नई दिल्ली। दिल्ली के सत्य निकेतन में रविवार दोपहर पांच मंज़िला पीजी इमारत अचानक भरभराकर गिर गई। हादसे के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई और मलबे में बड़ी संख्या में लोगों के दबे होने की आशंका के बीच रातभर राहत एवं बचाव अभियान चलता रहा। समाचार एजेंसी एएनआई के हवाले से एम्स ने बताया कि “हादसे में मरने वालों की संख्या 6 हो गई है।” आइये इस पूरे घटनाक्रम को विस्तार में एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा के विशेष विश्लेषण से समझते हैं।
दिल्ली में नियमों की अनदेखी !
एम्स के अनुसार, ट्रॉमा सेंटर में 10 लोगों को लाया गया था, जिनमें पांच को मृत अवस्था में अस्पताल पहुंचाया गया था। एक गंभीर रूप से घायल व्यक्ति ने बाद में दम तोड़ दिया। तीन लोगों का इलाज जारी था, जबकि एक घायल को मामूली चोटों के बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
इस हादसे ने सिर्फ राजधानी की जर्जर और अनधिकृत इमारतों की स्थिति पर सवाल नहीं खड़े किए हैं, बल्कि यह भी पूछा जा रहा है कि छात्रों के लिए संचालित पीजी की सुरक्षा जांच, निर्माण अनुमति, फायर सेफ्टी और स्थानीय प्रशासन की निगरानी आखिर किस स्तर पर थी।
एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा के अनुसार, यह घटना केवल एक इमारत गिरने का मामला नहीं है, बल्कि दिल्ली में नियमों की अनदेखी और लापरवाह तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
रातभर कैसे चला बचाव अभियान ?
इमारत में बड़ी संख्या में छात्र रहते थे। हादसे की सूचना मिलते ही दिल्ली पुलिस, एनडीआरएफ, दिल्ली फायर सर्विस और डीडीएमए की टीमें मौके पर पहुंचीं। फायर टेंडरों और कैट्स एंबुलेंस की मदद से राहत एवं बचाव अभियान शुरू किया गया। अभियान की निगरानी संयुक्त पुलिस आयुक्त, डीसीपी दक्षिण-पश्चिम और अतिरिक्त डीसीपी स्तर के अधिकारियों द्वारा की जा रही थी। एनडीआरएफ की दो टीमें मलबे में फंसे लोगों की तलाश में जुटी थीं। मलबे के नीचे फंसे लोगों तक ऑक्सीजन पहुंचाने के लिए सिलेंडर भी भेजे गए।
स्थानीय लोग भी शुरुआती दौर में बचाव अभियान में जुट गए और अपने हाथों तथा उपलब्ध औजारों से मलबा हटाने की कोशिश करते रहे।दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने रविवार शाम बताया था कि “11 लोगों को मलबे से निकाला जा चुका है। फंसे लोगों की तलाश के लिए एनडीआरएफ के खोजी कुत्तों की भी मदद ली गई।
मलबे के अंदर से आ रहे थे फोन
रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान सबसे चिंताजनक जानकारी यह सामने आई कि मलबे में फंसे कुछ लोग फोन के जरिए बाहर मौजूद लोगों से संपर्क कर रहे थे। मौके पर मौजूद बीजेपी विधायक अनिल शर्मा ने बताया कि “मलबे में दबे लोगों के फोन आ रहे थे और बचाव दल उनसे संपर्क में था। एक पुलिस अधिकारी ने भी इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि मलबे में फंसे लोगों की ओर से लगातार फोन आ रहे थे।” इससे बचाव दल को यह संकेत मिला कि मलबे के भीतर कुछ लोग जीवित हो सकते हैं और उन्हें सुरक्षित निकालना अभियान की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गया।
हादसे के समय क्या हो रहा था ?
दिल्ली के सत्य निकेतन मार्केट इलाके में स्थित यह पीजी इमारत रविवार दोपहर ढह गई। हादसे के बाद दिल्ली पुलिस ने बताया कि इमारत के मालिक की जानकारी जुटाई जा रही है और लापरवाही के मामले में कार्रवाई की जाएगी। दिल्ली के एडिशनल डीसीपी अभिमन्यु पोसवाल के मुताबिक, रविवार शाम तक नौ बच्चों को मलबे से निकाला जा चुका था। बचाए गए एक बच्चे ने बताया था कि अंदर करीब 15-16 बच्चे मौजूद थे, हालांकि उस समय इसकी पुख्ता पुष्टि नहीं हुई थी।
एनडीआरएफ के आईजी एनएस बुंदेला ने कहा था कि पांच मंज़िला इमारत की ऊपरी मंज़िल से लोगों को बाहर निकाला जा रहा था और जीवित लोगों को सुरक्षित निकालना सबसे महत्वपूर्ण था। इसी वजह से अभियान में समय लग रहा था।
40-50 साल पुरानी थी इमारत, बेसमेंट में चल रहा था काम
दिल्ली पुलिस के मुताबिक, स्थानीय पूछताछ में सामने आया कि इमारत करीब 40-50 साल पुरानी थी। इसमें एक बेसमेंट और पांच ऊपरी मंज़िलें थीं तथा इसका इस्तेमाल पीजी हॉस्टल के तौर पर किया जा रहा था। घटना के समय बेसमेंट में मरम्मत का काम चल रहा था। हादसा मोती बाग-2 स्थित शिव मंदिर के पास हुआ। स्थानीय लोगों के मुताबिक, सत्य निकेतन इलाके में बड़ी संख्या में छात्र रहते हैं और कई इमारतों में पीजी संचालित किए जा रहे हैं।
प्रत्यक्षदर्शियों ने सुनाई हादसे की भयावह कहानी
घटना के समय इलाके में मौजूद एक छात्र ने बताया कि इमारत गिरने से पहले जोरदार धमाके जैसी आवाज सुनाई दी। उसके मुताबिक, आवाज सुनते ही आसपास मौजूद लोग बाहर भागे। पूरा इलाका धुएं और धूल से भर गया था और देखते ही देखते पूरी इमारत मलबे में बदल गई।
सबसे भयावह बात यह थी कि मलबे के भीतर से लोगों और बच्चों के चीखने की आवाजें आ रही थीं। प्रत्यक्षदर्शी के मुताबिक, बच्चे मदद के लिए पुकार रहे थे और बड़ी संख्या में छात्र अंदर फंसे होने की आशंका थी। एक अन्य प्रत्यक्षदर्शी छात्र ने बताया कि यह इमारत ‘हॉस्टल डेज़’ नाम से संचालित पीजी थी। उसके अनुसार, इसके आसपास की कुछ अन्य इमारतों पर भी असर पड़ा और कुछ इमारतें हिल रही थीं। मलबे के कारण उनके प्रवेश मार्ग भी अवरुद्ध हो गए थे।
बेसमेंट की खुदाई पर सबसे बड़ा सवाल
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने घटनास्थल पर पहुंचने के बाद कहा कि बेसमेंट में खुदाई का काम चल रहा था और इसी दौरान एक पिलर हिलने के कारण इमारत गिरने की शुरुआती जानकारी सामने आई है। उन्होंने कहा कि “रेस्क्यू किए गए 11 लोगों के बाद भी प्राथमिकता उन लोगों की जान बचाना है जो संभवतः मलबे के अंदर फंसे हैं। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि हादसे के लिए जो भी जिम्मेदार होगा—चाहे वह बिल्डिंग का मालिक हो या कोई अधिकारी—उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।”
यही बयान हादसे की जांच का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु बन गया है। सवाल यह है कि क्या पुरानी इमारत में बेसमेंट की खुदाई या निर्माण कार्य शुरू करने से पहले उसकी संरचनात्मक सुरक्षा का आकलन किया गया था?
प्रकाश मेहरा का सवाल सरकारें बदलती हैं, सिस्टम क्यों नहीं?
सत्य निकेतन हादसे को लेकर एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा ने दिल्ली की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। प्रकाश मेहरा के मुताबिक, वे स्वयं सत्य निकेतन घटनास्थल पर पहुंचे और वहां का मंजर देखकर स्तब्ध रह गए। उनका कहना है कि जिन बच्चों ने बेहतर भविष्य के सपने लेकर दिल्ली का रुख किया था, वे एक ऐसी व्यवस्था की कीमत चुका रहे हैं जिसमें नियमों और सुरक्षा मानकों की अनदेखी लगातार होती रही है।
प्रकाश मेहरा ने सवाल उठाते हुए कहा कि “सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन लापरवाह तंत्र और नियम-कानूनों की अनदेखी का सिलसिला क्यों नहीं बदलता ? उनके मुताबिक, बेसमेंट में पर्याप्त सुरक्षा इंतजामों के बिना खुदाई और मरम्मत का काम हादसे की संभावित वजहों में शामिल है। उन्होंने कहा कि “अवैध रूप से संचालित पीजी और हॉस्टल तथा असुरक्षित निर्माण की नियमित सुरक्षा जांच बेहद जरूरी है। उनके अनुसार, सत्य निकेतन की घटना को महज एक दुर्घटना मानकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं होगा; इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
प्रकाश मेहरा ने अपने विश्लेषण में कहा कि “वह घटनास्थल पर जाकर इस बात से बेहद दुखी हुए कि इतनी बड़ी दुर्घटना के बावजूद व्यवस्था समय रहते सचेत क्यों नहीं हुई। उन्होंने मालवीय नगर की पिछली घटना से सबक लेने की आवश्यकता पर भी सवाल उठाया। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि स्थानीय विधायक का कार्यालय घटनास्थल से लगभग 100 से 200 मीटर की दूरी पर होने के बावजूद क्या स्थानीय स्तर पर किसी को इमारत में चल रहे निर्माण या सुरक्षा संबंधी गतिविधियों की जानकारी नहीं थी ? उनके अनुसार, एमसीडी और स्थानीय स्तर पर निगरानी व्यवस्था की भूमिका की भी गंभीरता से जांच होनी चाहिए।
हादसे के बाद सामने आए पांच बड़े सवाल
1. क्या मरम्मत से पहले हुई थी इमारत की स्ट्रक्चरल जांच?
हादसे के समय इमारत में मरम्मत और निर्माण का काम चल रहा था। मुख्यमंत्री के मुताबिक, बेसमेंट में खुदाई के दौरान पिलर खिसकने की शुरुआती जानकारी सामने आई।
स्थानीय लोगों ने इमारत में पानी जमा होने और पहले से निर्माण संबंधी समस्याओं की बात कही। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मरम्मत शुरू करने से पहले किसी योग्य इंजीनियर से इमारत की संरचनात्मक जांच कराई गई थी?
2. क्या निर्माण स्वीकृत नक्शे के अनुसार हुआ था ?
एमसीडी की शुरुआती जांच में कथित तौर पर इस इमारत का कोई मंजूर बिल्डिंग प्लान रिकॉर्ड में नहीं मिला। करीब 55 वर्ग गज के प्लॉट पर बनी इमारत में बेसमेंट और ग्राउंड फ्लोर के ऊपर चार मंजिलें होने की जानकारी सामने आई। बेसमेंट में किया गया निर्माण अनधिकृत बताया गया है।
स्थानीय लोगों ने यह भी दावा किया कि “करीब दो वर्ष पहले इमारत में दो अतिरिक्त मंजिलें बनाई गई थीं। अब जांच का अहम हिस्सा यह है कि ये मंजिलें कब और किस अनुमति के तहत बनाई गईं।
दिल्ली के मेयर प्रवेश माही ने प्रकाश मेहरा से बातचीत में आशंका जताई कि “निर्माण में कमजोर सामग्री का इस्तेमाल हुआ हो सकता है और बाद में किए गए निर्माण को इमारत झेल नहीं पाई।”
3. क्या इमारत को पीजी के रूप में चलाने की अनुमति थी ?
सत्य निकेतन दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के नजदीक स्थित है और पिछले कुछ वर्षों में छात्रों के लिए बड़े पीजी क्षेत्र के रूप में विकसित हुआ है।
हादसे वाली इमारत करीब 55 वर्ग गज के प्लॉट पर बनी थी और बाद में इसे पीजी के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा। अब यह जांच का विषय है कि पीजी चलाने के लिए आवश्यक अनुमति ली गई थी या नहीं और क्या इमारत छात्रों की संख्या के अनुरूप सुरक्षा मानकों को पूरा करती थी। एमसीडी अधिकारियों के हवाले से यह भी बताया गया है कि इस इमारत के पास फायर एनओसी नहीं थी।
4. क्या छात्रों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त आपातकालीन इंतजाम थे ?
हादसे के बाद इमारत के आपात निकास को लेकर भी सवाल सामने आए। स्थानीय लोगों के मुताबिक, इमारत में दूसरा निकास नहीं था। यदि किसी पीजी में बड़ी संख्या में छात्र रह रहे हों तो आग, भूकंप, भवन क्षति या अन्य आपात स्थिति में सुरक्षित निकासी के पर्याप्त रास्ते होना बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए सवाल यह भी है कि क्या इमारत में छात्रों की संख्या के हिसाब से सीढ़ियां, निकासी मार्ग और अन्य सुरक्षा इंतजाम पर्याप्त थे?
5. अगर इलाके में पहले से समस्याएं थीं तो प्रशासन को जानकारी क्यों नहीं हुई?
यह हादसे के बाद उठ रहा सबसे गंभीर सवाल है। स्थानीय लोगों ने दावा किया कि सत्य निकेतन और आसपास के इलाके में कई पुराने मकानों को पीजी में बदला जा रहा है। कई इमारतों में अतिरिक्त निर्माण और बदलाव किए जाने की भी बात सामने आई है।
ऐसे में सवाल है कि क्या एमसीडी ने ऐसे इलाकों की इमारतों का व्यवस्थित सुरक्षा सर्वे किया था? क्या मकान को पीजी में बदलने से पहले प्रशासन को इसकी जानकारी दी गई थी? और अगर नियमों का उल्लंघन हो रहा था तो उसे समय रहते क्यों नहीं रोका गया?
नेताओं ने भी उठाए सवाल
हादसे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने दुख व्यक्त करते हुए राहत एवं बचाव अभियान में हरसंभव सहायता का भरोसा दिया।
प्रधानमंत्री मोदी ने हादसे को बेहद दुखद बताते हुए मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त की और घायलों के जल्द स्वस्थ होने की कामना की। गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि स्थानीय प्रशासन और एनडीआरएफ की टीमें समन्वय के साथ राहत एवं बचाव अभियान चला रही हैं और घायलों को आवश्यक चिकित्सा सहायता दी जा रही है।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने छात्रों के लिए पर्याप्त हॉस्टल सुविधाओं की कमी पर सवाल उठाते हुए कहा कि बड़ी संख्या में छात्रों को पीजी में रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है और हर छात्र का जीवन महत्वपूर्ण है।
सिर्फ एक इमारत नहीं, पूरी व्यवस्था की परीक्षा
सत्य निकेतन हादसा अब केवल राहत और बचाव अभियान तक सीमित नहीं रह गया है। छह लोगों की मौत ने दिल्ली में पुराने भवनों, अनधिकृत निर्माण, पीजी संचालन, फायर सेफ्टी और स्थानीय प्रशासन की निगरानी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
अगर जांच में यह साबित होता है कि इमारत में बिना अनुमति निर्माण, अनधिकृत बेसमेंट, कमजोर संरचना या सुरक्षा मानकों की अनदेखी हुई थी, तो जिम्मेदारी केवल भवन मालिक तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन सभी स्तरों की जवाबदेही तय होनी चाहिए जहां नियमों के उल्लंघन को रोका जा सकता था।
प्रकाश मेहरा के शब्दों में, यह सवाल केवल सत्य निकेतन की एक इमारत का नहीं है—सवाल उस व्यवस्था का है जो हादसा होने के बाद सक्रिय होती है, लेकिन हादसा होने से पहले खतरे को पहचानने में नाकाम रहती है।
दिल्ली के लिए एक गंभीर चेतावनी
सत्य निकेतन हादसा दिल्ली के लिए एक गंभीर चेतावनी है। पुराने मकानों को बिना पर्याप्त संरचनात्मक जांच के पीजी में बदलना, बेसमेंट में निर्माण या खुदाई करना, अतिरिक्त मंजिलें जोड़ना और अग्नि एवं आपात सुरक्षा मानकों की अनदेखी करना भविष्य में और बड़ी त्रासदियों को जन्म दे सकता है।
अब जरूरत केवल दोषियों पर कार्रवाई की घोषणा करने की नहीं, बल्कि यह पता लगाने की है कि किसने क्या अनुमति दी, किसने जांच नहीं की, किसने शिकायतों को नजरअंदाज किया और किस स्तर पर निगरानी व्यवस्था विफल हुई।







