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Home राष्ट्रीय

जेनेरिक दवाओं के खिलाफ क्यों हैं डॉक्टर्स?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
August 16, 2023
in राष्ट्रीय
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Ayurvedic medicine
577
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नई दिल्ली : राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) की नई गाइडलाइन का The Indian Medical Association का विरोध कर रहा है. देश में डॉक्टरों की सबसे बड़ी संस्था इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने एक बयान में कहा कि यह “बिना पटरियों के ट्रेन चलाने” जैसा है. जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा देने के लिए किसी भी नीति को लागू करने से पहले दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करनी होगी.

दिशानिर्देश क्या कहते हैं?

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राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग की नई गाइडलाइन के मुताबिक अब सभी डॉक्टरों को जेनेरिक दवाएं लिखनी होंगी, ऐसा न करने पर उन्हें दंडित किया जाएगा. इतना ही नहीं उनका लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है. उदाहरण के लिए उदाहरण के लिए, जब डॉक्टर बुखार के लिए कोई दवा लिखते हैं, तो उन्हें पेरासिटामोल देना होगा, पैनाडोल या कैलपोल जैसी दवाएं नहीं क्योंकि ये पेंटेंट दवाएं हैं. जेनरिक दवाएं पेंटेंट दवाओं के मुकाबले 80 फीसदी तक सस्ती होती हैं.

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन का कहना है कि गुणवत्ता, बाजार में उपलब्धता आदि पर विचार किए बिना इन जेनरिक दवाओं की सिफारिश मरीजों की हेल्थ के साथ खिलवाड़ है. जेनेरिक दवाओं के इस्तेमाल पर केंद्र सरकार की ओर से स्पष्ट गारंटी होनी चाहिए. IMA का कहना है कि नए रूल डॉक्टरों की सलाह के बिना लाए गए हैं और इससे उनकी छवि को नुकसान पहुंच सकता है.

जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता की गारंटी नहीं

भारत में बनीं 0.1 प्रतिशत दवाएं ही ऐसी हैं जो जिनकी क्वालिटी टेस्ट किया जाता है. ये निर्देश मरीजों के हित में नहीं हैं. अगर डॉक्टर्स को ब्रांडेड दवाइयां प्रिस्क्राइब नहीं करनी हैं तो इन्हें अप्रूव ही नहीं किया जाना चाहिए. अगर सरकार जेनरिक दवाओं के इंप्लिटेशन को लेकर गंभीर है तो इन्हें केवल जेनरिक दवाओं का लाइसेंस ही जारी करना चाहिए. डॉक्टर्स का कहना है कि जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता की गारंटी नहीं दी जा सकती है.

आईएमए के पूर्व अध्यक्ष डॉ. जॉनरोज ऑस्टिन जयलाल कहते हैं, “केवल 2% जेनेरिक दवाओं का ही क्वालिटी टेस्ट किया जाता है. और इसी वजह से मैंने अपने जीवन में कभी कोई जेनेरिक दवा नहीं ली.”

भारत दुनिया में जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा प्रोवाइड है. सरकार देश को “फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड” के रूप में प्रमोट करना चाहती है. 2022 में भारत ने £17 बिलियन से ज्यादा जेनेरिक दवाओं का निर्यात किया. इन निर्यातों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रमाणित कुछ बड़ी कंपनियों का वर्चस्व है, लेकिन भारत में हजारों ऐसे छोटे निर्माता हैं जिनके पास क्वालिटी टेस्ट करने के लिए बुनियादी ढांचों का अभाव है.

जेनरिक और पेटेंट दवाओं में अंतर जानिए

आमतौर पर पेटेंट दवाएं महंगी होती हैं जबकि जेनेरिक दवाएं थोड़ी सस्ती मिलती है. एक ही कंपनी जेनेरिक और पेटेंट, दोनों दवाएं बनाती है, लेकिन उनकी कीमतों में काफी अंतर होता है. आम तौर पर सभी दवाओं में एक तरह का ही केमिकल सॉल्ट होता है. जेनेरिक दवाओं का कोई अपना ब्रांड नाम नहीं होता है. जेनेरिक दवाएं जिस सॉल्ट से बनी होती हैं, उसी के नाम से जानी जाती है. जैसे कि पैरासिटामोल अपने सॉल्ट नेम से मार्केट में बेची जाती है. जेनरिक और पेटेंट दवाइयों में मुख्य रूप से ब्रांडिंग, पैकेजिंग, स्वाद और रंगों का अंतर होता है. जब कोई दवाई किसी बड़ी ड्रग कंपनी की ओर से बनाई जाती है तो यह ब्रांडेड या पेटेंट दवाई बन जाती है. जेनरिक दवाइयां इसलिए सस्ती होती हैं क्योंकि यह किसी बड़े ब्रांड की नहीं होती हैं और इनकी मार्केटिंग पर ज्यादा खर्च नहीं आता.

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