प्रकाश मेहरा
एग्जीक्यूटिव एडिटर
देहरादून: अंकिता भंडारी से जुड़े मामले ने पूरे देश में संवेदनशीलता और आक्रोश पैदा कर दिया है। इस घटना ने न सिर्फ़ आम नागरिकों को बल्कि उन लोगों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है, जो हमेशा कानून, व्यवस्था और राष्ट्रहित के पक्षधर रहे हैं।
कई लोगों का कहना है कि “इस तरह की घटनाएँ दिल को भीतर तक तोड़ देती हैं। यदि किसी मासूम के साथ अन्याय हुआ है, तो दोषी चाहे किसी भी पद, पार्टी या प्रभावशाली वर्ग से क्यों न जुड़ा हो, उसे सख़्त सज़ा मिलनी ही चाहिए। नागरिकों का मानना है कि इंसाफ़ किसी भी राजनीतिक दल या विचारधारा से बड़ा होता है।
लोकतंत्र में सवाल उठाना नागरिक का अधिकार
इस मामले को लेकर यह भी स्पष्ट किया जा रहा है कि “यह लड़ाई सत्ता बनाम विपक्ष की नहीं है, बल्कि सच बनाम अन्याय की है। समाज के जागरूक वर्ग का कहना है कि अगर आज हम चुप रहे, तो कल किसी और के घर का चिराग़ बुझ सकता है।
लोगों का यह भी कहना है कि “न्याय की माँग करना गलत नहीं है और गलत पर सवाल उठाना देशद्रोह नहीं होता। लोकतंत्र में सवाल उठाना नागरिक का अधिकार है और जवाबदेही तय करना व्यवस्था की ज़िम्मेदारी।
जनभावना यही है कि इस पूरे मामले में पूरी सच्चाई सामने आए और निष्पक्ष व पारदर्शी तरीके से न्याय हो, ताकि भविष्य में किसी भी निर्दोष के साथ ऐसा अन्याय दोबारा न हो।







