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कट्टरपंथी राजनीति के खतरे

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
July 8, 2022
in विशेष
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अजीत द्विवेदी

भारत की राजनीति में हर समय कुछ कट्टरपंथी ताकतें रही हैं। कुछ नेता रहे हैं, जो कट्टरपंथी राजनीति करते रहे और चुनाव जीतते-हारते रहे। लेकिन कभी भी उनके बारे में गंभीरता से विचार करने की जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि ऐसी ताकतें हमेशा हाशिए में रहीं यानी फ्रिंज एलीमेंट्स की तरह रहीं। लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि हाशिए पर की ताकतें राजनीति के मध्य यानी केंद्र बिंदु की तरफ बढ़ रही हैं। फ्रिंज की राजनीति ही मुख्यधारा बन रही है। कई चुनावों और उपचुनावों के नतीजों से इसके संकेत मिले हैं तो देश के अलग अलग हिस्सों में हो रही घटनाएं भी बता रही हैं कि राजनीति इसी दिशा में बढ़ रही है। अगर राजनीति में सर्वोच्च स्तर से और सामूहिक रूप से इसे रोकने का प्रयास नहीं किया गया तो यह खतरा बहुत जल्दी नासूर बन जाएगा।

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राजस्थान के उदयपुर में एक हिंदू दर्जी की गला काट कर हत्या करने और उसका वीडियो बना कर सोशल मीडिया में डालने की घटना राजनीति की कट्टरपंथी दिशा बताने वाली एक प्रतिनिधि घटना है। तभी जब इस घटना के बाद राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रधानमंत्री से अपील करते हुए कहा कि वे तुरंत राष्ट्र को संबोधित करें और शांति की अपील करें तो वह एक स्वाभाविक और बहुत जरूरी मांग थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के सबसे बड़े और सबसे लोकप्रिय नेता हैं। उनकी बात लोग सुनते हैं और मानते भी हैं। वे इस तरह की घटनाओं के सामाजिक नुकसान से परिचित हैं। याद करें जब उन्होंने गौरक्षकों को आपराधिक तत्व बताया था, तब एक समूह को यह बात बुरी लगी थी लेकिन उसके बाद से गौरक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा कम हो गई या बंद हो गई। हालांकि ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री राजनीतिक फायदे के लिए सांप्रदायिक प्रतीकों का इस्तेमाल नहीं करते हैं। लेकिन उनको भी पता है कि उदयपुर की घटना भारत की राजनीति और समाज दोनों पर गहरा असर छोडऩे वाली है। इसलिए पहले ही उसके असर को समाप्त करने की पहल करनी होगी। जिस तरह से उन्होंने पैगंबर मोहम्मद पर टिप्पणी से उपजे विवाद को शांत करने के लिए अपनी पार्टी के नेताओं पर कार्रवाई की थी उसी तरह का ठोस और त्वरित कदम उदयपुर की घटना के बाद भी उठाने की जरूरत है।

इसके साथ ही यह भी समझने की जरूरत है कि ऐसी घटना क्यों हुई है? यह मौजूदा भारतीय राजनीतिक विमर्श की अनिवार्य परिणति है। भारत की राजनीति से निर्देशित होकर समाज ऐसी दिशा में बढ़ रहा है, जहां इस तरह की घटनाएं अनिवार्य रूप से होंगी। एक तरफ इस्लाम की सर्वोच्चता के नाम पर दूसरे धर्मों के प्रतीकों के अपमान की घटनाएं हैं तो दूसरी ओर हिंदू राष्ट्र के निर्माण के आह्वान के साथ ही इस्लाम और दूसरे धर्मावलंबियों के प्रति हिकारत का भाव बढ़ रहा है। राष्ट्रवाद के नाम पर एक पूरे धार्मिक समुदाय को गद्दार साबित करने का अभियान चल रहा है। मध्यकाल में हुए कथित अत्याचार का बदला लेने के लिए आधुनिक समय में पहल की जा रही है। इन सबका अंत नतीजा बहुत सुखद नहीं होने वाला है। हो सकता है कि किसी दल को तात्कालिक राजनीतिक लाभ हो जाए लेकिन इस तरह की राजनीतिक और सामाजिक विमर्श की वजह से अंतत: देश और समाज विखंडन की ओर बढ़ेगा।

अगर हाल की कुछ राजनीतिक घटनाओं पर नजर डालें तो समझ में आएगा कि कितनी तेजी से कट्टरपंथी ताकतें राजनीति में मजबूत हो रही हैं और उन्हें नहीं रोकना कितना घातक हो सकता है। एक मिसाल पंजाब की संगरूर सीट पर शिरोमणि अकाली दल अमृतसर के नेता सिमरनजीत सिंह मान की जीत है। मान घोषित रूप से अलगाववादियों का समर्थन करते रहे हैं। उन्होंने अपनी जीत के बाद कहा कि उनकी जीत संत जरनैल सिंह भिंडरावाले की शिक्षा का नतीजा है। भिंडरावाले ने धर्म के नाम पर अनगिनत हत्याएं कराईं और अलग खालिस्तान राष्ट्र का आंदोलन चला कर देश की एकता व अखंडता को खतरे में डाला था। उस भिंडरावाले के नाम की शपथ लेने वाले नेता का लोकसभा चुनाव जीतना मामूली बात नहीं है। पंजाब में अकाली दल के कमजोर होने की वजह से मान जैसे नेताओं को मौका मिला है कि वे एक बार फिर कट्टरपंथी और अलगाववादी राजनीति को राख से उठा कर जिंदा करें। कोई आठ साल पहले पंजाब की राजनीति में आम आदमी पार्टी के मजबूत होने और उसे दुनिया के दूसरे देशों के कट्टरपंथी सिख संगठनों की मदद मिलने से भी अलगाववादी राजनीति के विमर्श को फिर से उभरने का मौका मिला है।

इसी तरह राष्ट्रीय स्तर पर कट्टर हिंदुवादी राजनीति के बरक्स मुस्लिम कट्टरपंथी राजनीतिक दलों को ताकत मिलनी शुरू हुई है। एक तरफ कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां कमजोर हुई हैं और दूसरी ओर भारत की सेकुलर राजनीति का प्रतिनिधित्व करने वाले समाजवादी नेता या तो बूढ़े होकर रिटायर हुए हैं या उनका निधन हो गया है। इस वजह से मुस्लिम अवाम में अपने नेता की तलाश तेज हुई है। उसी तलाश का नतीजा असदुद्दीन ओवैसी हैं। दशकों तक सिर्फ एक हैदराबाद लोकसभा सीट की राजनीति तक सीमित रही पार्टी का फुटप्रिंट आज सारे देश में है। उसने महाराष्ट्र की औरंगाबाद लोकसभा सीट जीती है और बिहार जैसे राज्य में उसके पांच विधायक जीते हैं। महाराष्ट्र में भी उसकी पार्टी के दो विधायक हैं। किसी जमाने में कांग्रेस के नेताओं ने पंजाब में अकाली दल को काबू करने के लिए कट्टरपंथी और अलगाववादी ताकतों को मजबूत किया था, जिसका अंत नतीजा कितना भयावह हुआ था वह सबको पता है। उसी तरह आज विपक्ष को कमजोर करने या चुनाव हराने के लिए ओवैसी जैसे नेताओं को मजबूत किया जा रहा है। यह आग से खेलने जैसा है।

चाहे संगरूर के सांसद सिमरनजीत सिंह मान हों या भोपाल की प्रज्ञा भारती हों या हैदराबाद के असदुद्दीन ओवैसी हों या उन्हीं की पार्टी के औरंगाबाद के सांसद इम्तियाज जलील हों, कट्टरपंथी राजनीति के ये प्रतिनिधि चेहरे गिनती में भले कम दिख रहे हैं लेकिन इनकी राजनीति अब मुख्यधारा की राजनीति बन रही है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नागरिकों ने जिन लोगों को देश की रहनुमाई के लिए चुना वे अपने स्वार्थ में कट्टरपंथी राजनीति को फलने-फूलने के लिए खाद-पानी मुहैया करा रहे हैं। ध्यान रहे सत्ता की राजनीति के लिए देश और समाज को दांव पर नहीं लगाया जाना चाहिए।

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