नई दिल्ली: लोकसभा चुनावों में बीजेपी फिर से एनडीए में अपने पुराने साथियों को लाने की कोशिशों में जुटी हुई है। इसी कड़ी में पंजाब में पार्टी अपने सबसे पुराने साथी शिरोमणि अकाली दल (SAD) को भी एनडीए में लाना चाहती थी। लेकिन,खबरों के मुताबिक यह बातचीत अटक गई है।
ऐसे में लग रहा है कि पंजाब में इस बार के चुनाव में बीजेपी और अकाली दल अलग-अलग ही चुनाव लड़ेंगे और उधर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भी अलग-अलग मैदान में उतरने वाले हैं।
पिछली बार से ज्यादा सीटों पर लड़ना चाहती थी बीजेपी-सूत्र
पंजाब में बीजेपी और अकाली दल में बातचीत फाइनल क्यों नहीं हो पाई, इसकी कई संभावित वजहें निकलकर सामने आ रही हैं। इसमें सबसे बड़ी बात ये सामने आ रही है कि बदले समीकरण में बीजेपी पिछली बार से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना चाह रही थी और अकाली दल इसके लिए राजी नहीं हुआ।
कृषि कानूनों के मुद्दे पर एनडीए से अलग होने से पहले तक अकाली दल पंजाब की 13 लोकसभा सीटों में से 10 पर खुद भाग्य आजमाता था। जबकि, बीजेपी 3 सीटों पर चुनाव लड़ती थी।
बीजेपी अकाली दल के घटते जनाधार का दे रही थी हवाला-सूत्र
लेकिन, सूत्रों का कहना है कि पिछले विधानसभा चुनावों में बीजेपी से अलग चुनाव लड़ने पर अकाली दल का जो प्रदर्शन रहा था, उसके आधार पर बीजेपी कम से कम 6 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा कर रही थी। लेकिन, अकाली दल 2019 वाले सीट बंटवारे के फॉर्मूले पर ही अटका हुआ था।
गौरतलब है कि पंजाब में अभी अकाली दल का बीएसपी के साथ गठबंधन है, जिसका अपना एक खास जनाधार है। जानकारी के मुताबिक यही वजह है कि अकाली दल बीजेपी की शर्तों पर झुकने के लिए तैयार नहीं था। दूसरी तरफ यह भी जानकारी मिल रही है कि अकाली दल किसान आंदोलन और सिख बंदियों की रिहाई को लेकर भी केंद्र की भाजपा सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश में था, जिसके लिए पार्टी तैयार नहीं थी।
पूर्व अकाली नेताओं को भाजपा में जगन मिलने से भी नाखुशी
दोनों दलों के बीच बातचीत अटकने की एक वजह यह भी बताई जा रही है कि अकाली दल से निकले नेताओं को बीजेपी ने अपने में शामिल किया है, इससे भी वह खुश नहीं है। जैसे कि जालंधर लोकसभा उपचुनाव में बीजेपी ने इंदर सिंह अटवाल को चुनाव मैदान में उतारा था, जो कि चंरणजीत सिंह अटवाल के बेटे हैं।
राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के समय से गठबंधन की चर्चा शुरू हुई
ऐसे में अकाली दल को अंदर ही अंदर लगता रहा है कि बीजेपी उसे कमजोर करने की कोशिशें कर रही है। दरअसल, अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में शिरोमणि अकाली दल के रवैए ने उसके फिर से एनडीए में वापसी के चर्चे को जन्म दिया था।
पार्टी ने निमंत्रण मिलने पर खुशी जताई थी और सुखबीर सिंह बादल इससे जुड़े एक कार्यक्रम में शामिल भी हुए थे।
एनडीए के पुराने साथियों की वापसी पर काम कर रही है भाजपा
भाजपा लगातार इस कोशिश में जुटी हुई है कि जो पुराने साथी एनडीए से बाहर निकले हैं, उन्हें किसी तरह से गठबंधन में वापस लाया जाए। यहां तक कि वह आरएलडी जैसी पार्टियों को शामिल करके इसके विस्तार पर भी जोर दे रही है।
400 पार के लिए सहयोगियों की वापसी पर फोकस
क्योंकि, खुद प्रधानमंत्री मोदी ने अगले लोकसभा चुनावों में एनडीए के लिए 400 से ज्यादा सीटें और बीजेपी के लिए 370 सीटों का लक्ष्य रखा है।
इसी के तहत पहले जेडीयू की वापसी हुई और फिर टीडीपी से बातचीत चलने लगी। कर्नाटक में जेडीएस तो पहले ही एनडीए में शामिल चुका है। लेकिन, शायद पार्टी अपने सबसे पुरानी सहयोगी को मनाने में नाकाम रही है।
2019 लोकसभा चुनाव का क्या रहा था परिणाम
2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी पंजाब में अकाली दल के साथ गठबंधन में 3 सीटों पर लड़कर 2 पर चुनाव जीती थी। जबकि, अकाली दल 10 सीटों पर लड़कर भी 2 सीट ही जीत सकी थी।
2022 विधानसभा चुनाव के क्या रहे थे नतीजे
वहीं 2022 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी अकेले 77 सीटों पर चुनाव लड़कर भी 2 सीटें जीती थी। वहीं अकाली दल ने बसपा के साथ गठबंधन में 97 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारकर भी सिर्फ 3 सीट जीत सका था।







