नई दिल्ली। बढ़ती महंगाई और घटती आमदनी ने आम आदमी को ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां से बिना कर्ज लिये अपने सपने सिर्फ सपने ही लगते हैं. आज के दौर में कर्ज जीवन की एक सच्चाई बन चुका है. चाहे घर खरीदना हो, बच्चों को अच्छी पढ़ाई करानी हो, या इलाज कराना हो, हमें हर काम के लिए लोन की जरूरत पड़ती है. लेकिन आपने कभी सोचा है कि आखिर इस दुनिया पर कितना कर्ज है. आइये बताते हैं.
इंटरनेशनल फाइनेंस इंस्टीट्यूट के मुताबिक साल 2025 के अंत तक पूरी दुनिया पर 348 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज चढ़ चुका है. कोरोना महामारी के बाद इस कर्ज में 29 ट्रिलियन डॉलर का इजाफा हुआ है.
रिपोर्ट के मुताबिक कर्ज के बढ़ने का सबसे बड़ा कारण सरकारें हैं. जिन्होंने इस बढ़ोतरी में 10 प्रतिशत से अधिक का योगदान दिया है.
अब सबसे बड़ा सवाल ये खड़ा होता है कि जब दुनिया में सब देश कर्ज में हैं तो फिर कर्ज दे कौन रहा है. इसकी सच्चाई कर्ज के सिस्टम में है.
कर्ज एक सर्कुलर सिस्टम है. जिसमें हर कर्जदार किसी ना किसी के लिए एक लेंडर (ऋणदाता) भी होता है. मतलब जो कर्ज ले रहा है, वह भी किसी दूसरे के लिए कर्जदाता है. दुनिया में कुल जितना कर्ज है, उतना ही कर्ज एसेट (debt assets) भी है. यानी कोई एक व्यक्ति या देश पूरा कर्ज नहीं दे रहा, बल्कि यह पैसा कई जगहों से आ रहा है.
ये कर्ज लेने वाले कौन हैं?
सरकारों को सबसे ज्यादा कर्ज आमलोग देते हैं. जैसे आपके बैंक में जमा पैसे, फिक्स्ड डिपॉजिट, पेंशन फंड वगैरा का बड़ा हिस्सा सरकार और कंपनियों के बॉन्ड में इनवेस्ट किया जाता है. जिससे मिलने वाले कर्ज से बैंकों को मुनाफा होता है. अगर अमेरिका की बात करें तो अमेरिका पर चढ़े कुल कर्ज का 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा उनके लोगों का है.
पेंशन फंड, इंश्योरेंस कंपनियां भी हैं बड़ा कर्जदाता
दुनिया के सबसे बड़े कर्जदाताओं में इंश्योरेंस कंपनियां, पेंशन फंड औऱ म्यूचुअल फंड वाली कंपनियां हैं. ये संस्थाएं लोगों से पैसा जमा कराकर सरकारी बॉन्ड में इनवेस्ट करती हैं. उससे होने वाले मुनाफे से वो आमलोगों को ब्याज देती हैं.
विदेशी निवेशक और सरकारें
- दुनिया के कई देश अमेरिका, यूरोप आदि के बॉन्ड खरीदते हैं. जिससे उनके पास डॉलर आता है.
- कुल मिलाकर पूरी दुनिया खुद के पैसे खुद ही में बांट रही हैं. इनमें सरकारें, बैंक, कंपनियां सभी शामिल हैं. कोई बाहर से पैसा नहीं आ रहा है.







