ली में फिर बड़े प्रदर्शन की घोषणा की थी।
CJP प्रवक्ता सौरव दास ने दिल्ली पुलिस को प्रदर्शन के संबंध में सूचना देने की बात कही है। संगठन ने इसे शांतिपूर्ण प्रदर्शन बताया है। इस बीच दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर सुरक्षा और अनुमति से जुड़े दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं।
सबसे बड़ा सवाल—आंदोलन या अराजकता ?
CJP के आंदोलन को लेकर देश में दो अलग-अलग नैरेटिव दिखाई दे रहे हैं। एक पक्ष इसे युवाओं की नाराजगी, परीक्षा व्यवस्था, रोजगार, शिक्षा और चुनावी पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर सरकार और संस्थाओं से जवाब मांगने वाला दबाव समूह मानता है। खुद अभिजीत दीपके ने भी CJP को राजनीतिक पार्टी के बजाय pressure group के रूप में काम करने की बात कही है।
दूसरी ओर, आलोचक आंदोलन की भाषा, सोशल मीडिया पर फैलने वाली सामग्री, स्कूलों में बिना अनुमति प्रवेश और प्रदर्शन के दौरान टकराव जैसी घटनाओं पर सवाल उठा रहे हैं।
10 अक्टूबर से पहले असली चुनौती
अब नजर 10 अक्टूबर के जंतर-मंतर प्रदर्शन पर है। एक तरफ CJP मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर भीड़ जुटाने की तैयारी कर रहा है। दूसरी तरफ SIR को लेकर चुनाव आयोग के खिलाफ राजनीतिक और न्यायिक दबाव पहले से मौजूद है। ऐसे में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी—प्रदर्शन के अधिकार और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखना। और मीडिया के सामने उससे भी बड़ी चुनौती होगी—वायरल वीडियो, AI-generated सामग्री, राजनीतिक आरोप और वास्तविक घटनाओं के बीच फर्क करना।
लोकतंत्र में सवाल पूछना जरूरी है। विरोध भी जरूरी है। लेकिन उतना ही जरूरी है कि सवाल तथ्यों के साथ पूछे जाएं, आरोप सबूत के साथ लगाए जाएं और विरोध कानून तथा लोकतांत्रिक मर्यादा के भीतर हो। 10 अक्टूबर का प्रदर्शन यह तय करेगा कि CJP का आंदोलन सिर्फ सोशल मीडिया की ताकत है या वास्तव में देशव्यापी जनदबाव में बदल चुका है।






