विकाश शुक्ला (पहल टाइम्स)
उमरिया, मध्य प्रदेश। जिस जंगल और उसके आसपास के प्राकृतिक क्षेत्र में वन्यजीवों की आवाजाही प्रकृति के अपने नियमों से तय होती हो, वहां बढ़ती व्यावसायिक गतिविधियां संरक्षण के सामने नए सवाल खड़े करती हैं। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के बफर क्षेत्र में पारिस्थितिकी संवेदनशील जोन के अंतर्गत रिसॉर्ट और व्यावसायिक निर्माण का मामला चर्चा में है। ग्राम पतौर में ग्राम पंचायत भवन के सामने प्रस्तावित निर्माण को लेकर भूमि उपयोग में बदलाव, आवश्यक अनुमतियों और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े नियमों के अनदेखी का मामला प्रकाश में आया हैं।

ऐसे में संबंधित विभागों की भूमिका और निर्माण की वैधानिक स्थिति की जांच महत्वपूर्ण है। उपलब्ध दस्तावेजों में संबंधित भूमि के खसरा क्रमांक 110/1/5/2/1/1 और 110/1/5/2/1/2 क्रमश: वैशाली बैरागी तथा ममता बैरागी के नाम दर्ज है। मामले में लैंड यूज चेंज सहित स्थानीय सलाहकार समिति व ईको सेंसटिव ज़ोन समिति से संबंधित स्वीकृति, निर्माण की अनुमति और विभिन्न विभागों से आवश्यक अनापत्ति प्रमाण-पत्र के दस्तावेजों की जांच की जरूरत है। साथ ही अग्नि सुरक्षा प्रमाण-पत्र सहित निर्माण से जुड़े अन्य जरूरी दस्तावेजों की उपलब्धता की पुष्टि भी महत्वपूर्ण है।
वन्यजीवों के रहवास और आवाजाही का सवाल :
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व बाघों और अन्य वन्यजीवों के संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इसके आसपास के बफर क्षेत्र में होने वाली व्यावसायिक गतिविधियों का नियमन इसलिए जरूरी है, ताकि वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और आवाजाही के रास्तों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। रिसॉर्ट जैसे निर्माण के साथ वाहनों की आवाजाही, रोशनी, शोर, पर्यटकों की गतिविधियां और भूमि के स्वरूप में बदलाव बढ़ सकते हैं। यही वजह है कि संवेदनशील क्षेत्र में निर्माण की अनुमति और उसके पर्यावरणीय प्रभावों की पड़ताल आवश्यक है।
NTCA दिशा-निर्देशों के प्रासंगिकता की जांच जरूरी :
मामले में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के लागू दिशा-निर्देशों, वन एवं पर्यावरण संबंधी प्रावधानों और संबंधित क्षेत्र के लिए निर्धारित प्रतिबंधों की जांच की जानी चाहिए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित भूमि की राजस्व स्थिति क्या है, वहां किस प्रकार के निर्माण की अनुमति है और परियोजना के लिए किन सक्षम प्राधिकरणों की स्वीकृति आवश्यक होती है, जिसका नियमतः पालन किया गया है या फ़िर रसूख के बल पर निर्माण कराया जा रहा है। यदि किसी अनिवार्य अनुमति का अभाव मिलता है या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
संरक्षण क्षेत्र में निर्माण जिम्मेदार बेपरवाह :
वन्यजीव संरक्षण और स्थानीय विकास के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए ऐसे मामलों में प्रशासनिक पारदर्शिता बेहद अहम है। लेकिन संबंधित जिम्मेदारों की उदासीनता से व्यावसायिक निर्माण तेजी से हो रहे हैं। निर्माण स्थल का निरीक्षण कर भूमि अभिलेखों, स्वीकृतियों और मौके की स्थिति की जांच करना जरूरी है। जांच में यह भी देखा जाना चाहिए कि प्रस्तावित गतिविधि से बाघों सहित अन्य वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर किसी तरह का प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका तो नहीं है। मसलन अवैध निर्माण और नियमों के उल्लंघन को लेकर वन अमले की पेट्रोलिंग गतिविधियों पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं, जहां बांधवगढ़ जैसे संवेदनशील वन्यजीव क्षेत्र में निर्माण संबंधी नियमों और अनुमतियों की स्पष्टता सुनिश्चित करने का जिम्मा उठाने वाले मैदानी अमले की निरंकुशता वन्यजीवों के क्षेत्र में खलल डाल रही है।







