प्रकाश मेहरा
एग्जीक्यूटिव एडिटर
नई दिल्ली। अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की शानदार जीत ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के राजनीतिक भविष्य और उनकी सरकार की नीतियों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। चुनाव परिणामों को अमेरिकी मतदाताओं की ओर से ट्रंप प्रशासन के कामकाज पर एक महत्वपूर्ण जनमत संग्रह के रूप में देखा जा रहा है। डेमोक्रेट्स ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस के दोनों सदनों में बढ़त हासिल की और गवर्नर पदों के चुनावों में भी उल्लेखनीय सफलता दर्ज की। इस राजनीतिक बदलाव को अमेरिकी राजनीति में ‘ब्लू सुनामी’ के रूप में देखा जा रहा है।
चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा की 22, सीनेट की छह और गवर्नर पदों की चार सीटों पर जीत दर्ज की। इस परिणाम ने रिपब्लिकन पार्टी के उस राजनीतिक दबदबे को चुनौती दी है, जिसके सहारे ट्रंप अपनी नीतियों को आगे बढ़ा रहे थे। चुनाव में कई अनुभवी रिपब्लिकन नेताओं को हार का सामना करना पड़ा। वहीं टेक्सस में लैटिन मूल की महिला का गवर्नर पद तक पहुंचना और एक मुस्लिम उम्मीदवार का सीनेट में निर्वाचित होना अमेरिकी राजनीति में बदलते सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों की ओर संकेत करता है।
ट्रंप की नीतियों पर जनता का जवाब
इस चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि अमेरिकी मतदाता अब केवल राजनीतिक नारों और राष्ट्रवादी अपीलों के आधार पर अपना फैसला नहीं कर रहे, बल्कि उनकी प्राथमिकता महंगाई, रोजगार, ऊर्जा की कीमतें, स्वास्थ्य सुविधाएं और जीवनयापन की बढ़ती लागत जैसे सीधे प्रभावित करने वाले मुद्दे हैं।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव में अपनी पार्टी के खराब प्रदर्शन की जिम्मेदारी स्वीकार करने से इनकार किया। उनका कहना था कि वह स्वयं चुनाव नहीं लड़ रहे थे। हालांकि चुनाव से पहले उन्होंने मतदाताओं से अपनी पार्टी के उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान करने की अपील करते हुए इसे अपने समर्थन के बराबर बताया था। ऐसे में चुनाव परिणामों को ट्रंप की लोकप्रियता और उनकी नीतियों के प्रति जनता के बदलते नजरिये से अलग करके देखना मुश्किल है।
डेमोक्रेट्स की जीत ने यह भी स्पष्ट किया है कि अमेरिकी राजनीति में सत्ता विरोधी लहर किस तरह चुनावी समीकरण बदल सकती है। हालांकि चुनावी जीत को शासन चलाने की सफलता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। अब डेमोक्रेटिक पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने चुनावी वादों को वास्तविक नीतियों में बदलने और आम जनता को उनका लाभ पहुंचाने की होगी।
महंगाई और पेट्रोल की कीमतें बनीं चुनावी हार की बड़ी वजह
इस चुनाव में महंगाई सबसे प्रभावशाली मुद्दों में शामिल रही। अमेरिका में आम नागरिक लंबे समय से बढ़ती कीमतों, महंगे आवास, स्वास्थ्य सेवाओं और रोजमर्रा की जरूरतों पर बढ़ते खर्च से परेशान हैं। इसके अलावा ट्रंप प्रशासन की आयात शुल्क संबंधी नीतियों और ईरान के साथ युद्ध के कारण ऊर्जा बाजार में पैदा हुए दबाव ने भी आर्थिक चिंताओं को बढ़ाया।
पेट्रोल की कीमतों में उछाल का सीधा असर आम अमेरिकी परिवारों के बजट पर पड़ा। परिवहन, खाद्य पदार्थों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर भी इसका प्रभाव महसूस किया गया। ऐसे में मतदाताओं ने आर्थिक मुद्दों को प्राथमिकता देते हुए डेमोक्रेट्स को समर्थन दिया।
डेमोक्रेटिक पार्टी ने चुनाव के दौरान उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित करने, किराये में बढ़ोतरी पर अंकुश लगाने, स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक किफायती बनाने और आवास क्षेत्र में सरकारी सहायता बढ़ाने जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी। पार्टी ने स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने और आयात शुल्क में कटौती का भी समर्थन किया है।
हालांकि इन योजनाओं को लागू करना आसान नहीं होगा। सरकारी खर्च बढ़ाने के लिए अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता होगी और अमेरिका पहले से ही भारी सार्वजनिक कर्ज के बोझ का सामना कर रहा है। ऐसे में डेमोक्रेट्स को यह साबित करना होगा कि वे आर्थिक राहत देने के साथ-साथ सरकारी वित्तीय व्यवस्था को भी संतुलित रख सकते हैं।
व्यापार शुल्क और आर्थिक नीतियों पर बढ़ेगा टकराव
ट्रंप प्रशासन की आयात शुल्क नीति भी चुनावी बहस का एक महत्वपूर्ण विषय रही है। राष्ट्रपति ट्रंप ने घरेलू उद्योगों को संरक्षण देने और विदेशी उत्पादों पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से ऊंचे आयात शुल्क लगाने की नीति अपनाई थी। लेकिन आलोचकों का मानना है कि इससे अमेरिकी कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ती है और अंततः इसका बोझ उपभोक्ताओं को उठाना पड़ता है।
डेमोक्रेट्स आयात शुल्क में कटौती और व्यापारिक नीतियों की समीक्षा की मांग कर सकते हैं। हालांकि इस मुद्दे पर पार्टी के सामने भी राजनीतिक चुनौती है। श्रमिक संगठनों और छोटे कारोबारियों का एक बड़ा वर्ग विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाव के लिए आयात शुल्क का समर्थन करता रहा है।
पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन के कार्यकाल में भी ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए कई शुल्कों को बरकरार रखा गया था। इसकी एक वजह घरेलू उद्योगों और श्रमिक वर्ग के बीच संरक्षणवादी नीतियों का समर्थन था। इसलिए डेमोक्रेट्स के लिए आयात शुल्क में व्यापक बदलाव करना राजनीतिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य पर दुनिया की नजर
अमेरिकी चुनाव परिणामों का प्रभाव केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सीधा असर अमेरिका की विदेश नीति और पश्चिम एशिया में जारी तनाव पर भी पड़ सकता है। विशेष रूप से ईरान के साथ युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिकी रणनीति आने वाले दिनों में महत्वपूर्ण मुद्दे बने रहेंगे।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्गों में शामिल है। वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। यहां किसी भी तरह की नाकेबंदी या सैन्य तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों, परिवहन लागत और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
डेमोक्रेट्स ट्रंप प्रशासन से ईरान के साथ युद्ध की रणनीति, सैन्य कार्रवाई और उसके आर्थिक परिणामों पर जवाब मांग सकते हैं। हालांकि यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या नई कांग्रेस युद्ध समाप्त करने के लिए ठोस राजनीतिक दबाव बना पाएगी। इससे पहले रिपब्लिकन नियंत्रण वाली कांग्रेस में भी ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को लेकर मतभेद सामने आए थे। युद्ध रोकने की मांग से जुड़े प्रस्ताव पर द्विदलीय समर्थन मिलने के बावजूद राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने संवैधानिक अधिकारों का हवाला देते हुए अपनी रणनीति जारी रखी।
अब डेमोक्रेट्स के पास कांग्रेस में अधिक प्रभाव होने से सैन्य अभियानों के लिए बजट, युद्ध संबंधी प्रस्तावों और प्रशासन की जवाबदेही पर बहस तेज करने का अवसर होगा। हालांकि विदेश नीति और सैन्य कमान के मामले में राष्ट्रपति के अधिकारों को देखते हुए कांग्रेस की भूमिका की भी अपनी सीमाएं हैं।
ट्रंप के लिए कांग्रेस में फैसले लेना होगा मुश्किल
डेमोक्रेट्स की जीत का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रभाव अमेरिकी कांग्रेस में दिखाई देगा। यदि दोनों सदनों पर उनका नियंत्रण बना रहता है, तो ट्रंप प्रशासन के लिए अपनी विधायी प्राथमिकताओं को आसानी से पारित कराना मुश्किल होगा। अमेरिका में राष्ट्रपति को कई महत्वपूर्ण फैसलों के लिए कांग्रेस की मंजूरी और बजट की आवश्यकता होती है। ऐसे में डेमोक्रेट्स सरकारी खर्च, सैन्य बजट, व्यापारिक नीतियों और प्रशासनिक नियुक्तियों से जुड़े मुद्दों पर ट्रंप सरकार को चुनौती दे सकते हैं।
कांग्रेस की समितियां भी प्रशासन के कामकाज की जांच कर सकती हैं। विभिन्न नीतियों, सरकारी खर्च और राष्ट्रपति के फैसलों को लेकर सुनवाई और जांच की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। इससे ट्रंप प्रशासन पर राजनीतिक और संस्थागत दबाव बढ़ना तय माना जा रहा है। हालांकि राष्ट्रपति के पास वीटो का संवैधानिक अधिकार मौजूद है। वह कांग्रेस से पारित किसी विधेयक को मंजूरी देने से इनकार कर सकते हैं। राष्ट्रपति के वीटो को निष्प्रभावी करने के लिए कांग्रेस के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। मौजूदा राजनीतिक ध्रुवीकरण को देखते हुए ऐसा बहुमत हासिल करना डेमोक्रेट्स के लिए आसान नहीं होगा।
कार्यकारी आदेशों के सहारे आगे बढ़ सकती है ट्रंप सरकार
अपने दूसरे कार्यकाल में राष्ट्रपति ट्रंप ने नीतिगत फैसलों को लागू करने के लिए कार्यकारी आदेशों का व्यापक इस्तेमाल किया है। कांग्रेस में विरोध बढ़ने की स्थिति में वह इस रास्ते पर अपनी निर्भरता और बढ़ा सकते हैं।
कार्यकारी आदेशों के माध्यम से राष्ट्रपति संघीय प्रशासन को दिशा दे सकते हैं और मौजूदा कानूनों के दायरे में कई नीतिगत फैसले लागू कर सकते हैं। हालांकि ऐसे आदेशों को अदालतों में चुनौती दी जा सकती है और न्यायिक समीक्षा के बाद उन्हें रोका या सीमित किया जा सकता है।
इस तरह आने वाले समय में अमेरिका की राजनीति केवल राष्ट्रपति और कांग्रेस के बीच टकराव तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसमें अदालतों और विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
डेमोक्रेट्स के सामने भी कम नहीं हैं चुनौतियां
डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए यह जीत निश्चित रूप से बड़ी राजनीतिक उपलब्धि है, लेकिन इसे स्थायी जनसमर्थन में बदलना आसान नहीं होगा। चुनाव जीतना और सरकार की नीतियों को सफलतापूर्वक लागू करना दो अलग-अलग बातें हैं। महंगाई पर नियंत्रण, आवास की उपलब्धता, स्वास्थ्य सेवाओं की लागत में कमी और रोजगार के अवसर बढ़ाने जैसे वादों को पूरा करने के लिए ठोस आर्थिक योजनाओं की जरूरत होगी। इसके साथ ही पार्टी को अपने भीतर मौजूद अलग-अलग विचारधाराओं और प्राथमिकताओं के बीच भी संतुलन बनाना होगा। यदि डेमोक्रेट्स अपने वादों को पूरा करने में सफल नहीं होते हैं, तो आने वाले चुनावों में उन्हें भी मतदाताओं की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है।
आने वाले दो वर्ष तय करेंगे अमेरिकी राजनीति की दिशा
मध्यावधि चुनाव के नतीजों ने राष्ट्रपति ट्रंप के लिए उनके दूसरे कार्यकाल का शेष समय राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण बना दिया है। कांग्रेस में डेमोक्रेट्स की मजबूत स्थिति उनके फैसलों की समीक्षा, बजट पर नियंत्रण और नीतियों के विरोध का नया आधार तैयार करेगी। महंगाई और आर्थिक असंतोष से लेकर ईरान युद्ध और वैश्विक व्यापार तक कई ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर ट्रंप प्रशासन को जवाब देना पड़ सकता है। दूसरी ओर डेमोक्रेट्स के सामने यह साबित करने की जिम्मेदारी होगी कि वे केवल विरोध की राजनीति नहीं, बल्कि बेहतर विकल्प देने की क्षमता भी रखते हैं।
इस चुनाव का असर अमेरिका की सीमाओं से बाहर भी महसूस किया जा सकता है। अमेरिकी व्यापार नीति, डॉलर की स्थिति, ऊर्जा बाजार, पश्चिम एशिया में सैन्य रणनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में आने वाले बदलाव भारत समेत दुनिया के कई देशों को प्रभावित कर सकते हैं।
कुल मिलाकर, डेमोक्रेट्स की यह जीत ट्रंप के राजनीतिक अधिकारों को समाप्त नहीं करती, लेकिन उनकी नीतियों को बिना चुनौती आगे बढ़ाने की संभावनाओं को जरूर सीमित करती है। अब अमेरिकी राजनीति का अगला अध्याय राष्ट्रपति और कांग्रेस के बीच शक्ति संतुलन, आर्थिक नीतियों की दिशा और ईरान युद्ध जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से तय होगा। आने वाले दो वर्ष यह स्पष्ट करेंगे कि यह जीत अमेरिकी राजनीति में एक अस्थायी बदलाव है या ट्रंपवाद के खिलाफ व्यापक जनादेश की शुरुआत।







