नई दिल्ली। हरियाणा के समालखा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की तीन दिवसीय अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा शुक्रवार को आयोजित हुई। इस बैठक में देशभर से आए प्रतिनिधियों ने संगठन से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों, वर्तमान राष्ट्रीय परिस्थितियों और भविष्य की रणनीति पर चर्चा की। यह संघ की सबसे अहम निर्णय लेने वाली बैठकों में से एक मानी जाती है। आइए अब जानते हैं कि आरएसएस की प्रतिनिधि सभा क्या है और आखिर इसमें क्या होता है।
अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (एबीपीएस) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था है। यह सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था के रूप में काम करती है, नीतियां निर्धारित करती है और हर तीन साल में सरकार्यवाह (महासचिव) का चुनाव करती है। इस सभा में विभिन्न तरीकों के दायित्व रखने वाले प्रांतों के अखिल भारतीय कार्यकर्ता, क्षेत्रीय स्तर के कार्यकर्ता इस बैठक में मौजूद रहते हैं। इसकी बैठक साल में एक बार आमतौर पर मार्च के महीने में आयोजित की जाती है।
इस प्रतिनिधि सभा में क्या होता है?
सुनील अम्बेकर के मुताबिक, इस बैठक में संघ का जो देशभर में कार्य चलता है, मुख्य तौर पर शाखा का जो काम चलता है, उस संगठन कार्य की समीक्षा इस बैठक में होती है। जब देश भर के कार्यकर्ता इस सभा में आते हैं तो स्वाभाविक तौर पर वो अपने-अपने प्रांत की वर्तमान परिस्थितियां और उसके सामाजिक दृष्टि से परिणाम और सामाजिक परिस्थिति को और अच्छा करने की दृष्टि से वो क्या कर रहे हैं या क्या उपाय करने चाहिए इसके बारे में भी वो अपने सुझाव यहां पर लेकर आते हैं। वर्तमान में संघ अपने शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ रहा है, इसलिए हालिया प्रतिनिधि सभाओं में संगठन के विस्तार और भावी लक्ष्यों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
RSS के सह-सरकार्यवाह मुकुंद सी.आर. ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा, “यह संघ का शताब्दी वर्ष है। पिछले दो या तीन सालों से, हमारे सभी समर्पित कार्यकर्ता हमारी शाखा गतिविधियों के दायरे को बढ़ाने में सक्रिय रूप से लगे हुए हैं। हमने अपनी भौगोलिक पहुंच में विस्तार देखा है, जिन जगहों पर हम काम करते हैं, उनकी संख्या चार हजार से ज्यादा बढ़ी है और शाखाओं की वास्तविक संख्या पांच हजार से ज्यादा हो गई है। अब, इस शताब्दी वर्ष के दौरान, हमने कई कार्यक्रम और पहलें तय की हैं।”
मुकुंद सी.आर. ने अमेरिका-इजरायल-ईरान संघर्ष के बारे में आगे कहा, “भारत सरकार जो रुख अपनाएगी, वही संघ का भी रुख होगा। यह युद्ध जितनी जल्दी हो सके खत्म होना चाहिए और कोई समझौता होना चाहिए। अभी कल ही, प्रधानमंत्री ने ईरान के प्रमुख से बात की थी। संघ आम तौर पर सभी अंतरराष्ट्रीय मामलों पर बयान जारी नहीं करता है। हालांकि, वहां के स्थानीय समाज के साथ-साथ हिंदू समुदाय के हितों की रक्षा को ध्यान में रखते हुए, हम हमेशा सबसे अच्छे की उम्मीद करते हैं। अभी भी, हम वहां अपने हिंदू संगठनों और संबंधित समूहों के संपर्क में हैं।”
कितने कार्यकर्ताओं के हिस्सा लेने की उम्मीद
इस साल की सभा का संघ शिक्षा वर्ग और अन्य प्रशिक्षण कार्यक्रमों की योजनाओं पर चर्चा करेगा और आने वाले साल के लिए संगठनात्मक रूपरेखा को अंतिम रूप दिया जाएगा। कुल 1489 कार्यकर्ताओं के इसमें भाग लेने की उम्मीद है। इसमें निर्वाचित प्रतिनिधि और राज्य और क्षेत्रीय स्तर के प्रमुख पदाधिकारी शामिल हैं।
100 साल का वैचारिक सफर: शून्य से शतक तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कहानी
घटनाओं, प्रतिक्रियाओं और संवाद की प्रकृति के आधार पर हम किसी समाज की सामूहिक मानसिक उन्नति या अवनति का अनुमान लगा सकते हैं। प्रत्येक समाज के लिए ऐसी परीक्षा की घड़ी एक समयांतर पर आती रहती है। ऐसा ही एक अवसर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष है। संघ 1925 में शून्य से शुरू होकर आज शतक तक पहुंचा है। सिर्फ संघ की आयु अपने आप में महत्त्वपूर्ण नहीं है।
यह वैचारिक लड़ाई का एक अपवादस्वरूप उदाहरण है। भारत की जिस परिभाषा को लेकर इसकी शुरुआत हुई, वह उस समकालीन परिभाषा का प्रतिकार था, जिसके पास सैकड़ों राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रूप से सुविख्यात विचारक थे। इतना ही नहीं, वह वैचारिक धारा दुनिया की मुख्यधारा की सोच से जुड़ी थी।







