नई दिल्ली। माघ मास में पड़ने वाली अमावस्या तिथि को मौनी अमावस्या का व्रत रखा जाता है। इस दिन स्नान, दान और पितरों का तर्पण करने से पुण्य फल प्राप्त होता है। साथ ही, व्रती को इस दिन व्रत कथा का पाठ करके पीपल के वृक्ष की 108 बार परिक्रमा करनी चाहिए। ऐसा करने से सुख-समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। ऐसे में आइए विस्तार से जानें मौनी अमावस्या व्रत कथा…
मौनी अमावस्या व्रत कथा
मौनी अमावस्या की प्रचलित कथा इस प्रकार है कि, एक ब्राह्मण परिवार प्राचीन काल में कांचीपुरी में रहता था। दोनों पति पत्नी धर्मात्मा थे और धर्म पूर्वक अपनी गृहस्थी चलाया करते थे। देव स्वामी और उनकी पत्नी धनवती के सात पुत्र और एक मात्र गुणवती नामक पुत्री थी। जब गुणवती बड़ी हो गई तो देव स्वामी ने पत्नी से पुत्री के विवाह के लिए वर देखने को कहा। ब्राह्मण ने अपने छोटे पुत्र को बहन गुणवती की कुंडली दी और कहा जाओ इस कुंडली को ज्योतिषी से दिखवाकर ले आओ ताकि गुणवती के विवाह की बात आगे चल सके।
ज्योतिषी ने जब कन्या की कुंडली देखी तो उसने बताया कि विवाह होते ही कन्या विधवा हो जाएगी। ज्योतिषी की इस बात को जानकर पूरा ब्राह्मण परिवार बहुत दुखी हो गया और ज्योतिषी से इसका उपाय पूछा। तब ज्योतिषी ने बताया की सिंहल द्वीप में एक पतिव्रता महिला निवास करती है जिसका नाम सोमा धोबिन है। अगर कन्या के विवाह के पहले सोमा आपके घर आकर पूजन करे और आशीर्वाद दे दे तो यह दोष दूर हो सकता है।
इसके बाद, ब्राह्मण ने अपनी पुत्री गुणवती और छोटे बेटे को सिंहल द्वीप भेज दिया। दोनों भाई बहन सागर किनारे पहुंचने के बाद उसे पार करने का तरीका खोजने लगे। लेकिन जब समुद्र को पार करने का कोई रास्ता नहीं मिला तो दोनों भूखे प्यासे जाकर एक पीपल वृक्ष के नीचे बैठ गए और वहां आराम करने लगे। वहां, वृक्ष पर घोसले में एक गिद्ध का परिवार रहता था। तब घोसले में केवल गिद्ध के बच्चे मौजूद थे जो सुबह से भाई बहन की बातों और क्रियाकलापों को देख रहे थे।
शाम को जब गिद्ध की माता बच्चों के लिए भोजन लेकर घोसले में पहुंची तो बच्चों ने वृक्ष के नीचे आराम कर रहे भाई-बहन की कहानी बताई। बच्चों की बात सुनकर गिद्धों की माता को दोनों भाई बहन पर दया आ गई और बच्चों से कहा कि तुम लोग चिंता मत करो मैं इन्हें सागर पार करवा दूंगी। यह बात सुनकर बच्चों ने खुशी-खुशी भोजन किया।
गिद्ध की माता बच्चों को भोजन करवाने के बाद नीचे बैठे भाई बहन के पास पहुंची और बोली की मैं तुम्हारी समस्या जानती हूं। आप चिंता मत कीजिए आपकी समस्या का निदान मैं कर सकती हूं। आपको सोमा धोबन तक पहुंचा दूंगी। गिद्ध की बात को सुनकर दोनों भाई बहन प्रसन्न हो गए और उन्होंने वन में मौजूद कंद मूल को खाकर रात काटी। सुबह होते ही गिद्ध ने दोनों को समुद्र पार करवाया और सिंहल द्वीप में सोमा धोबिन के घर के पहुंचा दिया। सोमा धोबन के घर के पास गुणवती छिपकर रहने लग गई। प्रत्येक दिन सुबह होने से पहले गुणवती सोमा का घर लीप देती थी।
एक दिन सोमा ने अपनी बहुओं से सवाल किया कि रोज सुबह हमारा घर कौन लीपता है। तब बहुओं ने प्रशंसा के लोभ से कहा की हमारे सिवा यह काम और कौन कर सकता है। लेकिन सोमा को बहुओं की बात पर भरोसा नहीं हुआ और इस बात का पता लगाने के लिए वह पूरी रात जागती रही की आखिर कौन हर दिन सूर्योदय से पहले घर लीपकर चला जाता है। सोमा ने पाया कि एक कन्या उसके आंगन में आकर घर लीपने लगी। तब सोमा गुणवती के पास गई और उससे पूछा की तुम कौन हो और प्रतिदिन सुबह मेरा आंगन क्यों लीपकर जाती हो। तब गुणवती ने अपनी सारी बात बता दी। उसकी बातों को सुनकर सोमा ने कहा कि तुम्हारे सुहाग के लिए मैं तुम्हारे साथ चलने के लिए तैयार हूं।
सोमा ने ब्राह्मण के घर आकर पूजन किया। लेकिन विधि का विधान कौन टाल सकता था। जैसे ही गुणवती का विवाह हुआ वैसे ही उसके पति की मृत्यु हो गई। इस बात का पता चलने पर सोमा ने अपने सभी पुण्य गुणवती को दान कर दिए। उनके पुण्य के चलते गुणवती का पति जीवित हो गया। लेकिन पुण्यों की कमी होने के चलते सोमा के पति और बेटे की मृत्यु हो गई। सोमा ने अपने घर से निकलते समय ही बहुओं से कह दिया था कि अगर मेरे लौटने से पहले मेरे पति और पुत्रों को कुछ हो जाए, तो उनके शरीर को संभालकर रखना।
अपनी सास की आज्ञा का पालन करते हुए बहुओं ने सभी के शरीर को संभालकर रखा। दूसरी और सोमा ने सिंहल द्वीप वापस जाते वक्त रास्ते में पीपल वृक्ष की छाया में विष्णुजी की पूजा की और 108 बार पीपल की परिक्रमा की। इसी पुण्य के प्रभाव से सोमा के घर वापस पहुंचते ही उसके पति और बेटे वापस जीवित हो गए। इसलिए मौनी अमावस्या के दिन व्रती को कथा सुनकर पीपल के वृक्ष की 108 बार परिक्रमा करनी चाहिए।







