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Home राष्ट्रीय

पानी की कमी से ज्यादा उसकी बर्बादी के बारे में सोचना जरूरी!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
June 16, 2024
in राष्ट्रीय
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water
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नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में इस समय जल संकट बढ़ता जा रहा है। पानी की एक-एक बूंद के लिए लोग तरह रहे हैं, टैंकर के आते ही लड़ाइयां हो रही हैं, राजनीति भी चरम पर पहुंच चुकी है। किसी ने नहीं सोचा था कि दिल्ली में भीषण गर्मी के बीच ऐसे हालात देखने पड़ेंगे। लेकिन अभी दिल्ली को जितने पानी की जरूरत है, उतना उसे मिल नहीं पा रहा है। राजधानी को कुल तीन जगहों से पानी मिलता है- हरियाणा की यमुना नदी से, यूपी की गंगा नदी से और पंजाब की भाखरा नांगल से।

तीन दशक से दिल्ली परेशान

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लेकिन बढ़ती गर्मी की वजह से पानी की डिमांड भी बढ़ती जा रही है, जल बोर्ड के मुताबिक दिल्ली को रोज 129 करोड़ गैलन पानी चाहिए। इस आपूर्ति पूरा करने के लिए दिल्ली के पास खुद ज्यादा पानी नहीं है, भू-जल स्तर काफी नीचे जा चुका है। इस वजह से भी दूसरे राज्यों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। हैरानी की बात यह है कि दिल्ली का जल संकट कोई आज का नहीं है, तीन दशक पुराना है। यानी कि इतने सालों बाद भी कोई सरकार अभी तक इस समस्या का स्थाई समाधान नहीं निकाल पाई है।

बेंगलुरु भी पानी के लिए तरस रही

समझने वाली बात यह भी है कि अकेले दिल्ली में इस प्रकार का जल संकट देखने को नहीं मिल रहा है, बल्कि देश के कई महानगरों में ऐसी ही स्थिति बन चुकी है। गर्मी के आते ही प्रशासन की व्यवस्था धरी की धरी रह जाती है और आम जनता पानी के लिए तरसने लगती है। इस साल बेंगलुरु में हुई पानी की कमी को कोई भूला नहीं है। बेंगलुरु को 145 लीटर करोड़ पानी कावेरी नदी से मिलता है, 60 करोड़ लीटर बानी बोरवेल से आता है। अब ये दोनों ही स्त्रोत सूख रहे हैं और आईटी हब में हाहाकार मच चुका है। इस प्रकार के हालात सभी को चिंता में डाल गए हैं, एक समय बचपन में किताबों में जरूर पढ़ाया जाता था कि आने वाले सालों में जल संकट देखने को मिलेगा, लेकिन इतनी जल्दी उससे रूबरू होना पड़ेगा, यह किसी ने नहीं सोचा था।

पानी की बर्बादी बड़ी समस्या

तमाम रिपोर्ट्स बता रही हैं कि भारत में पानी की कमी है, साफ पानी की और ज्यादा कमी है और उससे भी ज्यादा उसकी हो रही बर्बादी ने स्थिति को जमीन पर विस्फोटक बना दिया है। सरकारों को कोसना आसान रहता है, उनकी जवाबदेही है, इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन सिर्फ उनके सहारे इस जल संकट को खत्म नहीं किया जा सकता है। सवासो करोड़ वाले इस देश में जल संकट सिर्फ कम पानी की वजह से नहीं है, बल्कि जिस तरह से उस पानी को बर्बाद किया जा रहा है, उसने स्थिति को और ज्यादा खराब कर दिया है।

आप और हम कैसे बन गए जिम्मेदार?

डाउन अर्थ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 33 फीसदी लोग ऐसे मौजूद हैं जो नहाते वक्त, या दांत साफ करते वक्त अपने पानी के टैप को खुला छोड़ देते हैं। उस वजह से कम समय में काफी पानी ऐसे ही बर्बाद कर दिया जाता है। एक और रिपोर्ट बताती है कि इंसान जितना पानी पूरे दिन में इस्तेमाल करता है, उसका 30 फीसदी बर्बाद हो जाता है। वहां भी 27 फीसदी पानी सिर्फ नहाने और टॉयलेट में इस्तेमाल हो रहा है। इसी तरह अगर घर में कोई नल लीक कर रहा हो, तो उससे भी एक लीटर पानी रोज का बर्बाद हो रहा है।

सबसे बड़ी चूक कहां हुई?

हैरानी की बात यह है कि जो टॉयलेट में फ्लश किया जाता है, उससे भी 25 लीटर पानी रोज का बर्बाद किया जा रहा है। अगर आंकड़ों में ही बात करें तो 4,84,20,000 करोड़ क्यूबिक मीटर पानी रोज का भारत में वेस्ट किया जा रहा है, यहां भी 600 मिलियन लोग ऐसे हैं जो साफ पानी के लिए तरस रहे हैं। लापरवाही की हद इतनी ज्यादा चल रही है कि हर तीसरा भारतीय अपने घर में पानी का नल खुला छोड़ देता है, हर मिनट वो पांच लीटर पानी बर्बाद कर रहा है, शावर के जरिए प्रति मिनट 10 लीटर पानी भी ऐसे ही वेस्ट किया जा रहा है। कई लोग साफ पानी के चक्कर में बड़े-बड़े पीयूरिफायर घर में लगाना नहीं भूलते हैं, लेकिन उससे रोज का 3 लीटर पानी बर्बाद भी हो रहा है। जिस पानी को खराब समझकर लोग फेंक देते हैं, उसका इस्तेमाल भी कई कामों में किया जा सकता है।

भविष्य के लिए क्या चुनौतियां?

अब एक तरफ लोग पानी बर्बाद कर रहे हैं, दूरी तरफ उसी पानी की कमी से भी वही जूझ रहे हैं। एक रिपोर्ट में बताया गया है कि 163 मिलियन भारतीयों के पास साफ पानी नहीं है। Composite Water Management Index report कहती है कि 2030 तक भारत में पानी की जरूरत दोगुना से भी ज्यादा हो जाएगी और उस वजह से जल संकट और ज्यादा गहरा जाएगा। 2050 तक तो भारत की जीडीपी को अतिरिक्त 6 प्रतिशत का नुकसान भी इस जल संकट की वजह से ही झेलना पड़ेगा। आज से 6 साल बाद भारत की 40 फीसदी आबादी के पास पीने का पानी नहीं रहेगा, जल स्त्रोत सूखते रहेंगे और एक महाविनाशकारी स्थिति की ओर तेज गति से बढ़ा जाएगा।

अब पीने के पानी की तो भारत में किल्लत बढ़ेगी, ये नहीं भूलना चाहिए देश ग्राउंड वॉटर भी जरूरत से ज्याद निर्भर चल रहा है। यहां भी पूरी दुनिया का 25 फीसदी ग्राउंड वॉटर तो भारत ही इस्तेमाल कर रहा है। उधर भी 70 फीसदी ग्राउंड वॉटर प्रदूषित बताया जाता है। इस बात की तस्दीक तो ये आंकड़ा भी करता है कि वॉटर क्वालिटी इंडेक्स में भारत 122 में से 120वें पायदान पर आता है, यानी कि पानी की गुणवक्ता जरूरत से ज्यादा ही खराब चल रही है।

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