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Home राष्ट्रीय

भारत के संदर्भ में हमें गढ़ने होंगे अपने विमर्श

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
October 7, 2024
in राष्ट्रीय, विशेष
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India
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प्रहलाद सबनानी


नई दिल्ली: आज वैश्विक स्तर पर भारत के विरुद्ध कई झूठे विमर्श गढ़े जा रहे हैं। हाल ही के समय में इस प्रक्रिया ने कुछ रफ्तार पकड़ी है। विमर्श के माध्यम से जनता के मानस को प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। विमर्श सत्य, अर्द्धसत्य अथवा झूठ भी हो सकता है। यह, विमर्श गढ़ने वाले व्यक्ति द्वारा किन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु इसे गढ़ा जा रहा है, पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए कुछ देशों के सम्बंध में प्रायः कुछ विमर्श गढ़े गए हैं, जैसे, अमेरिका के बारे में कहा जाता है कि वहां सामान्यतः व्यापार पर अधिक ध्यान दिया जाता है। ब्रिटेन के बारे में धारणा है कि वहां राजनीति पर अधिक ध्यान दिया जाता है।

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जर्मनी के सम्बंध में कहा जाता है कि वहां युद्ध कौशल के बारे में अधिक चर्चा की जाती है। इसी प्रकार, भारत के बारे में पूरे विश्व में धारणा है कि यहां आध्यात्मिकता की पराकाष्ठा रही है। परंतु, अब पूरे विश्व में विशेष रूप से भारत के संदर्भ में पुराने विमर्श टूट रहे हैं और नित नए विमर्श गढ़े जा रहे हैं। भारत चूंकि, हाल ही के समय में वैश्विक स्तर पर एक मजबूत आर्थिक ताकत बन कर उभर रहा है, भारत की यह प्रगति कुछ देशों को रास नहीं आ रही है एवं ये देश भारत के सम्बंध में झूठे विमर्श गढ़ रहे हैं।

भारत की प्रगति को रोकने, कम करने अथवा प्रभावित करने के उद्देश्य से दरअसल, चार शक्तियों ने हाथ मिला लिए हैं। ये चार शक्तियां हैं, कट्टरवादी इस्लाम, प्रसारवादी चर्च, सांस्कृतिक मार्क्सवाद एवं वैश्विक बाजार शक्तियां। हालांकि उक्त चारों शक्तियों की अन्य देशों में आपसी लड़ाई है परंतु भारत के मामले में यह एक हो गई हैं और भारत में यह आपस में मिलकर भारत के हितों के विरुद्ध कार्य करती हुई दिखाई दे रही हैं।

पश्चिमी एवं भारतीय विचारधारा में जमीन आसमान का अंतर है। जैसे भारत में व्यापार के मामले में “शुभ लाभ” की विचारधारा पर कार्य किया जाता है। परंतु, पश्चिमी देशों में पूंजीवाद का अनुसरण करते हुए व्यापार में अधिक से अधिक लाभ अर्जित करने का प्रयास किया जाता है इसके लिए चाहे सामान्यजन को कितना ही नुक्सान क्यों नहीं उठाना पड़े, इसे “शुद्ध लाभ” की संज्ञा दी जाती है। और, इसी प्रकार, वामपंथी विचारधारा में अप्रत्यक्ष रूप से “शून्य लाभ” के लिए कार्य होता दिखाई देता है जिससे अंततः व्यापार ही समाप्त होने की ओर आगे बढ़ जाता है।

पश्चिमी एवं अन्य कई देशों में आज पूंजीवाद की विचारधारा को ही अपना लिया गया है। जिसके परिणामस्वरूप केवल लाभ को बढ़ाने के उद्देश्य से व्यापार करने वाली अमेरिकी कम्पनियों की सम्पत्ति आज कई देशों के सकल घरेलू उत्पाद से भी अधिक हो गई है। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्य करने वाली माइक्रोसॉफ्ट नामक बहुराष्ट्रीय कम्पनी की सम्पत्ति 3.126 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की हो गई है। एप्पल नामक बहुराष्ट्रीय कम्पनी की सम्पत्ति 2.65 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की है। ऐमेजोन नामक बहुराष्ट्रीय कम्पनी की सम्पत्ति 1.87 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की है।

इसी प्रकार, मेटा नामक अमेरिकी कम्पनी की सम्पत्ति 1.23 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की है। अमेरिका ने अधिकतम लाभ अर्जन को मुख्य उद्देश्य मानकर पूंजीवाद को बढ़ावा दिया जिससे आज अमेरिका कई अरबपति बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का स्वर्ग बन गया है और आज इन अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की सम्पत्ति कई देशों के सकल घरेलू उत्पाद से भी अधिक हो गई है। ब्रिटेन, कनाडा, फ्रान्स आदि जैसी विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का सकल घरेलू उत्पाद लगभग 3 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के आसपास है।

भारतीय परम्परा में व्यापार में शुभ लाभ इसलिए कहा गया है क्योंकि भारतीय शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि व्यापार में होने वाले लाभ को 7 हिस्सों में बांटकर समाज में अति पिछड़ा वर्ग की मदद हेतु भी एक हिस्सा उपलब्ध कराया जाना चाहिए ताकि अति गरीब वर्ग भूखा न रहे। यह संस्कार भारतीय नागरिकों में “वसुधैव क़ुटुम्बकम” की भावना का संचार करते है। इसी कारण से आज विश्व भर में फैले आतंकवाद से निपटने में केवल भारतीय सनातन संस्कृति ही सक्षम दिखाई देती है। अतः भारतीय सनातन संस्कृति को पूरे विश्व के हितार्थ समस्त देशों को अपनाना चाहिए, आज यह विमर्श खड़ा किए जाने की सख्त आवश्यकता है।

पश्चिमी देशों के नागरिकों के लक्ष्य भौतिक (जड़) हो रहे हैं और चेतना कहीं पीछे छूट रही है। केवल आर्थिक विकास अर्थात अर्थ का अर्जन करना ही जैसे इस जीवन का मुख्य उद्देश्य हो। परंतु, भारत के नागरिक सनातन संस्कृति का अनुसरण करते हुए समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के अहसास के प्रति भी सजग दिखाई देते हैं, अर्थात उनमें चेतना के दर्शन भी होते हैं। इसीलिए भारत ने विश्व में दिलों को जीता है एवं कभी भी किसी देश पर आक्रमण करते हुए उनकी भूमि के एक इंच हिस्से पर भी अपना कब्जा नहीं जमाया है।

साथ ही, भारत में “संयुक्त परिवार ही भारतीय नागरिकों के सुख का आधार है”। पश्चिमी देशों में तो आज संयुक्त परिवार दिखाई ही नहीं देते हैं और इसके दुष्परिणाम के रूप में वहां पर सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न होता दिखाई दे रहा है। इन देशों में तलाक की दर बहुत अधिक है और इन देशों में नागरिक एक जीवन में 7 शादियां तक कर लेते हैं जबकि भारत में शादी को एक पवित्र बंधन मानते हुए पति-पत्नी के लिए विवाह नामक संस्था को 7 जन्मों का बंधन माना जाता है।

एक से अधिक शादियां करने के चलते पश्चिमी देशों में बच्चों को अपने पिता के बारे में ही जानकारी नहीं रह पाती है। बुजुर्ग दम्पति अपने अंतिम समय पर बहुत पीड़ादायी जीवन जीने को मजबूर हैं। बच्चों में हिंसा की प्रवृति बढ़ रही है एवं छोटे छोटे बच्चे डीप्रेशन का शिकार हो रहे हैं। उक्त प्रकार की कई सामाजिक बुराईयों ने इन देशों में अपना घर बना लिया है। “भारत ने विश्व का दिल जीता है” एवं “भारतीय संयुक्त परिवार ही सुख का आधार है”, “सेवा कार्य भारतीय नागरिकों के DNA में है” जैसे विमर्श आज हम भारतीयों को गढ़ने की जरूरत है।

पश्चिमी विचारधारा में उत्पादों के अधिकतम उपभोग को जगह दी गई है। आज को अच्छी तरह से जी लें, कल किसने देखा है, यह पश्चिमी सोच, चर्च की प्रेरणा एवं भौतिकवाद पर आधारित है। इस्लाम एवं ईसाईयत में पुनर्जन्म पर विश्वास नहीं किया जाता है। जो कुछ भी करना है वह इसी जन्म में करना है। इसके ठीक विपरीत भारतीय सनातन संस्कृति पुनर्जन्म में विश्वास करती है इससे भारतीय नागरिकों द्वारा उपभोग में संयम बरता जाता है एवं उत्पादन में बहुलता होने की विचारधारा पर कार्य करते हुए दिखाई देते हैं।

ईश्वर से प्रार्थना की जाती है कि “प्रभु इतना दीजिए कि मैं भी भूखा ना रहूं और अन्य कोई भी भूखा ना सोय”, यह भारतीय विचारधारा है। हिंदू एक जीवन पद्धति है इसे धर्म से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। धर्म का आश्य अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने से है। जबकि कई बार हिंदू शब्द को धर्म से जोड़ दिया जाता है और हिंदू को एक अलग धर्म मान लिया जाता है। हिंदू राष्ट्र भारत की संकल्पना है।

अतः आज यदि कुछ विदेशी शक्तियां भारत के विरुद्ध झूठे विमर्श गढ़ने में व्यस्त हैं तो भारत को भी अपने बारे में सत्य पर आधारित विमर्श गढ़ने की महती आवश्यकता है। भारतीय सनातन संस्कृति तो इस धरा पर उपस्थित समस्त जीवों के भले की बात करती है, इसीलिए भारत में पर्वत, नदी, पेड़, पौधों, जंतुओं आदि को भी पूजा जाता है। भारतीय संस्कृति में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। परंतु, दुर्भाग्य से आज पूरे विश्व में हिंसा व्याप्त है।

इस हिंसा को केवल और केवल भारतीय सनातन संस्कृति के संस्कारों को अपना कर ही रोका जा सकता है। भारत के बारे में वास्तविक एवं सत्य पर आधारित विमर्श को गढ़कर, इस विमर्श के माध्यम से विश्व के अन्य देशों के नागरिकों को भारतीय सनातन संस्कृति की ओर आकर्षित किया जा सकता है।

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