प्रकाश मेहरा
स्पेशल डेस्क
नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया है। तेल और गैस की किल्लत तेजी से बढ़ रही है और इसका असर अब सिर्फ ऊर्जा सेक्टर तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि खाने-पीने की चीजों, खाद और दवाइयों तक पहुंच गया है।
ईरान द्वारा कतर के सबसे बड़े एलएनजी प्लांट पर हमले की खबर के बाद कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमत अचानक बढ़कर 113 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। वहीं, अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के चलते दुनिया के करीब 20% तेल की सप्लाई के लिए अहम होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से हालात और गंभीर हो गए हैं।
शहरों में स्थिति अभी भी चिंताजनक
इस संकट का असर कई देशों में साफ दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ गए हैं और कुछ जगहों पर कोरोना काल जैसे प्रतिबंध भी लागू किए गए हैं। भारत में भी एलपीजी की किल्लत देखने को मिल रही है। हालांकि सरकार ने उत्पादन बढ़ाने और LPG ATM जैसी पहल शुरू कर राहत देने की कोशिश की है, लेकिन कई शहरों में स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है।
दवाइयों की कीमतों में और बढ़ोतरी
ऊर्जा संकट के साथ-साथ दवाइयों पर भी असर दिखने लगा है। दिल्ली के भागीरथी पैलेस मार्केट में दवा व्यापारियों के अनुसार, दवाओं के लिए कच्चा माल ज्यादातर विदेशों से आता है, जिससे इंपोर्ट लागत बढ़ गई है। एल्युमिनियम और प्लास्टिक महंगे होने से पैकेजिंग की लागत भी बढ़ी है, जिसका सीधा असर दवाओं की कीमतों पर पड़ रहा है।
फिलहाल बुखार और डायबिटीज जैसी सामान्य बीमारियों की दवाइयों का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है, लेकिन अगर यह जंग लंबी चली, तो आने वाले समय में दवाइयों की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है।







