तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा तीन दिनी बोधगया प्रवास पर हैं. तीसरे और अंतिम दिन कालचक्र मैदान में शिक्षण कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि चीन बौद्ध धर्म को निशाना बनाने और नष्ट करने का प्रयास कर रहा है, लेकिन यह सफल नहीं होगा. दलाई लामा ने चीन पर बौद्ध धर्म को जहरीला मानने और धर्म को नष्ट करने के लिए एक व्यवस्थित अभियान चलाने और इसकी संस्थाओं को नष्ट करके चीन से बाहर निकालने का आरोप लगाते हुए कहा कि चीन ऐसा करने में पूरी तरह से विफल रहा है.
मीडिया रिपोट्स के मुताबिक, दलाई लामा ने आगे कहा कि चीन में बौद्ध धर्म और उसके अनुयायियों के वर्षों तक हुए दमन और उत्पीड़न के बाद देश में बौद्ध धर्म में बढ़ती दिलचस्पी को रविवार को रेखांकित किया. दलाई लामा भगवान बुद्ध की ज्ञान स्थली बोधगया में अपने भक्तों को संबोधित कर रहे थे. दरअसल, लामाओं ने 87 वर्षीय आध्यात्मिक नेता की दीर्घायु के लिए यहां एक पारंपरिक प्रार्थना सभा का आयोजन किया था. नोबेल शांति पुरस्कार विजेता दलाई लामा ने कहा कि तिब्बत की बौद्ध परंपरा ने पश्चिम में लोगों का बहुत ध्यान आकर्षित किया है. अतीत में बौद्ध धर्म को एक एशियाई धर्म के रूप में जाना जाता था. लेकिन आज इसका दर्शन और अवधारणाएं, विशेष रूप से मनोविज्ञान से संबंधित दर्शन और धारणाएं, दुनियाभर में फैल चुकी हैं. कई वैज्ञानिक इस परंपरा में रुचि ले रहे हैं.
चीन में बौद्ध धर्म और बौद्धों का बहुत दमन और उत्पीड़न हुआ
उन्होंने आगे कहा कि यह न केवल तिब्बत…बल्कि चीन के लिए भी मायने रखता है. इसका सीधा असर चीन पर भी पड़ता है, क्योंकि चीन एक बौद्ध देश रहा है, लेकिन चीन में बौद्ध धर्म और बौद्धों का बहुत दमन और उत्पीड़न किया गया. तिब्बती आध्यात्मिक नेता कि इसलिए चीन और दुनिया में काफी बदलाव हो सकता है. मैं हमेशा एक बेहतर दुनिया की संभावना को लेकर आशान्वित रहा हूं. उन्होंने यह भी कहा कि तिब्बत जिसे बर्फ की भूमि भी कहा जाता है, कई त्रासदियों से गुजरा है. लेकिन इसके अप्रत्यक्ष रूप से अच्छे नतीजे भी सामने आए. दुनियाभर के लोग अब तिब्बती बौद्ध परंपरा के बारे में जागरूक हो गए हैं.
दलाई लामा को माओत्से तुंग की कम्युनिस्ट क्रांति के एक दशक बाद 1959 में अपनी मातृभूमि को छोड़ना पड़ा था. भारत में शरण मिलने के बाद वह हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में बस गए जिसे बड़ी संख्या में तिब्बती शरणार्थियों की मौजूदगी के कारण मिनी तिब्बत के रूप में जाना जाता है. दलाई लामा बिहार के बोधगया को वज्रस्थान मानते हैं. वह कोविड-19 महामारी के कारण दो साल के अंतराल के बाद प्रवचन देने के लिए यहां आए हैं. तिब्बती आध्यात्मिक नेता ने कहा कि यह एक संयोग है कि उक्त समारोह ग्रेगोरियन कैलेंडर के पहले दिन हो रहा है, जिसमें मेरे लंबे जीवन के लिए प्रार्थना की जाती है. यह एक तरह से संकेत है कि हम आगे अच्छे समय की ओर बढ़ रहे हैं.







