प्रकाश मेहरा
उत्तराखंड डेस्क
उत्तराखंड के जौनसार-बावर जनजातीय क्षेत्र में स्थित कंधार (या कंदर) गाँव वह जगह है, जहाँ महिलाओं द्वारा सोने के गहने पहनने पर एक अनोखी और सख्त पाबंदी लगाई गई है। यह नियम विशेष रूप से शादियों और पारिवारिक समारोहों के दौरान लागू होता है, जिसका उद्देश्य सामाजिक समानता, सरलता और आर्थिक बोझ कम करना है। यह फैसला गाँव की पंचायत ने अक्टूबर 2025 में एक सामुदायिक बैठक में सर्वसम्मति से लिया गया था।
जनसंख्या और संस्कृति
देहरादून जिले के चकराता तहसील में जौनसार-बावर क्षेत्र, गढ़वाल मंडल, उत्तराखंड। यह हिमालयी पहाड़ी इलाका है, जो यमुना और टोंस नदियों से घिरा हुआ है। जौनसार-बावर क्षेत्र अपनी अनोखी संस्कृति, प्राकृतिक सौंदर्य और जौनसारी जनजाति के लिए जाना जाता है, जो मुख्य रूप से कृषि और अर्ध-खानाबदोश जीवनशैली अपनाते हैं। गाँव में ज्यादातर जौनसारी समुदाय के लोग रहते हैं। यह क्षेत्र अनुसूचित जनजाति का हिस्सा है, जहाँ पारंपरिक रीति-रिवाज मजबूत हैं, लेकिन आधुनिक चुनौतियाँ जैसे आर्थिक असमानता भी मौजूद हैं।
सोने के गहनों पर पाबंदी का नियमक्या अनुमति है ?
- विवाहित महिलाओं को केवल तीन सोने के गहने पहनने की इजाजत है:नाक की फूली (Phuuli या Nose Stud)।
- कान की बूंदी (Bundey या Earrings)। मंगलसूत्र (Mangalsutra या Wedding Necklace)।
क्या प्रतिबंधित है ?
इनसे अधिक या भारी सोने के आभूषण (जैसे हार, बाजूबंद, पायल आदि) पहनना पूरी तरह वर्जित है। यह नियम केवल शादियों और पारिवारिक आयोजनों पर लागू होता है, ताकि धन-प्रदर्शन की होड़ न हो। यह ‘स्व-शासन’ (self-rule) के तहत हर घर पर बाध्यकारी है।
नियम के पीछे कारण आर्थिक बोझ कम करना
सोने की बढ़ती कीमतों के कारण गरीब परिवार कर्ज में डूब जाते हैं या अपनी बचत खर्च कर देते हैं। अमीर-गरीब के बीच दिखावा की होड़ से सामाजिक तनाव बढ़ता है। शादी को पवित्र संस्कार मानते हुए, इसे धन-प्रदर्शन का मंच बनाने से रोकना। एक बुजुर्ग ने कहा, “शादी रिश्तों का उत्सव है, न कि धन का प्रदर्शन।” अनावश्यक खर्च रोककर आर्थिक असमानता कम करना और समुदाय में सादगी लाना। उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र के कई गाँवों (जैसे इंद्रोली) में भी इसी तरह के नियम लागू हो रहे हैं, जो स्थानीय पंचायतों की पहल हैं।
उल्लंघन पर सजा जुर्माना
नियम तोड़ने पर 50,000 रुपये का भारी जुर्माना लगेगा। यह राशि सामुदायिक निधि में जमा होगी, जो गाँव के विकास कार्यों में उपयोग होगी। पंचायत सदस्य आयोजनों की निगरानी करेंगे, और उल्लंघन की शिकायत पर कार्रवाई होगी।शादियों और समारोहों में शराब पर पूर्ण पाबंदी, ताकि आयोजन शांतिपूर्ण रहें। कुछ रिपोर्टों में उल्लेख है कि “दहेज या अतिरिक्त खर्च पर भी नजर रखी जा रही है, लेकिन मुख्य फोकस गहनों पर है। यह फैसला गाँव की सामूहिक बैठक में लिया गया, जहाँ सभी घरों ने सहमति दी।
उत्तराखंड की सांस्कृतिक प्रगतिशीलता
स्थानीय नेता भारत सिंह राणा ने इसे “सामाजिक क्रांति” बताया, जो आर्थिक असमानता कम करने और सादगी को बढ़ावा देगी। सुरेंद्र सिंह चौहान (चकराता) ने कहा कि “जब शहरों में शादियाँ प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गई हैं, तो यह गाँव सादगी का संदेश दे रहा है। कुछ महिलाओं को परंपरा से समझौता लग सकता है, लेकिन समुदाय का समर्थन मजबूत है। यह पहल अन्य गाँवों के लिए प्रेरणा बन सकती है। अक्टूबर-नवंबर 2025 में यह खबर राष्ट्रीय स्तर पर वायरल हुई, जो उत्तराखंड की सांस्कृतिक प्रगतिशीलता को दर्शाती है। यह नियम न केवल आर्थिक सुधार ला रहा है, बल्कि जौनसारी संस्कृति को आधुनिक चुनौतियों से जोड़ रहा है।







