प्रकाश मेहरा
एक्जीक्यूटिव एडिटर
पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को लेकर सियासी हलचल तेज है। केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान ने इस चुनाव में अपनी और अपनी पार्टी की भूमिका को लेकर कई अहम बयान दिए हैं। उनकी रणनीति और बयानों से बिहार की राजनीति में नई गतिशीलता देखने को मिल रही है।
चुनाव लड़ने की इच्छा और रणनीति
चिराग पासवान ने संकेत दिया है कि वे बिहार विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी इस पर विचार कर रही है, और अगर कार्यकर्ता और पार्टी चाहेगी, तो वे किसी सामान्य (अनारक्षित) सीट से चुनाव लड़ने को तैयार हैं। उनकी पार्टी ने शाहाबाद क्षेत्र से उनके चुनाव लड़ने की संभावना जताई है, और 8 जून 2025 को आरा में आयोजित “नव संकल्प महासभा” में इसकी औपचारिक घोषणा हो सकती है। चिराग का कहना है कि उनका विजन “बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट” है, और वे बिहार में रहकर राज्य के विकास के लिए काम करना चाहते हैं। उनका मानना है कि विधायक के रूप में वे दिल्ली से ज्यादा प्रभावी ढंग से बिहार के लिए काम कर सकते हैं।
एनडीए में भूमिका और गठबंधन धर्म
चिराग ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी एनडीए का हिस्सा है और गठबंधन धर्म का पालन करेगी। उन्होंने कहा कि बिहार में एनडीए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ेगा। हालांकि, उनकी सक्रियता और सीटों की मांग से एनडीए के भीतर कुछ तनाव की स्थिति भी दिख रही है। उनकी पार्टी ने 33-40 सीटों पर दावेदारी की है, जबकि एनडीए ने उन्हें 20-22 सीटें ऑफर की हैं, जो उन्हें मंजूर नहीं है।
चिराग ने कहा कि उनकी उम्मीदवारी से एनडीए को रणनीतिक फायदा होगा, क्योंकि उनका प्रभाव दलित और गैर-दलित मतदाताओं, खासकर युवाओं, के बीच बढ़ रहा है।
चिराग की मुख्यमंत्री पद की अटकलें
चिराग ने सार्वजनिक रूप से नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद का चेहरा माना है, लेकिन उनके समर्थकों और पार्टी कार्यकर्ताओं ने “चिराग फॉर सीएम” के पोस्टर लगाए हैं, जिससे यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या वे भविष्य में मुख्यमंत्री पद की दावेदारी पेश करेंगे।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि “चिराग की रणनीति नीतीश कुमार के बाद एनडीए में एक मजबूत विकल्प के रूप में खुद को स्थापित करने की है, खासकर तब जब नीतीश की उम्र और स्वास्थ्य को लेकर सवाल उठ रहे हैं।”
चिराग पासवान ने अपनी छवि को केवल दलित नेता तक सीमित नहीं रखा है। उनकी रणनीति सामान्य सीट से चुनाव लड़कर और गैर-दलित मतदाताओं को आकर्षित करके पैन-बिहार नेता बनने की है। 2024 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने 6.47% वोट शेयर के साथ सभी पांच सीटें जीतीं, जिससे उनकी विश्वसनीयता बढ़ी है।
2020 के सबक और नई रणनीति
2020 के विधानसभा चुनाव में चिराग की पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ा था, जिसके कारण उन्हें “वोट कटवा” कहा गया और एनडीए को नुकसान हुआ। इस बार वे गठबंधन के साथ रहने और अपनी स्थिति मजबूत करने पर जोर दे रहे हैं। उनकी पार्टी अब “किंगमेकर” की भूमिका में उभर रही है, और वे दलित, ओबीसी, और युवा वोटरों को जोड़कर एनडीए की स्थिति मजबूत करना चाहते हैं।
एनडीए में चिराग की भूमिका और चुनौतियां
चिराग की लोकप्रियता, खासकर युवाओं और दलित मतदाताओं में, एनडीए को महागठबंधन (आरजेडी-कांग्रेस) के खिलाफ मजबूती दे सकती है। उनकी सक्रियता से एनडीए का वोट शेयर, खासकर दलित और ओबीसी समुदायों में, बढ़ सकता है, जिससे महागठबंधन का गणित बिगड़ सकता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी का 100% स्ट्राइक रेट एनडीए के लिए एक बड़ा आत्मविश्वास बढ़ाने वाला कारक है।
क्या हैं चुनौतियां ?
चिराग की 33-40 सीटों की मांग से एनडीए में सीट बंटवारे को लेकर तनाव बढ़ सकता है। जेडीयू और बीजेपी को अपनी सीटें कम करने की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। उनकी बढ़ती महत्वाकांक्षा और “चिराग फॉर सीएम” के नारे से जेडीयू और बीजेपी के नेताओं में असहजता है। कुछ बीजेपी नेता मानते हैं कि चिराग को ज्यादा बढ़ावा देना नीतीश को कमजोर कर सकता है। प्रशांत किशोर की “जन सुराज” पार्टी के साथ संभावित गठजोड़ की अटकलें भी एनडीए के लिए चिंता का विषय हैं।
बिहार की सियासत पर प्रभाव
चिराग पासवान की सक्रियता ने बिहार की राजनीति में नए समीकरण बनाए हैं। उनकी रणनीति नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव दोनों के लिए चुनौती पेश कर रही है। अगर चिराग सामान्य सीट से चुनाव जीतते हैं, तो वे बिहार में एक बड़े नेता के रूप में उभर सकते हैं, जो भविष्य में एनडीए के लिए मुख्यमंत्री पद का एक मजबूत विकल्प हो सकता है। उनकी पार्टी की स्वतंत्र पहचान बनाए रखने की कोशिश और दलित-ओबीसी-युवा वोटरों पर फोकस से एनडीए को फायदा हो सकता है, लेकिन गठबंधन के भीतर आंतरिक तनाव भी बढ़ सकता है।
बिहार की राजनीति में नए समीकरण
चिराग पासवान बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में अपनी पार्टी को एक मजबूत और स्वतंत्र पहचान देने की कोशिश कर रहे हैं। वे एनडीए के साथ रहते हुए भी अपनी सियासी जमीन मजबूत करना चाहते हैं। उनकी उम्मीदवारी और सीटों की मांग से एनडीए को रणनीतिक लाभ मिल सकता है, लेकिन गठबंधन के भीतर संतुलन बनाए रखना एक चुनौती होगी। चिराग की रणनीति न केवल उनकी पार्टी की स्थिति को मजबूत कर रही है, बल्कि बिहार की राजनीति में नए समीकरण भी बना रहे हैं।







