प्रकाश मेहरा
विशेष डेस्क
नई दिल्ली। किसी भी सरकार की असली पहचान उसके दावों और घोषणाओं से नहीं, बल्कि समय पर पूरे किए गए कार्यों से होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार अपने तीसरे कार्यकाल के तीसरे वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। ऐसे में अब सरकार के सामने आगामी लोकसभा चुनावों के साथ-साथ विभिन्न राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों की चुनौती भी है। यह समय केवल राजनीतिक रणनीति बनाने का नहीं, बल्कि वर्षों से लंबित महत्वपूर्ण कार्यों को गति देने का भी है।
पिछले कई महीनों से केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल और विस्तार की अटकलें लगती रही हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन में हुई देरी की तरह मंत्रिमंडल विस्तार का मामला भी लंबे समय से प्रतीक्षा सूची में है। सवाल यह है कि जब सरकार के सामने नई चुनौतियां हैं, तब प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था को नई ऊर्जा देने वाले फैसलों में देरी क्यों हो रही है?
विपक्ष के हमलों के बीच सरकार के सामने नई चुनौती
पिछले कुछ समय से विपक्ष लगातार सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है। संसद से लेकर राजनीतिक मंचों तक विभिन्न मुद्दों पर सत्ता पक्ष को जवाब देना पड़ रहा है। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर विपक्ष के आरोप भी राजनीतिक बहस का विषय बने हुए हैं। इस मामले में न्यायपालिका के रुख और आगामी फैसलों पर सभी की नजरें हैं। ऐसे राजनीतिक वातावरण में सरकार के लिए आवश्यक है कि वह केवल आरोपों का जवाब देने तक सीमित न रहे, बल्कि अपने कामकाज के जरिए जनता के बीच विश्वास और सकारात्मकता का नया माहौल बनाए।
मंत्रिमंडल विस्तार अब केवल राजनीतिक नहीं, प्रशासनिक जरूरत
केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल और विस्तार की आवश्यकता केवल राजनीतिक संतुलन बनाने तक सीमित नहीं है। कई मंत्रालयों में अतिरिक्त प्रभार की व्यवस्था है और कुछ महत्वपूर्ण विभागों के कामकाज पर भी इसका असर पड़ सकता है। शिक्षा जैसे अहम मंत्रालय को लंबे समय तक अतिरिक्त प्रभार के सहारे चलाना उचित नहीं माना जा सकता।
शिक्षा मंत्रालय के सामने केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कुलपतियों और शिक्षकों के रिक्त पद भरने से लेकर शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने तक कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं। ऐसे में पूर्णकालिक नेतृत्व और समयबद्ध निर्णय बेहद जरूरी हैं। यही स्थिति केंद्र सरकार के अधीन कई संस्थानों और निकायों की भी है, जहां महत्वपूर्ण पद लंबे समय से खाली पड़े हैं। सवाल उठता है कि बड़े और कठिन फैसले लेने वाली सरकार नियुक्तियों और संस्थागत व्यवस्थाओं को समय पर पूरा करने में पीछे क्यों रह जाती है?
12 वर्षों बाद भी पुलिस और प्रशासनिक सुधारों का इंतजार
मोदी सरकार के कार्यकाल में कई बड़े राजनीतिक और नीतिगत निर्णय हुए हैं। राम मंदिर निर्माण और अनुच्छेद 370 को समाप्त करना भाजपा के प्रमुख एजेंडे में शामिल रहा, जिन्हें पूरा किया गया। लेकिन पुलिस सुधार और प्रशासनिक सुधार जैसे बुनियादी विषय अब भी अपेक्षित गति नहीं पकड़ पाए हैं।
नौकरशाही में भ्रष्टाचार और आम नागरिकों को सरकारी कार्यालयों में होने वाली परेशानियां आज भी गंभीर चुनौती हैं। शीर्ष स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के प्रयासों के बावजूद निचले और मध्यम स्तर पर भ्रष्टाचार की शिकायतें बनी हुई हैं। इसलिए प्रशासनिक सुधारों को केवल नीतिगत चर्चा तक सीमित रखने के बजाय जमीन पर लागू करने की जरूरत है। पुलिस व्यवस्था को जवाबदेह, पारदर्शी और नागरिकों के प्रति संवेदनशील बनाना भी समय की मांग है।
न्यायिक सुधार और समान नागरिक संहिता पर भी स्पष्ट पहल जरूरी
पुलिस और प्रशासनिक सुधारों की तरह न्यायिक सुधार भी लंबे समय से चर्चा में हैं। अदालतों में लंबित मुकदमों का बोझ, न्याय मिलने में देरी और न्यायिक व्यवस्था की कार्यक्षमता जैसे सवाल आम नागरिकों को सीधे प्रभावित करते हैं। न्यायपालिका और सरकार के बीच संवैधानिक दायरे का सम्मान करते हुए न्यायिक सुधारों की दिशा में सार्थक संवाद और पहल आवश्यक है।
इसी तरह समान नागरिक संहिता भाजपा के प्रमुख वैचारिक एजेंडों में रही है। उत्तराखंड जैसे राज्यों में इस दिशा में पहल हुई है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इस विषय पर सरकार की आगे की रणनीति और स्पष्टता का इंतजार है।
अब घोषणाओं से आगे बढ़कर परिणाम देने का समय
किसी भी सरकार के लिए शुरुआती वर्षों में अपनी प्राथमिकताएं तय करना और नीतिगत दिशा निर्धारित करना महत्वपूर्ण होता है। लेकिन कार्यकाल के आगे बढ़ने के साथ जनता परिणामों की अपेक्षा करती है। मोदी सरकार के सामने आज अवसर भी है और चुनौती भी। मंत्रिमंडल को नई ऊर्जा देना, रिक्त पदों पर नियुक्तियां करना, शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना, पुलिस एवं प्रशासनिक सुधार लागू करना और न्यायिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाना समय की मांग है।
राजनीति में नया नैरेटिव केवल नारों से नहीं बनता, बल्कि उन कामों से बनता है जिनका सीधा लाभ आम नागरिक को मिलता है। सरकार के लिए अब सबसे बड़ा अवसर यही है कि वह वर्षों से लंबित कार्यों को प्राथमिकता दे और अपने संकल्पों को धरातल पर उतारे। आखिरकार, मजबूत सरकार की सबसे बड़ी पहचान यही है कि उसके फैसले समय पर हों और उनका लाभ जनता तक पहुंचे।







