नई दिल्ली। ईरान युद्ध की वजह से मिडिल ईस्ट में एनर्जी सप्लाई में रुकावट आई है। इसने दुनिया भर में तेल और गैस की कीमतें बढ़ा दी हैं। यह एक ऐसा डेवलपमेंट है जो रूस को सबसे ज्यादा फायदा पहुंचा सकता है। उसके फाइनेंस को मजबूती मिल सकती है। भारत का भी इससे सीधा कनेक्शन है। वह दुनिया के सबसे बड़े क्रूड इंपोर्टर में से एक है। रूस के राजदूत डेनिस अलीपोव ने साफ कह दिया है कि मॉस्को भारत को कच्चे तेल (क्रूड) की सप्लाई के लिए हमेशा तैयार रहा है। वेस्ट एशिया में जारी संकट के बीच पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी को लेकर टेंशन के बीच उनका यह बयान काफी अहम माना जा रहा है। यह भारत की टेंशन को काफी हद तक कम करेगा।
रूस को कैसे हो रहा फायदा?
- न्यूज एजेंसी एपी की रिपोर्ट के मुताबिक, एनर्जी की बढ़ती कीमतों से रूस को तेल और गैस एक्सपोर्ट से होने वाली कमाई बढ़ रही है।
- यह मॉस्को के बजट का एक अहम हिस्सा है।
- मिलिट्री ऑपरेशन सहित यह सरकारी खर्चों को फंड करने में मदद करता है।
रूसी तेल एक्सपोर्ट की बढ़ी कीमत
- रूस के तेल एक्सपोर्ट की कीमतें दिसंबर में 40 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर लगभग 62 डॉलर प्रति बैरल हो गई हैं।
- यह बढ़ोतरी युद्ध के डर से शुरू हुई।
- होर्मुज स्ट्रेट से टैंकर ट्रैफिक के बड़े पैमाने पर बाधित होने के बाद यह और तेज हो गई।
- होर्मुज स्ट्रेट एक ऐसा रास्ता है जो दुनिया की तेल खपत का लगभग 20 फीसदी हिस्सा वहन करता है।
रूसी क्रूड Vs ब्रेंट क्रूड
यह और बात है कि रूसी क्रूड अभी भी ग्लोबल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड के मुकाबले काफी डिस्काउंट पर ट्रेड कर रहा है। लेकिन, कीमत अब रूस के 2026 के बजट प्लान में अनुमानित 59 डॉलर प्रति बैरल के लेवल से ऊपर है। ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले से एक दिन पहले ब्रेंट क्रूड खुद 72.87 डॉलर के क्लोजिंग प्राइस से 82 डॉलर से ऊपर चढ़ गया है।
रूस के फेडरल बजट में ऑयल और गैस टैक्स का हिस्सा 30 फीसदी तक है। साथ ही कतर से लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) के प्रोडक्शन और शिपमेंट में रुकावट से रूस से आने वाले LNG कार्गो सहित उपलब्ध LNG कार्गो के लिए ग्लोबल कॉम्पिटिशन बढ़ने की उम्मीद है। कतर दुनिया के सबसे बड़े सप्लायर में से एक है।
युद्ध से कैसे चमकी रूस की किस्मत?
- मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने से पहले रूस का एनर्जी रेवेन्यू कमजोर हो गया था।
- रूस के फाइनेंस मिनिस्ट्री के अनुसार, जनवरी में सरकारी ऑयल और गैस इनकम चार साल के सबसे निचले स्तर 393 अरब रूबल (5 अरब डॉलर) पर आ गई थी।
- वहीं, जनवरी में ही देश का बजट घाटा बढ़कर 1.7 ट्रिलियन रूबल (21.8 अरब डॉलर) हो गया।
- रेवेन्यू में गिरावट ग्लोबल तेल की कम कीमतों और रूस के कच्चे तेल पर भारी डिस्काउंट की वजह से हुई थी।
- यह पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों और रूस के टैंकरों के ‘शैडो फ्लीट’ पर रोक की वजह से हुआ था।
- इनका इस्तेमाल चीन और भारत जैसे बड़े खरीदारों को तेल भेजने के लिए किया जाता था।
- मिलिट्री खर्च के स्थिर होने से इकोनॉमिक ग्रोथ भी धीमी हो गई थी।
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन में युद्ध के पांचवें साल के दौरान सरकारी फाइनेंस को स्थिर रखने के लिए टैक्स बढ़ाकर और घरेलू बैंकों से ज्यादा उधार लेकर जवाब दिया है।
न्यूज एजेंसी एपी ने ब्रसेल्स में ब्रूगल थिंक टैंक में एनर्जी एक्सपर्ट सिमोन टैग्लियापिएत्रा के हवाले से कहा:
युद्ध से जुड़ी एनर्जी की उथल-पुथल से रूस को बड़ा फायदा हुआ है।
तेल की ज्यादा कीमतों का मतलब है सरकार के लिए ज्यादा रेवेन्यू और इसलिए यूक्रेन में युद्ध को फाइनेंस करने की मजबूत क्षमता।
एनालिटिक्स फर्म केप्लर में मिडिल ईस्ट और OPEC+ इनसाइट्स की हेड अमीना बक्र ने लिखा:
मिडिल ईस्ट में लॉजिस्टिक दिक्कतों के कारण भारत और चीन दोनों को रूसी सप्लाई पर निर्भरता बढ़ाने के लिए मजबूत प्रोत्साहन मिल रहा है।
होर्मुज स्ट्रेट पर क्या टिकी है नजर?
- एनालिस्ट का कहना है कि रूस के संभावित फाइनेंशियल फायदे काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेंगे कि होर्मुज स्ट्रेट शिपिंग के लिए कितने समय तक बंद रहता है।
- बर्लिन में कार्नेगी रूस यूरेशिया सेंटर में रूसी इकोनॉमी की एक्सपर्ट एलेक्जेंड्रा प्रोकोपेंको ने कहा कि एक छोटे से टकराव से ब्रेंट क्रूड लगभग 65 डॉलर प्रति बैरल पर वापस आ सकता है और थोड़े समय की तेजी रूस के फिस्कल आउटलुक को पूरी तरह से नहीं बदलेगी।
भारत के लिए हमेशा खड़ा है रूस
रूस के राजदूत डेनिस अलीपोव ने गुरुवार को कहा कि उनका देश भारत को क्रूड की सप्लाई के लिए हमेशा तैयार रहा है। पश्चिम एशिया में जारी संकट के बीच पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच उनका यह बयान आया है।
होर्मुज स्ट्रेट भारत के लिए क्यों बेहद अहम?
- वैश्विक तेल और गैस की कीमतों में उछाल आया है।
- ईरान ने व्यावहारिक रूप से होर्मुज स्ट्रेट को अवरुद्ध कर दिया है।
- फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित यह संकरा समुद्री मार्ग है।
- यह दुनिया के लगभग 20 फीसदी क्रूड और एलएनजी के परिवहन का प्रमुख रास्ता है।
- भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 88 फीसदी आयात करता है।
- प्राकृतिक गैस की करीब आधी जरूरत भी आयात से पूरी होती है।
- इनका बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रूट से होकर आता है।
- ऐसे में पश्चिम एशिया में लंबे समय तक अस्थिरता बने रहने की स्थिति भारत के राष्ट्रीय हितों के लिए नुकसानदेह है। कारण है कि यह क्षेत्र देश की ऊर्जा सुरक्षा का प्रमुख स्रोत है।
मिलिड ईस्ट में क्यों बढ़ी है टेंशन?
- अमेरिका ने 28 फरवरी को ईरान पर सैन्य हमले किए थे।
- इसमें ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई थी।
- इसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए मुख्य रूप से इजराइल और खाड़ी क्षेत्र के कई देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर हमले शुरू किए।
- ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कुवैत, जॉर्डन और सऊदी अरब में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए।
- पिछले तीन दिनों में दोनों पक्षों के बीच हमलों और जवाबी हमलों के कारण यह संघर्ष काफी तेज हो गया है।
- इसी दौरान हाल के सप्ताहों में रूस से भारत के कच्चे तेल के आयात में भी तेज गिरावट देखी गई है।
पिछले महीने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नई दिल्ली के साथ एक व्यापार समझौते की घोषणा की थी। ऐसा करते हुए दावा किया था कि भारत रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदने पर सहमत हो गया है।
इसके साथ ही ट्रंप ने एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर के जरिए भारत पर लगे एक्स्ट्रा 25 फीसदी टैरिफ को भी वापस ले लिया था। यह टैरिफ अगस्त में भारत की ओर से रूस से कच्चा तेल खरीदने के कारण लगाया गया था।







