प्रकाश मेहरा
एक्जीक्यूटिव एडिटर
नई दिल्ली। देश के महत्वपूर्ण औद्योगिक, आर्थिक और रणनीतिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) अपने प्रशासनिक और परिचालन ढांचे में बड़ा बदलाव करने जा रहा है। गृह मंत्रालय (MHA) की मंजूरी के बाद नया ढांचा 1 नवंबर 2026 से लागू होना प्रस्तावित है। इस पुनर्गठन के तहत सुरक्षा व्यवस्था को पारंपरिक क्षेत्रीय कमान से आगे बढ़ाकर संबंधित प्रतिष्ठानों और उनके कार्यक्षेत्रों यानी ‘डोमेन’ के आधार पर व्यवस्थित किया जाएगा।
इस बदलाव का प्रमुख उद्देश्य बिजली, कोयला, स्टील, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस, बंदरगाह, सरकारी भवनों, संग्रहालयों, स्मारकों और मेट्रो जैसे विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्ट सुरक्षा जरूरतों के अनुरूप कमान और निगरानी व्यवस्था विकसित करना है। इससे सुरक्षा संबंधी विशेषज्ञता बढ़ाने, परिचालन निगरानी मजबूत करने, मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) में एकरूपता लाने और संबंधित मंत्रालयों, विभागों तथा प्रतिष्ठानों के प्रबंधन के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
क्षेत्रीय व्यवस्था से डोमेन आधारित सुरक्षा की ओर बड़ा कदम
सीआईएसएफ देश के हवाई अड्डों, बंदरगाहों, परमाणु एवं अंतरिक्ष प्रतिष्ठानों, बिजली संयंत्रों, स्टील प्लांटों, कोयला खदानों, पेट्रोलियम रिफाइनरियों, सरकारी भवनों, ऐतिहासिक स्मारकों और मेट्रो नेटवर्क सहित अनेक महत्वपूर्ण परिसंपत्तियों की सुरक्षा करता है। इन सभी प्रतिष्ठानों की कार्यप्रणाली, बुनियादी ढांचे और संभावित सुरक्षा जोखिमों की प्रकृति अलग-अलग होती है।
ऐसे में प्रत्येक क्षेत्र की जरूरतों के अनुरूप विशेष सुरक्षा रणनीति तैयार करना आवश्यक है। पहले बल की कमान व्यवस्था में क्षेत्रीय यानी Territorial आधार की प्रमुख भूमिका थी। हालांकि, पिछले वर्षों में सीआईएसएफ ने विमानन क्षेत्र, परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) और अंतरिक्ष विभाग (DoS) जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में कार्यात्मक यानी Functional आधार पर सुरक्षा प्रबंधन विकसित किया।
इन क्षेत्रों के अनुभव से यह स्पष्ट हुआ कि समान प्रकृति के प्रतिष्ठानों को एक ही कमान के अंतर्गत रखने से प्रशिक्षण, सुरक्षा प्रोटोकॉल, निगरानी और संबंधित प्रबंधन के साथ समन्वय को बेहतर बनाया जा सकता है। इसी दृष्टिकोण को व्यापक स्तर पर लागू करने के उद्देश्य से अब अन्य क्षेत्रीय सेक्टरों का भी पुनर्गठन किया जा रहा है।
नए ढांचे में कौन-कौन से सेक्टर होंगे ?
पुनर्गठन के तहत मौजूदा सेक्टरों को अलग-अलग कार्यक्षेत्रों की जरूरतों के अनुरूप नई जिम्मेदारियां दी गई हैं।
1. सरकारी भवन, संग्रहालय, स्मारक और MRTS सेक्टर
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) सेक्टर को पुनर्गठित कर सरकारी भवनों, संग्रहालयों, स्मारकों और मास रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (MRTS) से संबंधित सुरक्षा जिम्मेदारियों के लिए नया सेक्टर बनाया जाएगा। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में होगा।
2. पावर सेक्टर-I और पावर सेक्टर-II
बिजली क्षेत्र की सुरक्षा को विशेषीकृत करने के लिए नॉर्थ सेक्टर, नई दिल्ली को पावर-I सेक्टर और नॉर्थ ईस्टर्न सेक्टर-II, कोलकाता को पावर-II सेक्टर के रूप में पुनर्गठित किया जाएगा।
3. कोयला और स्टील सेक्टर
ईस्टर्न सेक्टर, रांची को कोयला सेक्टर में बदला जाएगा, जबकि सेंट्रल सेक्टर, भिलाई को स्टील सेक्टर के रूप में विकसित किया जाएगा। इससे कोयला खदानों और इस्पात संयंत्रों की विशिष्ट सुरक्षा चुनौतियों पर केंद्रित निगरानी की जा सकेगी।
4. पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस सेक्टर
गुवाहाटी स्थित नॉर्थ ईस्टर्न सेक्टर को पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस सेक्टर के रूप में पुनर्गठित किया जाएगा। यह बदलाव तेल एवं गैस क्षेत्र के महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा जरूरतों पर विशेष ध्यान केंद्रित करने की दिशा में अहम कदम होगा।
5. पश्चिमी और पूर्वी तट के बंदरगाह सेक्टर
समुद्री व्यापार और बंदरगाहों की सुरक्षा को अधिक प्रभावी बनाने के लिए मुंबई स्थित वेस्टर्न सेक्टर को वेस्ट कोस्ट पोर्ट सेक्टर तथा चेन्नई स्थित साउथ सेक्टर को ईस्ट कोस्ट पोर्ट सेक्टर के रूप में पुनर्गठित किया जाएगा।
वहीं, बेंगलुरु स्थित DAE एवं DoS सेक्टर, नई दिल्ली स्थित एयरपोर्ट सेक्टर-I और बेंगलुरु स्थित एयरपोर्ट सेक्टर-II अपनी मौजूदा कार्यात्मक व्यवस्था के तहत काम करते रहेंगे।
बढ़ती जिम्मेदारियों के बीच क्यों अहम है यह बदलाव ?
सीआईएसएफ की भूमिका अब पारंपरिक औद्योगिक सुरक्षा तक सीमित नहीं रह गई है। देश के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और रणनीतिक परिसंपत्तियों की सुरक्षा में बढ़ती जिम्मेदारियों के साथ बल को नई चुनौतियों के अनुरूप अपनी क्षमताओं का विस्तार करना पड़ रहा है।
बंदरगाह सुरक्षा के क्षेत्र में सीआईएसएफ को अंतरराष्ट्रीय जहाज एवं बंदरगाह सुविधा सुरक्षा संहिता (ISPS Code) के तहत मान्यता प्राप्त सुरक्षा संगठन (RSO) के रूप में नामित किया गया है। ऐसे में बंदरगाहों के लिए विशेषीकृत कमान व्यवस्था विकसित करना समुद्री सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इसके अतिरिक्त, जम्मू-कश्मीर में अति-संवेदनशील जेलों की सुरक्षा की जिम्मेदारी और क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए हवाई सुरक्षा (Aerial Security) की नोडल एजेंसी के रूप में भूमिका भी बल की जिम्मेदारियों के विस्तार को दर्शाती है।
इन नई चुनौतियों से निपटने के लिए विशेष प्रशिक्षण, स्पष्ट जवाबदेही और विभिन्न एजेंसियों के बीच प्रभावी समन्वय आवश्यक है।
साइबर सुरक्षा और ड्रोन से निपटने की क्षमता पर भी जोर
तकनीक आधारित खतरों के बढ़ते प्रभाव के बीच सीआईएसएफ साइबर सुरक्षा, ड्रोन और एंटी-ड्रोन क्षमताओं को मजबूत करने पर भी ध्यान दे रहा है। प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ सहयोग के माध्यम से इन क्षेत्रों में विशेषज्ञता विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों को संभावित साइबर हमलों और संदिग्ध ड्रोन गतिविधियों से सुरक्षित रखने की क्षमता बढ़ाई जा सके।
आज महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा केवल भौतिक निगरानी तक सीमित नहीं है। तकनीकी प्रणालियों, डिजिटल नेटवर्क और हवाई निगरानी से जुड़े जोखिम भी सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में डोमेन आधारित व्यवस्था बल को प्रत्येक क्षेत्र के जोखिमों के अनुरूप रणनीति तैयार करने में मदद कर सकती है।
भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों के लिए तैयार होगा CISF
सीआईएसएफ का यह पुनर्गठन भारत के महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक बुनियादी ढांचे की सुरक्षा व्यवस्था को अधिक विशेषज्ञतापूर्ण और जवाबदेह बनाने की दिशा में एक अहम पहल है। क्षेत्रीय कमान से कार्यात्मक विशेषज्ञता की ओर बढ़ने से समान प्रकृति के प्रतिष्ठानों के लिए बेहतर प्रशिक्षण, एकरूप सुरक्षा मानक और अधिक प्रभावी परिचालन निगरानी विकसित करने का अवसर मिलेगा।
कुल मिलाकर, इस बदलाव का लक्ष्य सीआईएसएफ को भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों के लिए अधिक सक्षम, तकनीक-संपन्न और क्षेत्र-विशेष की जरूरतों के अनुरूप तैयार करना है। देश की आर्थिक प्रगति, औद्योगिक गतिविधियों और रणनीतिक हितों की रक्षा में यह नया ढांचा महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।







