प्रकाश मेहरा
एक्जीक्यूटिव एडिटर
उत्तरकाशी। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में भूस्खलन की घटनाएं हाल के वर्षों में बार-बार देखने को मिली हैं, जो इस क्षेत्र की भौगोलिक संरचना और मौसमी परिस्थितियों के कारण होती हैं। 2025 में उत्तरकाशी में भूस्खलन और संबंधित प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति गंभीर रही है।
यमुनोत्री हाईवे पर भूस्खलन
उत्तरकाशी के बड़कोट तहसील के सिलाई बैंड क्षेत्र में भारी बारिश के बाद बादल फटने की घटना हुई, जिसके कारण एक निर्माणाधीन होटल मलबे में तब्दील हो गया। इस हादसे में एक लेबर कैंप भूस्खलन की चपेट में आ गया। इस घटना में 19 श्रमिक लेबर कैंप में थे, जिनमें से 10 को सुरक्षित निकाल लिया गया, लेकिन 9 श्रमिक लापता हो गए।
SDRF (राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल), NDRF (राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल), पुलिस और अन्य टीमें राहत और बचाव कार्य में जुटी हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस घटना पर नजर रखने और बचाव कार्यों को तेज करने के निर्देश दिए हैं। यमुनोत्री हाईवे का 10-12 मीटर हिस्सा बह गया, जिससे मार्ग पूरी तरह बाधित हो गया।
यमुनोत्री धाम पैदल मार्ग पर भूस्खलन
यमुनोत्री धाम के पैदल मार्ग पर भैरव मंदिर के पास भूस्खलन हुआ। इस घटना में कई यात्रियों के मलबे में दबने की आशंका जताई गई। राहत और बचाव कार्य तुरंत शुरू किए गए, लेकिन इस घटना में हताहतों की संख्या या नुकसान की पूरी जानकारी अभी स्पष्ट नहीं है।
उत्तरकाशी, हिमालयी क्षेत्र में स्थित होने के कारण भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के लिए अत्यधिक संवेदनशील है। उत्तरकाशी भूकंप जोन 4 और 5 में आता है, जहां भूगर्भीय हलचलें और अस्थिर ढलान भूस्खलन को बढ़ावा देते हैं। मानसून के दौरान भारी बारिश और बादल फटने की घटनाएं मिट्टी और चट्टानों को अस्थिर करती हैं, जिससे भूस्खलन होता है। सड़कों का अवैज्ञानिक निर्माण, चारधाम यात्रा मार्गों का विस्तार और अनियंत्रित विकास ने भूस्खलन के जोखिम को बढ़ाया है। 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार, चारधाम यात्रा मार्ग पर लगभग 200 नए भूस्खलन संभावित क्षेत्र बन गए हैं। बढ़ती गर्मी, अनियमित बारिश और हिमखंडों के पिघलने से मिट्टी का कटाव बढ़ा है।
क्या हैं वर्तमान हालात?
उत्तराखंड में 2025 में मानसून की बारिश ने हालात को और गंभीर किया है। उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग जैसे जिलों में भारी बारिश और आकाशीय बिजली का येलो अलर्ट जारी किया गया है। भूस्खलन के कारण यमुनोत्री और गंगोत्री जैसे तीर्थस्थलों के मार्ग अक्सर बाधित हो रहे हैं। मलबा और गिरे हुए पेड़ों ने आवाजाही को मुश्किल बना दिया है। 2024 में उत्तरकाशी और आसपास के क्षेत्रों में 59 छोटे भूकंप दर्ज किए गए, जो भूस्खलन की संभावना को और बढ़ाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कुमाऊं और पश्चिमी नेपाल के बीच का क्षेत्र बड़े भूकंप के लिए संवेदनशील है।
उत्तराखंड सरकार, SDRF, NDRF, और स्थानीय प्रशासन सक्रिय रूप से राहत कार्यों में लगे हैं। केंद्र सरकार ने भी भूस्खलन पूर्वानुमान केंद्र (एनएलएफसी) और ‘भूसंकेत’ पोर्टल शुरू किया है, जो भूस्खलन की चेतावनी देने में मदद करता है।
क्या हैं प्रमुख चुनौतियां ?
भूस्खलन के कारण सड़कें और पैदल मार्ग बार-बार बंद हो रहे हैं, जिससे तीर्थयात्रियों और स्थानीय लोगों को परेशानी हो रही है। निर्माणाधीन परियोजनाओं, जैसे होटल और सुरंगों, को बार-बार नुकसान पहुंच रहा है। भूस्खलन, बाढ़, और अन्य आपदाओं के कारण ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन बढ़ रहा है, क्योंकि बुनियादी सुविधाएं जैसे स्कूल और अस्पताल उपलब्ध नहीं हैं।
लापता श्रमिकों और यात्रियों की खोज में देरी और जटिल भौगोलिक स्थिति बचाव कार्यों को चुनौतीपूर्ण बनाती है। उत्तराखंड सरकार और केंद्रीय एजेंसियां त्वरित कार्रवाई कर रही हैं। ड्रोन और अन्य तकनीकों का उपयोग लापता लोगों की खोज में किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री ने प्रभावित क्षेत्रों का किया दौरा!
भूस्खलन पूर्वानुमान केंद्र और ‘भूस्खलन’ ऐप जैसे प्रयास आपदा प्रबंधन में मदद कर रहे हैं। पुष्कर सिंह धामी ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और राहत कार्यों की निगरानी कर रहे हैं। उत्तरकाशी में भूस्खलन की हालिया घटनाएं गंभीर प्राकृतिक आपदा का संकेत हैं। भारी बारिश, बादल फटने, और भौगोलिक अस्थिरता के कारण स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।
यमुनोत्री हाईवे और पैदल मार्गों पर हुए भूस्खलन ने स्थानीय लोगों और तीर्थयात्रियों के लिए खतरा बढ़ा दिया है। सरकार और आपदा प्रबंधन टीमें सक्रिय हैं, लेकिन दीर्घकालिक समाधान के लिए सड़क निर्माण में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, वन संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से निपटने की रणनीति जरूरी है।







