नई दिल्ली। मेलबर्न में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकार की “पीपल फर्स्ट” नीति पर प्रकाश डाला और नागरिक देवो भव: को आधुनिक भारत के शासन का मार्गदर्शक सिद्धांत बताया. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत का विकास सर्वे भवन्तु सुखिनः के मूल्यों को अपनाता है. इसी बीच आइए जानते हैं कि सिटीजन फर्स्ट गवर्नेंस के मामले में क्या है भारत की स्थिति और इसमें कौन सा देश नंबर 1 पर आता है.
वैश्विक रैंकिंग में भारत की स्थिति
रिस्पांसिबल नेशन इंडेक्स में भारत का 16वां स्थान नागरिक केंद्रित शासन में सुधार को दर्शाता है. खासतौर से आधार और यूटीआई सहित डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे जैसी पहलों के साथ-साथ इसके वैक्सीन कूटनीति प्रयासों के तरीके से. इस रैंकिंग में भारत संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन दोनों से आगे है. आपको बता दें कि संयुक्त राज्य अमेरिका 66वें और चीन 68वें स्थान पर आते हैं.
भारत ने एडेलमैन ट्रस्ट बैरोमीटर में भी जोरदार प्रदर्शन किया है. यहां भारत की सरकार को दुनिया की तीसरी सबसे भरोसेमंद सरकार का दर्जा दिया गया है. हालांकि वैश्विक पासपोर्ट सूचकांक में भारत 125वें स्थान पर है. आपको बता दें कि सिटीजन फर्स्ट गवर्नेंस की इस लिस्ट में नंबर एक पर सिंगापुर, नंबर दो पर स्वीटजरलैंड और नंबर तीन पर डेनमार्क है.
नागरिक प्रथम शासन क्या है?
नागरिक प्रथम शासन जिसे सिटीजन फर्स्ट गवर्नर कहते हैं एक मॉडल है जिसमें सरकारी नीति, सेवा और प्रशासनिक प्रणालियों को नागरिकों की जरूरत को सर्वोच्च प्राथमिकता के रूप में डिजाइन किया जाता है. इसका उद्देश्य सार्वजनिक सेवाओं को पारदर्शी और आसानी से उपलब्ध बनाना है.
डिजिटल प्रशासन और सेवाओं तक आसान पहुंच
इसका एक प्रमुख स्तंभ डिजिटल सेवा वितरण है. पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस, राशन कार्ड और जाति प्रमाण पत्र जैसी जरूरी सेवाएं तेजी से ऑनलाइन उपलब्ध हो चुके हैं. इससे नागरिकों को घर से आधिकारिक काम पूरा करने की अनुमति मिलती है. डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर ने सब्सिडी और दूसरे सरकारी फायदों को सीधे लाभार्थियों के बैंक खाते में भेज कर भ्रष्टाचार को कम करके कल्याण वितरण को भी बदल दिया है.







