नई दिल्ली: जब हम कार या बाइक खरीदते हैं, तो सबसे पहला सवाल ‘माइलेज’ का होता है. लेकिन युद्ध के मैदान में माइलेज से ज्यादा ‘मिशन’ और ‘रफ्तार’ मायने रखती है. फाइटर जेट्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि वे भारी हथियारों के साथ ध्वनि की रफ्तार से भी तेज उड़ सकें. यही कारण है कि इनका फ्यूल कंजप्शन किसी आम इंसान की कल्पना से परे होता है. एक सामान्य फाइटर जेट का माइलेज किलोमीटर प्रति लीटर में नहीं, बल्कि ‘मीटर प्रति लीटर’ में नापा जाता है.
फाइटर जेट का माइलेज: 1 लीटर में कितनी दूर?
आमतौर पर एक मध्यम श्रेणी का फाइटर जेट (जैसे रफाल या F-16) क्रूजिंग स्पीड (सामान्य रफ्तार) पर 300 से 400 मीटर प्रति लीटर का माइलेज देता है. यानी 1 किलोमीटर जाने के लिए इसे लगभग 3 लीटर ईंधन की जरूरत पड़ती है. लेकिन यह गणित तब बदल जाता है जब जेट ‘आफ्टरबर्नर’ (Afterburner) का इस्तेमाल करता है. आफ्टरबर्नर वह तकनीक है जो जेट को अचानक बहुत तेज रफ्तार देती है. इस दौरान फ्यूल कंजप्शन 3 से 4 गुना बढ़ जाता है. उस समय ये जेट्स 100 मीटर प्रति लीटर से भी कम का माइलेज देने लगते हैं.
दुनिया में सबसे ज्यादा फ्यूल खाने वाले जेट्स अक्सर ‘हैवी-वेट’ और ‘ट्विन-इंजन’ वाले होते हैं. अमेरिकी F-22 Raptor और रूस का Su-30 MKI इस लिस्ट में सबसे ऊपर आते हैं. F-22 रैप्टर जब अपनी पूरी ताकत पर होता है, तो यह प्रति घंटे हजारों लीटर तेल पी जाता है.
वहीं, सबसे कम फ्यूल खाने वाले जेट्स में स्वीडन का Saab Gripen और भारत का LCA Tejas शामिल हैं. ग्रिपेन को दुनिया का सबसे किफायती फाइटर जेट माना जाता है. यह सिंगल इंजन वाला लाइटवेट जेट है, जो कम खर्च में बेहतरीन परफॉर्मेंस देता है.
फ्यूल की खपत को प्रभावित करने वाले 3 बड़े कारण
रफ्तार और थ्रस्ट: अगर पायलट ‘सुपरक्रूज’ या ‘आफ्टरबर्नर’ मोड ऑन करता है, तो फ्यूल किसी झरने की तरह बहने लगता है.
पेलोड (हथियार): जेट पर जितने ज्यादा मिसाइल और बम लदे होंगे, इंजन पर उतना ही दबाव पड़ेगा और माइलेज घट जाएगा.
ऊंचाई (Altitude): अधिक ऊंचाई पर हवा का दबाव कम होता है, जिससे घर्षण (Drag) कम होता है और जेट बेहतर माइलेज देता है.






