नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा में ऐसे एक्टर्स उंगलियों पर गिने जा सकते हैं, जिन्होंने कभी स्टारडम की चमक-दमक के आगे अपनी कला से समझौता नहीं किया. नाना पाटेकर उन्हीं चुनिंदा फनकारों में सबसे अव्वल थे. पांच दशकों के अपने शानदार फिल्मी करियर में नाना ने कभी भी सिर्फ पर्दे पर दिखने या भारी-भरकम फीस वसूलने के लिए फिल्में साइन नहीं कीं. उनकी फिल्मों की लिस्ट भले ही बहुत लंबी न रही हो, लेकिन जिस भी किरदार में वे उतरे, उसे इतिहास बना दिया. टीवी9 के एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया था कि वे किसी फिल्म को कैसे चुनते हैं, तो नाना पाटेकर ने अपने काम करने के तरीके और उन 4 सख्त नियमों का खुलासा किया था, जिन्हें वे किसी भी प्रोजेक्ट के लिए लक्ष्मण रेखा मानते थे.
नाना पाटेकर का पहला और सबसे बुनियादी उसूल यह था कि जब कोई लेखक या निर्देशक उन्हें कहानी सुनाने आता था, तो वे खुद को के बड़े स्टारडम के चश्मे से पूरी तरह अलग कर लेते थे. नाना ने कहा था,”मैं जब कहानी सुनता हूं, तो नाना पाटेकर एक एक्टर के तौर पर नहीं सुनता. मैं एक आम आदमी होकर, थिएटर में बैठने वाले आम दर्शक की तरह सुनता हूं. अगर वह कहानी एक साधारण इंसान के तौर पर मेरे दिल को छूती है, मुझे हंसाती है या रुलाती है, तभी मैं आगे बात करता हूं. अगर कहानी में दम नहीं है, तो कोई भी स्टारडम उसे नहीं बचा सकता.”
निर्देशक का विजन और कहानी के साथ न्याय
कहानी पसंद आने के बाद नाना पाटेकर की दूसरी कसौटी होती थी, ‘फिल्म का कैप्टन’ यानी डायरेक्टर. नाना हमेशा ये परखते थे कि जिसने यह कहानी सोची है या जो इसे निर्देशित करने जा रहा है, क्या उसके पास इस जज्बात को स्क्रीन पर उतारने का विजन है? क्या वह इस कहानी के साथ पूरा न्याय कर पाएगा? नाना का मानना था कि एक कमजोर निर्देशक अच्छी से अच्छी स्क्रिप्ट का कत्ल कर सकता है, इसलिए निर्देशक की नीयत और उसकी कला पर उनका भरोसा होना बेहद जरूरी था.
को-स्टार्स और टीम की ताकत
नाना कभी भी ‘वन-मैन शो’ पर भरोसा नहीं करते थे. उनका तीसरा नियम होता था यह देखना कि उनके साथ कौन से कलाकार काम कर रहे हैं. वे अक्सर कहते थे कि मैच जीतने के लिए सिर्फ एक खिलाड़ी की सेंचुरी काम नहीं आती, आखिरी के दो ओवरों में जो खिलाड़ी चौके-छक्के लगाकर 10-15 रन जोड़ता है, वह भी उतना ही अहम होता है. नाना हमेशा सह-कलाकारों की प्रतिभा और उनके समर्पण को तवज्जो देते थे, क्योंकि उनका मानना था कि जब सामने वाला एक्टर दमदार होगा, तभी परफॉर्मेंस में असली चमक आएगी.
पैसा सबसे आखिरी पायदान पर
आज के दौर में जहां कई सितारे स्क्रिप्ट से पहले अपनी फीस, वैनिटी वैन और लग्जरी की मांग सामने रखते हैं, तो वहीं नाना पाटेकर के लिए पैसा हमेशा चौथे और सबसे निचले पायदान पर रहा. नाना ने साफ शब्दों में कहा था, “चौथी बात आती है कि मुझे पैसे मिलेंगे या नहीं! यह मेरे लिए हमेशा सबसे आखिरी बात रही है. अगर ऊपर की तीनों शर्तें पूरी हैं और काम में ईमानदारी है, तो पैसे कम भी हों या देर से मिलें, मुझे फर्क नहीं पड़ता.”







