नई दिल्ली। पिछले साल 10 नवंबर को दिल्ली के लाल किले के पास हुए कार धमाके की जांच में एक बेहद हैरान कर देने वाला खुलासा हुआ है। इस खुलासे से ब्लास्ट में हाई-टेक ‘व्हाइट-कॉलर’ टेरर मॉड्यूल का पर्दाफाश हुआ है। जांच में सामने आया है कि इस मॉड्यूल में शामिल उच्च शिक्षित डॉक्टरों ने सुरक्षा एजेंसियों को चकमा देने के लिए ‘घोस्ट’ सिम कार्ड और एन्क्रिप्टेड ऐप्स का एक जटिल जाल बुना था। इसी मामले के सामने आने के बाद भारत सरकार ने संचार नियमों में बड़े बदलाव किए है।
टेरर मॉड्यूल का ‘डबल फोन’ प्रोटोकॉल
जांच अधिकारियों के अनुसार, गिरफ्तार किए गए डॉक्टर मुजम्मिल गनई, अदील राथर और अन्य सहयोगी एक विशेष ‘टैक्टिकल प्रोटोकॉल’ का पालन कर रहे थे। हर आरोपी के पास एक अपना निजी फोन था, जो उनके असली नाम पर रजिस्टर्ड था। इसका इस्तेमाल वे अपनी डॉक्टरी और निजी काम के लिए करते थे ताकि किसी को शक न हो। इसके साथ ही उनके पास एक दूसरा फोन होता था जिसे वे केवल पाकिस्तान में बैठे अपने हैंडलर से वॉट्सऐप और टेलीग्राम पर बात करने के लिए इस्तेमाल करते थे।इन फोन में लगे सिम कार्ड उन आम नागरिकों के नाम पर थे, जिनके आधार कार्ड का गलत इस्तेमाल किया गया था।
डॉ. उमर ने रची थी लाल किले ब्लास्ट की साजिश
लाल किले के पास विस्फोटकों से लदी कार चला रहा डॉ. उमर-उन-नबी धमाके में मारा गया था। इस हमले में कुल 15 लोगों की मौत हुई थी। पाकिस्तानी हैंडलर्स ने इन डॉक्टरों को यूट्यूब के जरिए IED असेंबली सिखाई थी। शुरुआत में ये डॉक्टर सीरिया या अफगानिस्तान जाकर लड़ना चाहते थे, लेकिन हैंडलर्स ने उन्हें भारत के भीतर ही ‘हिंगरलैंड’ हमले करने के लिए राजी किया। फरीदाबाद की अल-फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़े इन डॉक्टरों के पास से 2,900 किलो अमोनियम नाइट्रेट, पोटेशियम नाइट्रेट और सल्फर जैसे घातक विस्फोटक भी बरामद किए गए।
सरकार का बड़ा फैसला, अब सिम कार्ड के बिना नहीं चलेंगे ऐप्स
इस जांच के नतीजों के आधार पर दूरसंचार विभाग (DoT) ने 28 नवंबर को एक बड़ा निर्देश जारी किया। अब वॉट्सऐप, टेलीग्राम और सिग्नल जैसे ऐप्स को डिवाइस में लगे एक एक्टिव, फिजिकल सिम कार्ड से लगातार लिंक होना होगा। सभी कंपनियों को 90 दिनों के भीतर यह सुनिश्चित करना होगा कि सिम कार्ड न होने पर ऐप काम न करे।अगर फोन से सिम निकाल दिया जाता है, तो मैसेजिंग ऐप्स अपने आप लॉग-आउट हो जाएंगे। यह नियम साइबर धोखाधड़ी और आतंकी गतिविधियों को रोकने के लिए लाया गया है।
कैसे खुला राज?
इस मॉड्यूल की कलई 18-19 अक्टूबर 2025 की रात को खुली, जब श्रीनगर के बाहर प्रतिबंधित संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के पोस्टर लगे मिले। श्रीनगर के एसएसपी जी.वी. संदीप चक्रवर्ती के नेतृत्व में हुई जांच ने पुलिस को हरियाणा की यूनिवर्सिटी तक पहुंचाया, जहां से ‘व्हाइट-कॉलर’ आतंकियों की गिरफ्तारी हुई।







