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Home राष्ट्रीय

बजट 2026-27: विकसित भारत के लिए कानून व्यवस्था और न्याय भी आवश्यक

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
January 25, 2026
in राष्ट्रीय, विशेष
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लॉ कमीशन
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प्रकाश मेहरा
विशेष डेस्क


नई दिल्लीः सामान्यतौर पर कानून-व्यवस्था और त्वरित न्याय की चर्चा बजट में नहीं सुनाई देती है। लेकिन हकीकत यही है कि किसी भी देश में बेहतर कानून-व्यवस्था और त्वरित न्याय सीधे पर निवेश, आर्थिक विकास और समृद्धि से जुड़ा है। भारत में विभिन्न राज्यों में आर्थिक निवेश की स्थिति में भी इसे देखा जा सकता है। असम समेत पूर्वोत्तर के राज्यों में हिंसा कम होने के बाद और उत्तर प्रदेश में कानून व्यस्था में सुधार के बाद निवेश में बढ़ोतरी इसकी अहमियत को रेखांकित करती है। वहीं, दूसरा पहलू यह है कि अगर न्याय सही समय पर न हो तो समावेशी विकास में अड्चन पैदा करता है।

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कमर्शियल ट्रिब्यूनल्स में दबाव

न्याय में देरी का सबसे अधिक खामियाजा निवेशकों को भुगतना पड़ता है। सरकार ने निवेशकों को अदालती लेटलतीफी से निजात दिलाने के लिए कमर्शियल ट्रिब्यूनल्स बनाए। लेकिन हकीकत यह है कि एनसीएलटी, एनसीएलएटी, डीआरटी, आइटीएटी, टीडीसैट, सैट जैसे ट्रिब्यूनल इसमें विफल साबित हो रहे हैं। इनमें 3.56 लाख विवाद लंबित हैं जिनमें 24.72 लाख करोड़ रुपये फंसे हैं जो कि भारत की 2024-25 की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का 7.48 प्रतिशत है।

जिन समस्याओं के समाधान के लिए कमर्शियल ट्रिब्यूनल्स की स्थापना हुई थी, आज वे उन्हीं समस्याओं का सामना कर रहे हैं। विभिन्न कमर्शियल ट्रिब्यूनल्स में दबाव के कारण अलग-अलग हैं लेकिन रिपोर्ट प्रणालीगत (सिस्टेमेटिक) कमजोरी की एक जैसी कहानी की ओर संकेत करती है। त्वरित न्याय के लिए न्यायिक इन्फ्रास्ट्रक्चर को ठीक करने के लिए पिछले बजटों में आवंटन किया गया था, लेकिन वह नाकाफी साबित हो रहा है।

कानून-व्यवस्था का सीधा संबंध पुलिस सुधारों पर !

संवैधानिक रूप से ये विषय राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। उसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि 2047 तक भारत को विकसित बनाने और एक मजबूत आर्थिक शक्ति के रूप में खड़ा करने के लिए पूरे देश में कानून व्यवस्था की स्थिति बेहतर बनाने के लिए विशेष कोशिश करनी होगी। इसे सिर्फ राज्यों का विषय होने का हवाला देकर टाला नहीं जा सकता है। कानून-व्यवस्था का सीधा संबंध पुलिस सुधारों पर है। लेकिन राज्यों का विषय होने के कारण इसमें कोई प्रगति नहीं हो रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने 2007 में ही पुलिस सुधारों के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए थे, लेकिन किसी भी राज्य ने इसे लागू नहीं किया। दिशा-निर्देशों में अपराधों की जांच और सामान्य पुलिसिंग के लिए अलग-अलग पुलिस फोर्स बनाने की बात भी शामिल है। लेकिन हालात यह है कि राज्य सरकारें पुलिस बलों के रिक्त पदों को भरने में भी कोताही बरत रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, पूरे देश में पुलिस बलों में तय पदों में से पांच लाख पद रिक्त है। ध्यान रहे कि न्याय की शुरुआत पुलिस से ही – होती है।

राज्यों के भरोसे नहीं छोड़नी चाहिए कानून-व्यवस्था

उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह के अनुसार, कानून-व्यवस्था भले ही राज्यों का विषय है, लेकिन इसे राज्यों के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए। उनके अनुसार पुलिस सुधारों की कमान केंद्र सरकार को अपने हाथ में लेनी चाहिए। इसमें ब्यूरो आफ पुलिस रिसर्च और विकास (बीपीआरडी) केंद्रीय भूमिका निभा सकता है। इसे पूरे देश के लिए एकसमान पुलिसिंग का पूरा खाका तैयार करना चाहिए और सभी राज्यों को इसे लागू करने के लिए मजबूर करना चाहिए। इसके लिए जरूरत पड़ने पर विशेष बजटीय प्रविधान भी किए जा सकते हैं। विक्रम सिंह ने साफ किया कि पुलिस आधुनिकीकरण के नाम पर राज्यों को भेजी जाने वाली केंद्रीय सहायता नाकाफी है और उसका इस्तेमाल पुलिस बल को अत्याधुनिक उपकरण व हथियार मुहैया कराने के बजाय प्रिंटर और जीरोक्स (फोटो कापी) मशीन खरीदने जैसे कामों में हो रहा है।

देशभर में पांच करोड़ मामले अदालतों में लंबित

न्यायालयों की स्थिति और भी नाजुक है। विक्रम सिंह के अनुसार, अदालतों में पांच करोड़ मामलों के लंबित होने का सीधा मतलब है कि पांच करोड़ लोग न्याय से वंचित हैं। इससे अपराधियों के हौसले बढ़ते हैं। नए आपराधिक कानूनों-भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम में इसे दुरूस्त करने की कोशिश हुई है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह केस दर्ज होने से लेकर राष्ट्रपति तक क्षमा याचिका दाखिल करने तक की प्रक्रिया पांच साल में पूरी होने का दावा कर रहे हैं। लेकिन इसे जमीन पर आने में अभी वक्त लगेगा। खुद अमित शाह इसे पूरी तरह से अमल में आने में तीन साल का समय लगने की बात कह रहे हैं। लेकिन ये नए आपराधिक कानूनों के तहत दर्ज मामलों पर ही लागू होगा। पुराने पांच करोड़ लंबित मामलों को निपटाने की कोई स्पष्ट कार्ययोजना नहीं दिख रही है।

आपराधिक न्याय प्रणाली के डिजिटलीकरण पर काम जारी

केंद्र सरकार सात हजार करोड़ रुपये की लागत से पूरी आपराधिक न्याय प्रणाली के डिजिटलीकरण की योजना पर काम कर रही है। इसके लिए ई-प्रिजन, ई-प्रोसेक्यूशन, ई-कोर्ट और सीसीटीएनएस के तहत जेलों, अभियोजकों, अदालतों और थानों के डाटा को डिजिटल बनाया गया है। इन सभी डाटा को आपस में जोड़ने की योजना पर भी काम चल रहा है। लेकिन उसका प्रभाव त्वरित और निष्पक्ष न्याय में दिखना बाकी है।

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