नई दिल्ली : आरक्षण को लेकर देश में लंबे समय से विवाद रहा है। विवाद इस बात को लेकर भी है कि जो लोग आरक्षण की श्रेणी में आते हैं लेकिन वे अब सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त हो चुके हैं तो क्या ऐसे में उन्हें आरक्षण लाभ से वंचित कर दिया जाना चाहिए। अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण में इस तरह की व्यवस्था पहले से ही है कि जो परिवार ‘क्रीमी लेयर’ (आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग) के दायरे में आता है, उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।
अब यही मांग अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (SC/ST) के आरक्षण में भी उठने लगी है। इसी मांग को लेकर भाजपा नेता और वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है, जिस पर अदालत ने सुनवाई करते हुए आज (सोमवार, 12 जनवरी को) केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया है।
इस याचिका में SC/ST आरक्षण से ‘क्रीमी लेयर’ की व्यवस्था को लागू करने की मांग की गई है, ताकि आरक्षण का लाभ उसी वर्ग के सबसे ज़रूरतमंदों तक पहुंच सके। याचिकाकर्ता ने कहा है कि मौजूदा नीति से संपन्न SC/ST वर्ग को लाभ हो रहा है, जबकि गरीब परिवार वंचित रह जाते हैं। याचिकाकर्ता वकील अश्विनी उपाध्याय का तर्क है कि SC/ST वर्ग के जिन परिवारों में एक व्यक्ति को सरकारी या संवैधानिक पद मिल जाता है, उनके बच्चों को इस वर्ग के तहत आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
याचिकाकर्ता की क्या दलील?
याचिकाकर्ता की दलील है कि आरक्षण का उद्देश्य दबे-कुचले वर्गों तक लाभ पहुंचाना था, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में वही परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी इसका लाभ उठा रहे हैं और जो समाज में हाशिए पर पड़े हैं, वह हमेशा की तरह वंचित रह जाते हैं। CJI जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने उनकी याचिका पर केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया है और उनसे इस मुद्दे पर जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता की मांग है कि सरकारी या संवैधानिक पद पाने वाले परिवारों को SC/ST आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
आरक्षण मात्र 10 वर्ष के लिए आया था
अश्विनी उपाध्याय ने अपनी अर्जी के समर्थन में दलील देते हुए कहा कि आरक्षण मात्र 10 वर्ष के लिए आया था और वास्तव में जो गरीब है, पीड़ित हैं, शोषित हैं, समाज में हाशिए पर हैं, झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं या आदिवासी हैं,उनके उत्थान के लिए इसकी व्यवस्था की गई थी। उन्होंने कहा कि ये आरक्षण करोड़पतियों या बंगलों में रहने वाले लोगों के लिए कभी नहीं आया था। उन्होंने कहा कि अगर आप संविधान सभा की डिबेट देखें तो इसका आशय समझ में आ जाएगा। उन्होंने इस बात की ओर गंभीर सवाल उठाए कि एक व्यक्ति पहले SC/ST के आरक्षण का लाभ लेकर पहले IAS बनता है, नौकरी करता है फिर इस्तीफा देकर SC/ST के लिए सुरक्षित सीट से MP/MLA बन जाता है और मंत्री भी बन जा रहा है।
समाज में खाई और चौड़ी होती चली जाएगी
उन्होंने कहा कि जो लोग कई टर्म विधायक या सांसद रहे हैं या मंत्री रहे हैं या राष्ट्रपति रहे हैं उनके बच्चे भी इस आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं। इतना ही नहीं वरिष्ठ IAS अफसरों, मुख्य सचिव या विभागों के सचिवों के बच्चे भी इसका लाभ उठा रहे हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि वे सभी आर्थिक रूप से काफी सक्षम और सशक्त हैं और उन्हें अब इसका लाभ उठाना छोड़ देना चाहिए क्योंकि इससे समाज में खाई और चौड़ी होती चली जाएगी।
SC ने पलटा था 20 साल पुराना फैसला
बता दें कि 1 अगस्त 2024 को अपने ही 20 साल पुराने फैसले को पलटते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्य सरकारें अनुसूचित जाति/जनजाति के कोटे के अंदर सब-कैटेगरी बना सकती हैं। बेंच ने तब कहा था कि SC/ST को उनकी जातियों के आधार पर बांटना संविधान के आर्टिकल 341 का उल्लंघन नहीं करता है। सात जजों की बेंच में शामिल जस्टिस बीआर गवई ने कहा था कि राज्यों को SC/ST के अंदर क्रीमी लेयर की पहचान करने और उन्हें रिजर्वेशन के फायदों से वंचित करने के लिए भी एक पॉलिसी बनानी चाहिए।
हालांकि 9 अगस्त 2024 को, केंद्र सरकार ने ऐलान किया कि वह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आरक्षण में क्रीमी लेयर का कॉन्सेप्ट लागू नहीं करेगी और तर्क दिया था कि एनडीए सरकार बीआर आंबेडकर के बनाए संविधान से बंधी है, जिसमें एससी और एसटी कोटे में क्रीमी लेयर का कोई प्रावधान नहीं है।







