लखनऊ: इंडिया अलायंस के अंदर सहयोगी दल कांग्रेस की घेराबंदी तेज कर रहे हैं। गठबंधन में दूसरे नंबर के दल समाजवादी पार्टी (एसपी) के अध्यक्ष अखिलेश यादव एक तरफ कांग्रेस से दुखी चल रहे हैं जबकि दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल से दोस्ती बढ़ा रहे हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और राहुल गांधी की कांग्रेस से लड़कर सरकार बचानी है। दिल्ली में आप द्वारा आयोजित ‘महिला अदालत’ कार्यक्रम में अखिलेश शामिल हुए। केजरीवाल और दिल्ली की सीएम आतिशी के सामने उत्तर प्रदेश के पूर्व सीएम अखिलेश ने ऐलान कर दिया कि दिल्ली में सपा केजरीवाल और आप के साथ है।
अखिलेश यादव ने केजरीवाल के मंच से केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पर खूब निशाना साधा और कहा कि जब दिल्ली में महिला सुरक्षित नहीं है, तो हम कैसे मान लें कि देश उनके हाथ में सुरक्षित है। अखिलेश ने मणिपुर के हालात की भी चर्चा की और कहा कि गृह मंत्रालय कोई काम नहीं कर रहा है। गृह विभाग सिर्फ नाम का है। दिल्ली से लेकर मणिपुर तक हाल खराब है। गृह विभाग पता नहीं किस दुनिया का मंत्रालय है जो देश की राजधानी में सुरक्षा नहीं दे पा रहा। अखिलेश यादव ने कहा कि आप की सरकार ने जो काम किया है, उसके लिए दोबारा मौका मिलना चाहिए।
समाजवादी पार्टी 2013 के विधानसभा चुनाव के बाद से दिल्ली में चुनाव नहीं लड़ रही है। 2013 में सपा ने 25 सीटें लड़ी और सारी सीटों पर एसपी की जमानत जब्त हो गई थी। 2015 और 2020 में सपा चुनाव नहीं लड़ी। अखिलेश यादव का केजरीवाल के कार्यक्रम में जाना, केजरीवाल और आप सरकार की तारीफ करना और कहना कि सपा दिल्ली में केजरीवाल के साथ है, कांग्रेस के लिए सदमा से कम नहीं है। राहुल गांधी को विपक्ष का नेता मानने को लेकर ममता बनर्जी और लालू यादव की पार्टी कांग्रेस को पहले ही झटका दे चुकी है। अब अखिलेश का दिल्ली में केजरीवाल की पैरवी करना सपा और कांग्रेस के बिगड़ रहे रिश्तों की ताजा झलक है।
अखिलेश ने जब यूपी विधानसभा की करहल सीट और नेता विपक्ष का पद छोड़कर लोकसभा में कन्नौज का सांसद बनने का फैसला किया तभी सपा की राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ती दिलचस्पी का संकेत मिल गया था। राहुल गांधी और अखिलेश यादव की केमिस्ट्री लोकसभा में सही चली जिससे सपा की सीट 5 से 37 हुई तो कांग्रेस भी 1 से बढ़कर 6 हो गई। अखिलेश यादव ने तो ममता बनर्जी के लिए भी एक सीट छोड़ी जो ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) कैंडिडेट नहीं जीत पाया। मध्य प्रदेश और हरियाणा के विधानसभा चुनाव में सपा को एक सीट नहीं मिलना और महाराष्ट्र में तनातनी और धमकी के बाद दो सीट मिलना अखिलेश को अच्छा नहीं लगा। बड़े दिल की बात करने वाले अखिलेश को ये छोटी-छोटी चीजें खलने लगीं।
फिर लोकसभा में सांसदों के बैठने की सीट तय हुई तो उनके सबसे प्रिय सांसद अवधेश प्रसाद को पहली पंक्ति से दूसरी लाइन में फेंक दिया गया। अखिलेश को छठे ब्लॉक में पहली कुर्सी मिली जो उस ब्लॉक में इकलौती सीट है। सीट निर्धारण से पहले अखिलेश और अवधेश प्रसाद राहुल गांधी के साथ बैठते थे। सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस ने आठवें ब्लॉक में राहुल के बगल में अखिलेश के लिए एक सीट खाली रखी लेकिन अवधेश प्रसाद को दूसरी लाइन में भेजने से अखिलेश इस कदर उखड़े कि आवंटित सीट पर ही जाकर बैठ गए। अब राहुल और अखिलेश के बीच सातवें ब्लॉक की दूरी भी आ गई है।
अखिलेश की नाराजगी दो कारण से है। एक तो फैजाबाद (अयोध्या) के सांसद और दलित नेता अवधेश प्रसाद अब उनके साथ नहीं, उनके पीछे नजर आएंगे। भाजपा को अयोध्या में हराने वाले अवधेश प्रसाद को अखिलेश हमेशा अपने बगल में बिठाते थे और भाजपा पर तंज कसने के लिए उनकी तरफ मुखातिब होते रहते थे। अब वो अखिलेश के पीछे धर्मेंद्र यादव के साथ बैठने लगे हैं।
दूसरी वजह लोकसभा की कार्यवाही के लाइव प्रसारण के दौरान टीवी कैमरों का फोकस भी है। आम तौर पर कार्यवाही के दौरान संसद के कैमरे भाषण कर रहे सांसद के अलावा सदन चला रहे स्पीकर या पीठासीन अधिकारी, पीएम और नेता विपक्ष के ब्लॉक पर ही फोकस करते हैं। सामान्य तौर पर छठे ब्लॉक में बैठने के कारण अखिलेश पर कैमरा तभी जाएगा जब वो बोल रहे होंगे। ये अपने वोटर को उनके मसलों पर दिखने और दिखाने का मसला है। यही कारण है कि संभल पर कांग्रेस ने जब सपा के सुर में सुर नहीं मिलाया तो संसद में राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी सांसदों के प्रदर्शन में सपा के सांसद नहीं गए।
पहले भी एक बार अखिलेश और राहुल साथ आकर दूर हो चुके हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश जहां पीडीए पर टिके रहने की बात कर रहे हैं तो राहुल गांधी भी कांग्रेस की नाव में सवारी बढ़ाने की कोशिश में जुटे हैं। हाथरस में दलित लड़की के परिवार के पास जाना या फिर संभल जाने से रोकने के बाद पीड़ित परिवारों को दिल्ली में बुलाकर मिलना, राहुल की उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की रणनीति का संकेत है जिससे सपा और अखिलेश बहुत सहज नहीं होंगे।







