नई दिल्ली: फसलों के अवशेष जलाने से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए पराली प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है. कृषि उप निदेशक अशोक कुमार गौतम ने जानकारी दी कि पराली जलाने की निगरानी अब सैटेलाइट तकनीक से की जा रही है. यदि कोई किसान पराली जलाते हुए पाया गया तो उसे आर्थिक दंड का सामना करना पड़ेगा. यह दंड 2,500 रुपये से लेकर 15,000 रुपये तक हो सकता है. रिपोर्ट- नीरज कुमार
कृषि उप निर्देशक बस्ती अशोक कुमार गौतम बताते हैं कि जनपद में कृषकों को जागरूक करने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है. गौतम ने किसानों को सलाह दी है कि वे फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उन्हें गौशालाओं में भेजें या अन्य लाभदायक तरीकों से प्रबंधित करें.
उन्होंने कहा कि मृदा की उर्वरता बनाए रखने और पर्यावरण में प्रदूषण को कम करने के लिए फसल अवशेष प्रबंधन अनिवार्य है. कृषि उप निदेशक ने पराली जलाने के कई नुकसान बताए हैं.
पर्यावरण प्रदूषण: फसल के अवशेष जलाने से हवा में विषैले पदार्थ फैलते हैं, जो स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालते हैं. जैव विविधता का नुकसान: जलने से खेतों में मौजूद कछुए और अन्य जीव-जंतु मर जाते हैं.
मृदा की उर्वरता में कमी: खेतों में लाभकारी जीवाणुओं की क्रियाशीलता कम हो जाती है, जिससे फसलों की पैदावार में गिरावट आती है. अशोक कुमार गौतम ने बताया कि किसान वेस्ट डीकम्पोजर का उपयोग कर पराली से जैविक खाद बना सकते हैं.
वेस्ट डीकम्पोज की कीमत मात्र 20 रुपये है. 100 एमएल की एक शीशी से 200 लीटर तरल खाद तैयार की जा सकती है. इसे खरपतवार के साथ खेत में छिड़काव करने से जैविक खाद का निर्माण होता है. इस खाद के उपयोग से किसान अपने खेतों की उर्वरता बढ़ा सकते हैं.
वेस्ट डीकम्पोजर न केवल उर्वरक शक्ति बढ़ाने में सहायक है, बल्कि यह फसलों में लगने वाले फफूंद रोग को भी नष्ट करता है. इसके परिणामस्वरूप उपज में सुधार होता है. एक शीशी के प्रयोग से किसान अपनी मृदा की खोई हुई उर्वरता को वापस पा सकते हैं.







