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Home राष्ट्रीय

हिन्दू सम्मेलन भारतीय समाज में दे रहे हैं समरसता के भाव को मजबूती

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
December 31, 2025
in राष्ट्रीय, विशेष
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प्रहलाद सबनानी


नई दिल्ली : 27 सितम्बर 1925 को विजयादशमी के पावन दिवस पर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना जिन मुख्य उद्देश्यों को लेकर हुई थी, उनमें भारतीय समाज में एकता, सद्भावना एवं समरसता का भाव मजबूत करना एवं भारतीय नागरिकों के बीच सनातन संस्कृति के संस्कारों के अनुपालन को बढ़ावा देना भी शामिल हैं।

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भारतवर्ष में धर्म का अनुसरण करते हुए, अपने जीवन में प्रत्यक्ष रूप से धार्मिक संस्कारों का आचरण करने वाली तपस्वी, त्यागी एवं ज्ञानी विभूतियां एक अखंड परम्परा के रूप में अवतरित होती आई हैं। इन्हीं महान विभूतियों के चलते ही भारत की एक राष्ट्र के रूप में वास्तविक रक्षा हुई है। अतः हम भारतीय नागरिकों को यह भली भांति समझना होगा कि भारतीय समाज को समर्थ, धर्मनिष्ठ, प्रतिष्ठित बनाने में हम तभी सफल हो सकेंगे जब हम भारत की प्राचीन परम्परा को युगानुकूल बनाकर एक बार पुनः इसे पुनर्जीवित करेंगे।

आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं और यदि हम संघ की 100 वर्षों की यात्रा पर दृष्टि डालें, तो ध्यान में आता है कि संघ के स्वयसेवकों ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विचार और क्रियाशीलता के स्तर पर सक्रिय योगदान दिया है। वे अनेक क्षेत्रों में परिवर्तन के वाहक भी बने हैं। प्रारम्भ का सीमित संघ कार्य, समय के साथ व्यापक होता गया है। समाज की विभिन्न आवश्यकताओं को समझते हुए स्वयंसेवक विविध आयामों में अपने सहयोगियों के साथ क्रियाशील बने हैं। परिणामतः संघ के उद्देश्य के अनुरूप, देश में हिंदुत्व का जागरण करने की दिशा में विशेष प्रगति हुई है।

हिंदुत्व के जागरण से, समाज में जाति, वर्ग, भाषा इत्यादि के आधार पर होने वाले अनेक प्रकार के भेदभाव, धीरे धीरे कम होने लगे हैं। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन, अयोध्या मंदिर में श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा, कुम्भ जैसे विराट आयोजन इत्यादि अनेक ऐसे अवसर आए हैं – जहां हिंदू समाज का एक संगठित, भव्य और उच्च आदर्शों से युक्त स्वरूप सामने आया है। यह दृश्य समाज में आत्मविश्वास जगाने वाला बन रहा है। हम सब मिलकर देश के भविष्य को उज्जवल एवं सुदृढ़ बना सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सकारात्मक वातावरण निर्मित कर सकते हैं। इसलिए ये हमारी राष्ट्रीय एकात्मता को सुदृढ़ करने वाले आयोजन सिद्ध हुए हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष केवल इतिहास की उपलब्धियां नहीं है, बल्कि भविष्य की दिशा का संकल्प हैं।

आज, जब हम राष्ट्रीयस्वयं संघ की 100 वर्षों की इस यात्रा को देखते हैं, तो यह भी स्पष्ट होता है कि हिंदुत्व और इसकी परम्पराओं पर लोगों का विश्वास बढ़ा है। समाज के अनेक लोग इस तथ्य को स्वीकार कर रहे हैं और इसका अनुभव भी कर रहे हैं। हिंदुत्व की इस जागृति के कारण लोग अब हिंदू होने में गर्व का अनुभव कर रहे हैं। एक समय था जब सार्वजनिक जीवन में हिंदू समाज की कमियों को ही उजागर किया जाता था, जिससे अनेक लोग हिंदुत्व की अच्छाईयों को पहचान नहीं पाए, किंतु अब स्थिति बदल रही है। लोग अपने पूर्वजों के धर्म और परम्पराओं को महत्व देने लगे हैं। वे अपने बच्चों के नामकरण से लेकर विवाह पद्धति तक में हिंदू संस्कारों का समावेश कर रहे हैं। घर की परम्पराओं को आदरपूर्वक अपनाया जा रहा है।

इस सम्पूर्ण प्रक्रिया का उद्देश्य है – एक सच्चरित्र, प्रामाणिक और संस्कारवान पीढ़ी का निर्माण करना। ऐसी पीढ़ी समाज का वातावरण सुधार कर घर और समाज में सुख शांति स्थापित कर सकती है। इसलिए, इन मूल्यों और संस्कारों को महत्व देने और उन्हें अपने जीवन में उतारने के प्रयास आज घर घर में होने लगा हैं। लोग अब ऐसे सभी मंचों और माध्यमों से जुड़ने के लिए प्रयत्नशील हैं जो इस दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी लोग इस दृष्टि से एक महत्वपूर्ण माध्यम मानते हैं और विश्वासपूर्वक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ने का उत्साह दिखा रहे हैं। जैसे जैसे हिंदुत्व पर विश्वास बढ़ रहा है, वैसे वैसे भारत के प्रति श्रद्धा और विश्वास, व्यापक और गहरा हो रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मानना है कि “वसुधैव कुटुंबकम्” के आदर्श पर चलकर भारत न केवल अपने समाज को सशक्त करेगा, बल्कि पूरी दुनिया को शांति, सद्भाव और सहयोग का संदेश देकर विश्वगुरु की भूमिका निभाएगा।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा अपनी स्थापना के समय लिए गए संकल्पों को शीघ्र ही पूर्ण करने के उद्देश्य से अपने इस शताब्दी वर्ष में कुछ विशेष कार्यक्रमों के माध्यम से भारतीय समाज को अपने नागरिक कर्तव्यों के प्रति सजग करने, पर्यावरण के प्रति सचेत करने, नागरिकों में स्व के भाव को जगाने एवं स्वदेशी उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा देने, कुटुम्ब प्रबोधन के माध्यम से पारिवारिक भावना जागृत करने एवं समाज में समरसता के भाव को सुदृद्ध करने के लिए गम्भीर प्रयास किए जा रहे हैं। वर्ष 2025 में विजयादशमी के पावन दिवस पर पूरे देश में संघ की समस्त शाखाओं (देश भर में संघ की 83,000 से अधिक शाखाएं चल रही हैं) के स्वयसेवकों द्वारा गणवेश में बस्ती स्तर पर, 2 अक्टोबर से 12 अक्टोबर 2025 की बीच, विशाल पथ संचालनों का आयोजन कर शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों का शुभारम्भ किया गया था।

देश भर में आयोजित किए गए इन पथ संचलनों को समाज का भरपूर स्नेह प्राप्त हुआ था। दूसरे कार्यक्रम के रूप में संघ के स्वयसेवकों द्वारा अपनी बस्ती एवं मौहल्लों में हिंदू समाज के परिवारों के बीच, 15 नवम्बर से 30 नवम्बर 2025 की बीच, व्यापक गृह सम्पर्क अभियान को सफलता पूर्वक सम्पन्न किया गया है। अब तीसरे कार्यक्रम के रूप में पूरे देश में एक लाख से अधिक हिंदू सम्मेलनों का आयोजन, 20 दिसम्बर 2025 से 20 जनवरी 2026 के बीच, किया जा रहा है। हिंदू सम्मेलनों का आयोजन संघ द्वारा नहीं बल्कि सकल हिंदू समाज द्वारा बस्ती स्तर पर हो रहा है। अभी तक देश भर में सकल हिन्दू समाज द्वारा आयोजित किए गए हिंदू सम्मेलनों में भारतीय नागरिकों द्वारा भारी संख्या में भागीदारी देखने में आई हैं। विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में मंडल स्तर पर आयोजित किए जा रहे इन विराट हिंदू सम्मेलनों में ग्रामीण नागरिकों की भारी मात्रा में उत्साहपूर्वक भागीदारी दिखाई दी है।

उक्त हिन्दू सम्मेलनों में न केवल मातृशक्ति सहित सकल हिन्दू समाज की उत्साहपूर्वक भागीदारी हो रही है बल्कि साधु एवं सन्त महात्माओं द्वारा भी खुले हृदय से आशीर्वचन प्रदान किए जा रहे हैं। कुल मिलाकर इन हिन्दू सम्मेलनों की सकल हिन्दू समाज द्वारा भूरि भूरि प्रशंसा की जा रही है। इन सम्मेलनों का आयोजन दरअसल सकल हिन्दू समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा मिलकर किया जा रहा है जिससे समाज के समस्त अंगों में आपस में भाईचारा पुष्ट हो रहा है। छोटे छोटे आपसी मतभेद समाप्त हो रहे हैं एवं विशेष रूप से युवा नागरिकों को हिंदू सनातन संस्कृति के संस्कारों से अवगत होने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। इन हिन्दू सम्मेलनों के आयोजन का उद्देश्य भी सनातन संस्कृति, सनातन धर्म और सामाजिक एकता को सुदृढ़ करना है, जिसकी प्राप्ति होती हुई दिख रही है।

आज हिंदुत्व यदि सशक्त होता है तो यह न केवल भारत के लिए बल्कि पूरे विश्व के हित में होगा क्योंकि आज विश्व के विभिन्न देशों में फैली अशांति को दूर करने में केवल सनातन हिंदू संस्कृति ही सक्षम दिखाई दे रही है और इस विषय को विभिन्न देशों में फैले भारतीय मूल के नागरिकों के माध्यम से विकसित एवं अन्य देशों के नागरिक भलीभांति समझने लगे हैं क्योंकि इन देशों में निवासरत भारतीय मूल के नागरिक सनातन हिंदू संस्कृति के संस्कारों का अनुपालन करते हुए दिखाई देते हैं जिनमें “वसुधैव कुटुम्बकम” का भाव दिखाई देता है।

इन देशों में समस्त भारतीय मूल के नागरिक शांतिपूर्वक अपना जीवन यापन करते हैं एवं वहां की स्थानीय अर्थव्यवस्था में अपना सशक्त योगदान देते हुए दिखाई देते हैं। और फिर, भारत के भी आज विश्व के लगभग समस्त देशों के साथ दोस्ताना सम्बंध हैं, भारत ने कभी भी किसी देश की जमीन पर कब्जा करने के उद्देश्य से किसी देश के साथ युद्ध नहीं किया है। भारत सदैव से ही “जियो और जीने दो” के सिद्धांत का अनुपालन करता आया है। बल्कि, विश्व के अन्य देशों के नागरिक, जैसे, शक, हूण, कुषाण, पारसी, यहूदी, ईसाई एवं मुस्लिम भी भारत आकर आसानी से यहां रच बस गए हैं। आज पूरे विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जिसमें मुस्लिम समाज के समस्त फिर्के पाए जाते हैं।

संघ की दृष्टि बहुत स्पष्ट है कि सम्पूर्ण भारत की पहचान जिससे है, उस आध्यात्म आधारित एकात्म और सर्वांगीण जीवन दृष्टि को दुनिया हिंदुत्व अथवा हिंदू जीवन दृष्टि के नाते जानती है, उस हिंदुत्व को जगाकर सम्पूर्ण समाज को एक सूत्र में जोड़कर निर्दोष और गुणवान हिंदू समाज के संगठन का यह कार्य जो वर्ष 1925 में प्रारम्भ हुआ वह आज भी निरन्तर जारी है और आगे भी जारी रहे। सकल हिंदू समाज द्वारा आयोजित किए जा रहे हिन्दू सम्मेलन भी उक्त दृष्टि को ही साकार करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

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