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Home राष्ट्रीय

इस बार सारे रिकॉर्ड तोड़ देगा एल नीनो, भारत पर क्या होगा असर?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
July 27, 2026
in राष्ट्रीय
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heavy RAIN
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नई दिल्ली। तेजी से मजबूत हो रहा एल-नीनो जलवायु वैज्ञानिकों के बीच चिंता पैदा कर रहा है। हाल के अनुमानों से पता चलता है कि यह आधुनिक रिकॉर्ड में देखी गई सबसे शक्तिशाली घटनाओं में से एक हो सकता है।

नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) ने पुष्टि की है कि एल-नीनो की स्थितियां बन गई हैं। ज्यादातर मौसमी पूर्वानुमान मॉडल बताते हैं कि यह घटना 2026 के आखिर तक और मजबूत होगी और उत्तरी गोलार्ध में सर्दियों के दौरान अपने चरम पर होगी।

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रिकॉर्ड तोड़ सकता है इस बार का एल-नीनो

चिंता की बात यह भी है कि क्लाइमेट साइंटिस्ट जेक हॉसफादर के एक नए विश्लेषण से पता चला है कि बन रहा एल-नीनो 1982-83, 1997-98 और 2015-16 की रिकॉर्ड तोड़ने वाली घटनाओं से भी आगे निकल सकता है। हॉसफादर ने 14 सीजनल क्लाइमेट मॉडल से 667 एनसेंबल फोरकास्ट की जांच की है।

नीनो 3.4 विसंगति लगभग 3.6 डिग्री सेल्सियस होगी, जबकि 2015-16 के अल नीनो के दौरान पिछला रिकॉर्ड 2.75 डिग्री सेल्सियस था। 90 प्रतिशत से ज्यादा अनुमान मॉडल यह संकेत दे रहे हैं कि इसकी तीव्रता आधुनिक रिकॉर्ड में देखी गई किसी भी घटना से ज्यादा होगी।

क्या यह अनुमान सच हो सकता है?

NOAA के डेली OISST v2.1 डेटा के विश्लेषण से पता चलता है कि 13 जुलाई को ही नीनो 3.4 एनोमली (Nino 3.4 anomaly) लगभग 2.2 डिग्री सेल्सियस थी। सैटेलाइट रिकॉर्ड (1982 से) में कैलेंडर वर्ष के इतने शुरुआती समय में पहले कभी भी यह स्तर नहीं देखा गया था।

इसकी तुलना में 1997 के जबरदस्त एल-नीनो के दौरान तापमान में अंतर लगभग 1.6 डिग्री सेल्सियस था और 2015 में इसी तारीख को यह अंतर लगभग 1.3 डिग्री सेल्सियस था। तापमान में यह असामान्य रूप से बढ़ोतरी बताती है कि यह घटना पहले आए सुपर एल-नीनो की तुलना में कहीं ज्यादा तेज़ी से विकसित हो रही है। इससे आने वाले महीनों में दुनिया भर के मौसम पर बड़े पैमाने पर असर पड़ने की संभावना बढ़ गई है, जिसमें हीटवेव, बाढ़ और सूखा शामिल है।

भारत पर असर

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने पहले ही इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश का अनुमान लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) का सिर्फ 90 प्रतिशत लगाया है।

मौसम विभाग के ताजा अनुमान के मुताबिक, दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन के दौरान इंडियन ओशन डाइपोल के न्यूट्रल रहने की उम्मीद है। इसका मतलब है कि बन रहे एल-नीनो का मुकाबला करने के लिए कोई मजबूत बैलेंसिंग मैकेनिज्म नहीं है।

मानसून के पहले ही महीने में भारत ने इसका असर देख लिया है। जून में बारिश लॉन्ग पीरियड एवरेज से लगभग 40 प्रतिशत कम हुई। जून में सूखा देखने को मिला। जुलाई में भी बारिश की कमी बनी हुई है। इस महीने अब तक भारत में सामान्य से 19 प्रतिशत कम बारिश हुई है, जिससे मानसून में कुल कमी 23 प्रतिशत हो गई है।

भारत के खेतों में कमजोर मानसून का असर पहले ही दिखने लगा है। केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार, 10 जुलाई 2026 तक खरीफ की फसलें 531.25 लाख हेक्टेयर में बोई गई थीं, जबकि सामान्य रकबा 549.36 लाख हेक्टेयर है। यह पिछले पांच सालों (2019-20 से 2023-24) के औसत से लगभग तीन प्रतिशत कम है।

देश की सबसे बड़ी खरीफ फसल धान, सबसे बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है। अब तक इसकी सामान्य मौसमी बुआई के रकबे का केवल 28 प्रतिशत ही बोया गया है और यह पिछले साल इसी समय की तुलना में लगभग नौ प्रतिशत कम है, जो देर से और असमान मानसून बारिश के असर को दिखाता है।

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