नई दिल्ली: दिल्ली विधानसभा चुनाव (Delhi Assembly Elections 2025) में बाजी मारने को लेकर सभी पार्टियां पूरी ताकत से जुटी हुई हैं और इसके लिए वो हर तरह की रणनीति पर काम कर रही हैं. आम आदमी पार्टी (AAP) हो, बीजेपी (BJP) हो या कांग्रेस (Congress), सभी की नजरें दलित मतदाताओं पर टिकी हैं. दिल्ली की राजनीति में दलित एक बड़ा फैक्टर हैं. दलित जिसके साथ होते हैं, उसकी सरकार बननी तय है.
प्रदेश में 12 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं, जबकि 20 सीटों पर इनका दबदबा है. दिल्ली का दलित वोट सरकार बनाने में बड़ी भूमिका निभाता है और यही कारण है कि इन्हें अपने पाले में लाने के लिए तीनों ही पार्टियों ने वादों का पिटारा खोल दिया है. आज आपको डेटा के जरिए बताएंगे कि दिल्ली की सियासत में क्यों दलित वोट बेहद अहम है.
दिल्ली की 70 में से 12 सीटें अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित हैं. वहीं करीब 17% मतदाता दलित हैं. इनमें 38% जाटव हैं और 21% वाल्मीकि समाज से आते हैं.
इस बार दिल्ली में बीजेपी ने 14, कांग्रेस ने 13 और आम आदमी पार्टी ने 12 दलित उम्मीदवार खड़े किए हैं. इसका मतलब है कि बीजेपी और कांग्रेस ने आरक्षित सीटों से ज्यादा दलित प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है, यानी बीजेपी और कांग्रेस ने सामान्य सीटों पर भी दलित उम्मीदवार उतारे हैं.
बीजेपी ने दो दलित उम्मीदवार सामान्य सीट से उतारे हैं. मटिया महल से दीप्ति इंदौरा और बल्लीमारान से कमल बागड़ी. वहीं कांग्रेस ने एक दलित उम्मीदवार अरुणा कुमारी को सामान्य सीट नरेला से उतारा है.
SC सीटों पर जिसका वर्चस्व उसकी सरकार
- 2020 : 12 सीट जीती AAP, सरकार बनाई
- 2015 : 12 सीट जीती AAP, सरकार बनाई
- 2013 : 9 सीट जीती AAP, सरकार बनाई
- 2008 : 9 सीट जीती कांग्रेस, सरकार बनाई
- 2003 : 10 सीट जीती कांग्रेस, सरकार बनाई
- 1998 : 12 सीट जीती कांग्रेस, सरकार बनाई
- 1993 : BJP ने 8 सीट जीती, सरकार बनाई







