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Home राजनीति

लोकसभा स्पीकर को हटाने की 3 कोशिशें फेल, ओम बिरला की कुर्सी कितनी सेफ?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
February 12, 2026
in राजनीति, राष्ट्रीय
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loksabha
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नई दिल्ली: 1954 में पहला मौका था जब लोकसभा के किसी स्पीकर की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए विपक्ष ने उनमें अविश्वास व्यक्त किया था. तब प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि ऐसे प्रस्तावों को हल्के में नहीं लाना चाहिए. यह केवल व्यक्ति पर नहीं, संस्था पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं. फिलहाल लोकसभा में विपक्ष ने स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाने का नोटिस दिया है. यह चौथा अवसर है जब लोकसभा के स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव लाया जा रहा है, लेकिन यह पहला मौका है, जब कांग्रेस ने स्पीकर में अविश्वास व्यक्त किया है.

पहले के जिन तीन स्पीकर्स की निष्पक्षता पर सवाल करते हुए उनमें अविश्वास व्यक्त किया गया था तब कांग्रेस सत्ता में थी. ये तीनों प्रस्ताव गिर गए थे और विपक्ष का विरोध प्रतीकात्मक ही साबित हुआ था. पढ़िए लोकसभा के इतिहास में स्पीकर हटाने की 3 कोशिशें कैसे फेल हुईं.

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किसी स्पीकर के विरुद्ध भारत के संसदीय इतिहास का यह पहला अविश्वास प्रस्ताव था. विग्नेश्वर मिश्र ने प्रस्ताव के पक्ष में बोलते हुए कहा था कि स्पीकर को सदन की सामूहिक अंतरात्मा का प्रतिनिधि होना चाहिए, न कि सरकार की सुविधा का संरक्षक. उनका कहना था कि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी सरकार की. यदि अध्यक्ष के निर्णयों से यह संतुलन प्रभावित होता प्रतीत हो, तो सदन को अपनी चिंता व्यक्त करने का अधिकार है. विपक्ष के अन्य सदस्यों ने भी यह कहा था कि अध्यक्ष का प्रत्येक निर्णय तकनीकी रूप से नियमसम्मत हो सकता है, किंतु यदि उससे लगातार एक ही पक्ष को लाभ मिलता दिखे तो निष्पक्षता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है.

नेहरू ने कहा प्रस्ताव को राजनीतिक हथियार न बनाएं
दूसरी ओर सत्ता पक्ष मावलंकर की हिमायत में लामबंद था. प्रस्ताव के विरोध में बोलने वाले सदस्यों ने इसे न केवल अनावश्यक अपितु संस्था की गरिमा के प्रतिकूल बताया था. इस बात पर जोर था कि मावलंकर ने सदैव नियमावली के अनुसार कार्य किया है और असहमति को पक्षपात नहीं कहा जा सकता.

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस बहस में प्रभावी हस्तक्षेप करते हुए सचेत किया था कि ऐसे प्रस्तावों को हल्के में नहीं लाना चाहिए क्योंकि यह केवल व्यक्ति पर नहीं, संस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं. उनका इशारा था कि अगर राजनीतिक हथियार के के तौर पर स्पीकर के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का इस्तेमाल होगा तो संसदीय परंपराएं कमजोर होंगी. लगभग दो घंटे की बहस के बाद यह प्रस्ताव खारिज हो गया था.

दूसरा प्रस्ताव: स्पीकर का पक्षपात, लोकतंत्र के लिए खतरा
24 नवंबर 1966 को लोकसभा में दूसरा मौका था जब लोकसभा के स्पीकर की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए उन्हें हटाने की विपक्ष की ओर से नोटिस दी गई. हालांकि मधु लिमए के इस प्रस्ताव के लिए न्यूनतम पचास सदस्यों की शर्त पूरी नहीं हो सकी और मतदान की नौबत नहीं आई. स्पीकर सरदार हुकुम सिंह अपने पद पर कायम रहे. मधु लिमये का कहना था कि स्पीकर की कुर्सी किसी दल की नहीं होती. अगर स्पीकर की निष्पक्षता पर संदेह हो, तो लोकतंत्र संकट में पड़ता है. उनका और कुछ अन्य विपक्षी सदस्यों का आरोप था कि कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर स्पीकर ने सरकार को लाभ पहुंचाने वाले निर्णय दिए.

प्रश्नकाल और विशेषाधिकार प्रस्तावों के मामलों में भी समुचित अवसर और समय न दिए जाने की विपक्ष की शिकायत थी. दूसरी ओर सत्ता दल ने प्रस्ताव को विपक्ष की हताशा का परिणाम बताया था. बल दिया था कि स्पीकर की कार्यप्रणाली पूर्णतया निष्पक्ष होने के साथ ही नियमानुकूल भी रही है.

तीसरा प्रस्ताव: गरिमा तभी रहेगी जब निष्पक्षता होगी निर्विवाद
बलराम जाखड़ तीसरे स्पीकर थे, जिनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था. यह प्रस्ताव कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सदस्य सोमनाथ चटर्जी ने पेश किया था. चटर्जी का यह प्रस्ताव बेशक गिर गया था लेकिन आगे के वर्षों में स्पीकर की कुर्सी पर आसीन होने का उन्हें सौभाग्य प्राप्त हुआ था. अपने प्रस्ताव के समर्थन में सोमनाथ चटर्जी ने कहा था कि हम पद की गरिमा का सम्मान करते हैं, परंतु गरिमा तभी बनी रहती है जब निष्पक्षता निर्विवाद हो. यह भी कहा था कि अध्यक्ष की जवाबदेही सदन के प्रति है और यदि विपक्ष को लगातार शिकायत हो, तो उसे व्यक्त करना उसका लोकतांत्रिक अधिकार है.

दूसरी ओर प्रस्ताव का विरोध करने वाले सदस्यों ने जाखड़ की निष्पक्षता और नियमों के प्रति निष्ठा को असंदिग्ध बताते हुए विपक्ष के प्रस्ताव को राजनीतिक संदेश देने का प्रयास बताया था. बहुमत के अभाव में जाखड़ को हटाने की विपक्ष की कोशिश नाकाम हो गई थी.

ओम बिरला की कुर्सी पर कितना खतरा?
वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास/हटाने के विपक्ष के नोटिस में आरोप लगाया गया है कि वे संविधानिक पद का दुरुपयोग कर रहे हैं और विपक्ष के सांसदों की बोलने की स्वतंत्रता रोक रहे हैं. फिलहाल यह प्रस्ताव चर्चा और निर्णय और चर्चा के लिए सूचीबद्ध होने की प्रतीक्षा में है. संख्या बल में सत्ता पक्ष मजबूत है और वह बिरला के समर्थन में है.

पहले के तीन मौकों पर विपक्ष के स्पीकर को हटाने के प्रयास विफल रहे हैं. हर प्रस्ताव में विपक्ष ने स्पीकर की निष्पक्षता में सवाल उठाए. दूसरी ओर समर्थक सत्ता पक्ष हमेशा स्पीकर के समर्थन में डट कर लड़ा. नतीजे चाहें जो रहें लेकिन ऐसे प्रस्ताव संदेह का वातावरण निर्मित करते हैं.

ब्रिटेन में स्पीकर चुने जाते ही पार्टी सदस्यता कर दी जाती है निष्क्रिय
ब्रिटेन में स्पीकर चुने जाने के बाद उनकी तटस्थता के मद्देनजर उनकी पार्टी की सदस्यता निष्क्रिय कर दी जाती है. भारत में ऐसी परंपरा औपचारिक रूप से नहीं है. लेकिन चुनाव बाद सत्तादल और विपक्ष के नेता साथ-साथ स्पीकर को आसन तक पहुंचाते हैं. निश्चय ही यह परम्परा समान रूप से पक्ष-विपक्ष की उनमें विश्वास की प्रतीक होती है.

 

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