प्रकाश मेहरा
मनोरंजन डेस्क
नई दिल्ली। भारत की सड़कों पर भले ही राजनीतिक जुनून और हलचल दिखाई दे रही हो, लेकिन सिनेमा के पर्दे पर इन दिनों एक अलग ही लहर उठ रही है। यह लहर है धार्मिक आस्था और सनातन विश्वास की। कभी एकांत में रहना पसंद करने वाले और भीड़ से दूर निकल जाने वाले नीम करौली बाबा पर बनी फिल्म ने सिनेमाघरों में ऐसा चमत्कार कर दिखाया है, जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी। अगस्त की शुरुआत में रिलीज हुई इस फिल्म को अब तक लगभग 2 करोड़ लोग सिनेमाघरों में देख चुके हैं।
लेखक-निर्देशक विशाल चतुर्वेदी की महज 1.7 करोड़ रुपये के छोटे बजट में बनी फिल्म ‘हनुमान अंश’ (Hanuman Ansh) ने दुनियाभर में 400 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई कर ली है और कमाई का यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। फिल्म की यह अप्रत्याशित सफलता केवल बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने एक व्यापक सांस्कृतिक प्रभाव पैदा कर दिया है।
सिनेमाघरों में दर्शक अपने जूते-चप्पल उतारकर प्रार्थना कर रहे हैं और कई लोग भावुक होकर आंसू बहाते नजर आ रहे हैं। उत्तराखंड स्थित नीम करौली बाबा के धाम कैंची में श्रद्धालुओं की संख्या अचानक बढ़ गई है। वहीं, सोनी ने भी बाबा के जीवन और उनसे जुड़े विषयों पर एक शो बनाने की पहल शुरू कर दी है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह फिल्म भारतीय लोकप्रिय सिनेमा की बदलती दिशा का अब तक का सबसे स्पष्ट संकेत दे रही है। आने वाले कुछ वर्षों में बॉक्स ऑफिस पर देवी-देवताओं, धार्मिक आस्था और सनातन परंपराओं की कहानियों का बड़ा प्रभाव दिखाई देने वाला है।
‘रामायण’ बनेगी सबसे बड़ा आकर्षण
आने वाले समय में पुराणों और सनातन परंपराओं का सबसे भव्य रूप एक बड़े सिनेमाई प्रोजेक्ट में दिखाई देने वाला है। दीपावली के अवसर पर सितारों से सजी फिल्म ‘रामायण: द राइज ऑफ ए लीजेंड’ (भाग-1) सिनेमाघरों में दस्तक देने जा रही है। भारतीयों के हृदय में सदियों से बसी रामायण की यह एक और सिनेमाई प्रस्तुति होगी। यह फिल्म इस बात का प्रमाण है कि फिल्म उद्योग अब धार्मिक आस्था पर आधारित फिल्मों में बड़े स्तर पर निवेश करने को तैयार है। फिल्म में रणबीर कपूर भगवान राम की भूमिका में, साई पल्लवी माता सीता की भूमिका में, सनी देओल हनुमान जी की भूमिका में और यश रावण की भूमिका में नजर आएंगे।
विशेष भूमिकाओं और हास्य किरदारों को छोड़ दें तो संभवतः यह पहला अवसर होगा, जब बॉलीवुड का कोई बड़ा मुख्यधारा का अभिनेता दक्षिण भारतीय सिनेमा के उन दिग्गज कलाकारों की परंपरा में दिखाई देगा, जिन्होंने पर्दे पर देवी-देवताओं का किरदार निभाया है। इस दो भागों वाली फिल्म का बजट लगभग 4,000 करोड़ रुपये बताया गया है। फिल्म में अत्याधुनिक स्पेशल इफेक्ट्स के साथ संगीत की भी विशेष भूमिका होगी। इसके संगीत में ए.आर. रहमान और जर्मन संगीतकार हैंस जिमर का योगदान होगा। हालांकि, इस फिल्म को दर्शकों से कैसी प्रतिक्रिया मिलती है, यही तय करेगा कि धार्मिक फिल्मों का यह नया दौर कितने लंबे समय तक जारी रहेगा।
2027 में बड़े पर्दे पर सनातन का संदेश
रामायण के बाद धार्मिक फिल्मों की कतार काफी लंबी है। वर्ष 2027 में रामायण का दूसरा भाग भी रिलीज होगा। इसी दौरान धार्मिक आस्था और पौराणिक कथाओं पर आधारित कई अन्य फिल्में भी दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए तैयार हैं। जनवरी में अक्षय खन्ना अभिनीत फिल्म ‘महाकाली’ रिलीज होने वाली है।इसके बाद फरवरी में दो एनिमेशन फिल्में दर्शकों के सामने आएंगी। इनमें से एक मां दुर्गा पर और दूसरी भगवान हनुमान पर आधारित होगी। इन दोनों फिल्मों को पूरी तरह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से तैयार किया गया है।
इसके अलावा मां काली और भगवान हनुमान पर आधारित अन्य फीचर फिल्में भी दर्शकों के सामने आएंगी। भगवान परशुराम के जीवन पर एक एनिमेटेड फिल्म भी बनाई जा रही है। यह सूची केवल देवी-देवताओं पर आधारित फिल्मों तक सीमित नहीं है। ‘हनुमान अंश’ की सफलता से प्रेरित होकर अब आध्यात्मिक गुरुओं और संतों के जीवन पर भी फिल्में बनाने की तैयारी हो रही है।
इनमें 14वीं शताब्दी के प्रसिद्ध संत रामदेव पीर के जीवन पर आधारित एक फिल्म शामिल है। वहीं, दूसरी फिल्म हमारे अपेक्षाकृत आधुनिक समय के एक प्रसिद्ध आध्यात्मिक व्यक्तित्व देवरहा बाबा के जीवन को बड़े पर्दे पर जीवंत करेगी। देवरहा बाबा वही संत थे, जिनके बारे में प्रसिद्ध है कि वे अपने भक्तों को अपने पैरों से आशीर्वाद दिया करते थे।
आंकड़े दे रहे हैं गवाही, आस्था में छिपी है अपार शक्ति
अगर किसी को इस बदलते सिनेमाई दौर के प्रमाण चाहिए तो उसके लिए बॉक्स ऑफिस के आंकड़े ही काफी हैं। वर्ष 2025 में रिलीज हुई फिल्म ‘महावतार नरसिंह’ ने लगभग 250 करोड़ रुपये की कमाई की। भारतीय एनिमेशन फिल्मों के इतिहास में यह एक अभूतपूर्व उपलब्धि थी।इसी वर्ष जनवरी में भगवान श्रीकृष्ण पर आधारित एक फिल्म ने गुजराती सिनेमा के इतिहास में अब तक की सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म का रिकॉर्ड बना दिया।
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की वजह बताते हुए ‘महावतार नरसिंह’ के निर्देशक अश्विन कुमार कहते हैं, “अगर एक करोड़ लोग कुंभ मेले में पहुंच सकते हैं, तो आप समझ सकते हैं कि हमारे देश में आस्था से जुड़ी कहानियों को पसंद करने वाले लोगों का कितना विशाल जनसमूह मौजूद है। हमें बस उन्हें ऐसी कहानियां देनी हैं, जिन पर वे वास्तव में विश्वास करते हैं और उन्हें पूरे आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करना है।”
‘हनुमान अंश’ के निर्माण की वास्तविक कहानी
‘हनुमान अंश’ के निर्माण की वास्तविक कहानी भी इसी विचार को पूरी तरह साबित करती है। इस फिल्म के निर्माता और निर्देशक विशाल चतुर्वेदी कोई ऐसे बड़े फिल्मी कारोबारी नहीं थे, जो केवल किसी लोकप्रिय चलन का फायदा उठाना चाहते थे। वे स्वयं नीम करौली बाबा के भक्त हैं और उन्होंने अपनी आंतरिक आध्यात्मिक प्रेरणा को फिल्म का रूप दिया।
नीम करौली बाबा ने वर्ष 1973 में अपना शरीर त्याग दिया था, लेकिन उत्तराखंड स्थित उनका कैंची धाम आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है। इसी धाम तक वर्ष 1974 में 19 वर्षीय स्टीव जॉब्स भी पहुंचे थे। उस समय वे कॉलेज छोड़ चुके थे और हिप्पी जीवनशैली से प्रभावित होकर आध्यात्मिक खोज में भारत आए थे। बाद में उन्होंने नीम करौली बाबा के प्रति अपनी श्रद्धा की चर्चा मार्क जुकरबर्ग तक भी पहुंचाई थी।
रातोंरात मुख्य अभिनेता की भूमिका
हालांकि, विशाल चतुर्वेदी का उस समय न तो फिल्म उद्योग की बड़ी हस्तियों से कोई संपर्क था और न ही उनके पास बड़े स्तर पर फिल्म बनाने के संसाधन थे। फिल्म के लिए आर्थिक मदद जुटाना मुश्किल था। शूटिंग का समय बेहद सीमित था और आखिरी समय में एक आपात स्थिति पैदा हो गई। इसके चलते सहायक निर्देशक शोभिनव सत्य को रातोंरात मुख्य अभिनेता की भूमिका निभानी पड़ी।
फिल्म रिलीज होने के बाद पहला सप्ताह भी बेहद निराशाजनक रहा। इस दौरान फिल्म केवल 90 लाख रुपये की कमाई कर पाई। लेकिन विशाल चतुर्वेदी और शोभिनव सत्य ने हार नहीं मानी। दोनों ने अलग-अलग शहरों की यात्रा की, सिनेमाघरों में दर्शकों से मुलाकात की और लोगों से फिल्म के बारे में दूसरों को बताने की अपील की। इसके बाद जो हुआ, वह किसी चमत्कार से कम नहीं था। फिल्म ने ऐसी रफ्तार पकड़ी कि देखते ही देखते करोड़ों लोगों तक पहुंच गई। यह सफलता मानो नीम करौली बाबा की कृपा से घटित किसी चमत्कारिक कहानी जैसी बन गई।
सिनेमा में भक्ति और धार्मिक आस्था !
भारतीय सिनेमा में भक्ति और धार्मिक आस्था का स्थान कोई नई बात नहीं है। इसकी शुरुआत तो भारतीय फिल्म उद्योग के जन्म के साथ ही हो गई थी। वर्ष 1913 में दादासाहेब फाल्के ने भारत की पहली फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई थी, जो पौराणिक कथा पर आधारित थी। उनकी अगली तीन फिल्में भी इसी परंपरा से जुड़ी हुई थीं। वास्तव में, वर्ष 1931 से पहले मूक सिनेमा के दौर में बनी 1,388 फिल्मों में से लगभग 1,000 फिल्में भारतीय देवी-देवताओं और पौराणिक कथाओं पर आधारित थीं।
धार्मिक फिल्मों की यह लोकप्रियता कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। वर्ष 1936 में आई ‘संत तुकाराम’ से लेकर वर्ष 1975 में रिलीज हुई ‘जय संतोषी मां’ तक ऐसी कई फिल्में आईं, जिन्होंने दर्शकों के बीच जबरदस्त लोकप्रियता हासिल की। यहां तक कि ‘जय संतोषी मां’ ने वर्ष 1975 में रिलीज हुई सुपरहिट फिल्म ‘शोले’ को भी लोकप्रियता और दर्शकों की दीवानगी के मामले में कड़ी टक्कर दी थी।
इसके बाद 1980 के दशक में दूरदर्शन पर प्रसारित रामायण और महाभारत ने भारतीय समाज पर गहरी छाप छोड़ी। इन धारावाहिकों ने न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत किया, बल्कि उस समय के बदलते राजनीतिक और सामाजिक परिवेश के साथ भी अपना संबंध स्थापित किया। ऐसे में यह आश्चर्य की बात नहीं है कि वर्ष 2016 में स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) समर्थित संस्था भारतीय चित्र साधना भी धर्म और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों पर केंद्रित फिल्मों को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित कर रही है।
केवल राजनीति नहीं, दर्शकों की आस्था
हालांकि, केवल राजनीति के सहारे किसी सिनेमाघर को दर्शकों से नहीं भरा जा सकता। जैसा कि उप संपादक सुहानी सिंह की कवर स्टोरी में बताया गया है, इस बदलाव की असली वजह ऐसे दर्शक हैं, जिनके भीतर धार्मिक विश्वास और आस्था पहले से ही मौजूद है। जिन देवी-देवताओं और पौराणिक पात्रों की कहानियां हमारी दादियां और नानियां बचपन में हमें सुनाया करती थीं, वही कहानियां अब आधुनिक तकनीक, शानदार ग्राफिक्स और अत्याधुनिक साउंड सिस्टम के साथ बड़े पर्दे पर दिखाई दे रही हैं।
आस्था पुरानी है। श्रद्धा सदियों पुरानी है। हमारी संस्कृति और परंपराएं भी सदियों से जीवित हैं। लेकिन फिल्मों के जादू, भव्य दृश्यांकन और आधुनिक तकनीक के साथ इन कहानियों को प्रस्तुत करने का अंदाज नया है। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस आस्था के साथ जुड़ा आर्थिक कारोबार भी अब बेहद बड़ा हो चुका है।







