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Home व्यापार

ईरान किसी भी करेंसी में तेल बेचने को तैयार, जानें भारत को कैसे होगा फायदा

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
June 25, 2026
in व्यापार
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crude oil
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नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और वैश्विक आर्थिक दबावों के बीच ईरान ने एक बड़ा रणनीतिक फैसला लिया है। ईरान के केंद्रीय बैंक के गवर्नर अब्दोलनासर हेम्माती (Abdolnaser Hemmati) ने घोषणा की है कि उनका देश अब अपने तेल निर्यात के बदले किसी भी करेंसी में भुगतान स्वीकार करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होगा। अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक ईरान का यह कदम अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता को खत्म करने और वैश्विक व्यापार में विविधता लाने की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। भारत पर भी इसका सकारात्मक असर दिखाई दे सकता है।

ईरानी सरकार के सूचना कार्यालय द्वारा जारी एक वीडियो संदेश में गवर्नर हेम्माती ने कहा कि ईरान अब तेल के भुगतान के लिए अमेरिकी डॉलर तक सीमित नहीं रहेगा। वह अपने हितों और व्यापारिक समझौतों के आधार पर वैकल्पिक मुद्राओं का चयन कर सकता है। इसके साथ ही उन्होंने संकेत दिया कि तेल के परिवहन और भुगतान के निपटारे को लेकर भी ईरान लचीला रुख अपनाएगा।

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यह घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच सकारात्मक बातचीत की खबरें आई हैं। रिपोर्टों के अनुसार, दोनों देशों के बीच लगभग फ्रीज की गई 12 अरब डॉलर की ईरानी संपत्तियों को मुक्त करने और ईरान के तेल क्षेत्र पर लगे प्रतिबंधों में ढील देने को लेकर चर्चा चल रही है।

भारत के लिए इसके क्या हैं मायने?

  • ईरान के इस फैसले और प्रतिबंधों में संभावित ढील से भारत को बड़ा फायदा हो सकता है। भारत कभी ईरानी कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदारों में से एक था। ईरान से दोबारा तेल आयात शुरू होने से भारत को दो मुख्य फायदे होंगे:
  • खाड़ी देशों से भारत की भौगोलिक निकटता के कारण तेल परिवहन का समय और लागत काफी कम हो जाती है।
  • ईरान भारतीय रिफाइनर्स को तेल भुगतान के लिए 60 से 90 दिनों की लंबी मोहलत देता रहा है, जबकि अन्य वैश्विक आपूर्तिकर्ता आमतौर पर केवल 30 दिनों का समय देते हैं।

भारत के लिए प्रमुख आपूर्तिकर्ता रहा है ईरान

डेटा इंटेलिजेंस फर्म Kpler के आंकड़ों के अनुसार साल 2019 में अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण व्यापार ठप होने से पहले ईरान भारत का एक प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता था। अपने चरम पर भारत के कुल कच्चे तेल के आयात में ईरानी तेल की हिस्सेदारी लगभग 11.5% थी। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और उपभोक्ता होने के नाते भारत ने अमेरिकी दबाव के बाद ईरान से खरीदारी बंद कर दी थी।

भारत का पुराना अनुभव

ईरान का गैर-डॉलर व्यापार पर जोर देना उस वैश्विक बदलाव को दर्शाता है, जिसमें भारत पहले से ही शामिल है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बीच रूस से तेल खरीदने के लिए पहले ही एक मल्टी-करेंसी मॉडल अपनाया हुआ है।

भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल के भुगतान के लिए अमेरिकी डॉलर के अलावा रुपया, यूएई दिरहम, चीनी युआन और कुछ मामलों में रूसी रूबल का इस्तेमाल किया है। साल 2024 की रिपोर्ट्स के मुताबिक, रिलायंस इंडस्ट्रीज ने भी रोसनेफ्ट से रूसी तेल खरीदने के लिए रूबल आधारित दीर्घकालिक समझौता किया था।

स्थानीय मुद्रा व्यापार की चुनौतियां

भारत के अनुभव से यह साफ है कि वैश्विक तेल व्यापार अब केवल अमेरिकी डॉलर के भरोसे नहीं है, बल्कि प्रतिबंधों और बैंकिंग बाधाओं से बचने के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाश चुका है। बिजनेस स्टैंडर्ड के मुताबिक भारत के लिए अपनी घरेलू मुद्रा ‘रुपये’ में व्यापार करना आयात की निरंतरता बनाए रखने के लिए फायदेमंद है।

वहीं दूसरी ओर विशेषज्ञों का मानना है कि तेल निर्यातक देशों के लिए स्थानीय मुद्राओं में बड़ा फंड जमा करना तब तक एक चुनौती बना रहता है, जब तक कि वे उस पैसे का इस्तेमाल भारत से अन्य सामान आयात करने में न कर सकें।

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