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Home राज्य

कांग्रेस को क्यों याद आ रहे धूमल, क्या था वह 2017 का नाटकीय घटनाक्रम?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
November 1, 2022
in राज्य
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प्रेम कुमार धूमल
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हिमाचल विधानसभा चुनाव से ऐन पहले कांग्रेस ने भाजपा के कद्दावर नेता और दो बार के सीएम प्रेम कुमार धूमल का जिक्र करके चुनाव को रोचक बना दिया है। धूमल फेक्टर के साथ कांग्रेस ने भाजपा को घेरने की कोशिश की है। कांग्रेस उम्मीदवार सुखविंदर सिंह खुक्खू ने दावा किया कि भाजपा धूमल को दरकिनार कर चुकी है। उधर, भाजपा भी कोशिश में है कि वह धूमल के साथ 2017 में हुए घटनाक्रम को जनता के बीच गलत संदेश के रूप में न जाने दे। केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर के पिता प्रेम कुमार धूमल भाजपा के उन चुनिंदा नेताओं में हैं जिन्होंने हिमाचल प्रदेश में भाजपा की कई चुनावों में वापसी कराई है। कांग्रेस ने साल 2017 चुनाव के बाद उस नाटकीय घटनाक्रम को फिर सामने रखा है जब सीएम कैंडिडेट घोषित किए जाने के बावजूद धूमल को मुख्यमंत्री पद नहीं दिया गया।

पूर्व पीसीसी चीफ सुखविंदर सिंह इस बार हमीरपुर जिले के नादौन से कांग्रेस उम्मीदवार भी हैं। उनका यह बयान उस वक्त आया है जब 21 अक्टूबर को धूमल के बेटे और केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने हमीरपुर जिले के सुजानपुर देहरा से भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में वोट मांगा और अपने पिता प्रेम कुमार धूमल का जिक्र किया। अनुराग ठाकुर ने कहा, “2017 के परिणाम के बाद, पूर्व मुख्यमंत्री धूमल जी घर पर नहीं बैठे, बल्कि एक सामान्य भाजपा कार्यकर्ता के रूप में काम किया। हमीरपुर संसदीय क्षेत्र से चार बार अपनी जीत हासिल करने के लिए पार्टी कार्यकर्ता जिम्मेदार थे और पिता को दो बार मुख्यमंत्री भी बनाया। मैं ऐसे समर्पित कार्यकर्ताओं को पाकर धन्य हूं।”

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78 वर्षीय प्रेम कुमार धूमल का जिक्र करके कांग्रेस ने 2017 के उस घटनाक्रम को उठाया है जिसमें मतदान से पहले तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने धूमल को सीएम कैंडिडेट घोषित किया था लेकिन, चुनाव के बाद सीएम की कुर्सी जयराम ठाकुर को थमा दी गई। दरअसल, मामला यूं हुआ था कि 2017 में हमीरपुर, मंडी, ऊना और कांगड़ा जैसे महत्वपूर्ण जिलों के साथ भाजपा ने प्रदेश की 68 विधानसभा में से 44 पर जीत हासिल की थी। हालांकि धूमल अपनी सीट हार गए और मंडी से विधानसभा चुनाव जीते जयराम ठाकुर को सीएम बना दिया गया। इस तरह सीएम की कुर्सी हमीरपुर से मंडी ट्रांसफर हो गई।

हिमाचल में राजपूत-ब्राह्मणों का वर्चस्व
हिमाचल प्रदेश की राजनीति में राजपूत और ब्राह्मण समुदायों का वर्चस्व रहा है। धूमल राजपूत समुदाय से ताल्लुक रखते हैं जो हिमाचल के कुल मतदाताओं का 28 फीसदी है। धूमल एक मजबूत राजपूत नेता के तौर पर जाने जाते हैं। वहीं, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगतप्रकाश नड्डा जो ब्राह्मण समुदाय से आते हैं वो भी हिमाचल से ही ताल्लुक रखते हैं। राज्य में ब्राह्मण मतदाता 18 फीसदी है।

उत्तराखंड में किया पर हिमाचल में नहीं
सुखविंदर सिंह सुक्खू ने भाजपा पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया है। कहा, “भाजपा के दो विधायकों ने 2017 में इस्तीफा देने की पेशकश की थी ताकि धूमल जी को सीएम बनाया जा सके लेकिन, भाजपा ने ऐसा नहीं किया और जयराम को सीएम बना दिया। वहीं, उत्तराखंड में चुनाव हारने के बाद पुष्कर सिंह धामी को उपचुनाव में फिर मौका दिया और सीएम बनाया। यह दिखाता है कि भाजपा अपने सिद्धांत का पालन नहीं करती है।”

प्रेम कुमार धूमल खुद क्या कहते हैं
हमीरपुर जिले के समीरपुर गांव में अपने पुश्तैनी घर से राज्य में राजनीतिक घटनाक्रम पर पैनी नजर रखने वाले धूमल ने इस विवाद से खुद को अलग कर लिया है। उन्होंने कहा कि भाजपा ने उनके जैसे साधारण कार्यकर्ता को मुख्यमंत्री बनाया, भले ही उन्होंने 1998 में पहली बार विधानसभा चुनाव जीता था। धूमल को सबसे बड़ी सफलता 1998 में मिली जब वह पूर्व केंद्रीय संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री सुख राम की मदद से वे मुख्यमंत्री बने।

धूमल ने यूं कराई थी भाजपा की वापसी
भाजपा 2003 का विधानसभा चुनाव हार गई थी लेकिन, 2007 में सत्ता में वापस आई। जगत प्रकाश नड्डा, जो अब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, धूमल की 2007 की कैबिनेट में मंत्री थे। लेकिन नड्डा जल्द ही 2010 में भाजपा महासचिव के रूप में राष्ट्रीय राजनीति में चले गए। 2012 के विधानसभा चुनाव से एक साल पहले वरिष्ठ भाजपा नेता महेश्वर सिंह ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के मौन समर्थन के साथ एक नई राजनीतिक पार्टी, हिमाचल लोकहित पार्टी (HLP) बनाई। पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार और भाजपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकार पर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया। कांग्रेस नेता वीरभद्र सिंह को भ्रष्टाचार के आरोपों में केंद्रीय इस्पात मंत्री के रूप में इस्तीफा देने के लिए मजबूर होने के बावजूद कांग्रेस ने 2012 का विधानसभा चुनाव जीता था।

चुनाव नहीं लड़ना चाहते धूमल
इस बार, हालांकि धूमल ने खुद कहा कि उनकी फिर से चुनाव लड़ने की कोई इच्छा नहीं है। उनके कुछ वफादारों ने उनसे ऐसा करने की मांग की थी। उनके वफादार और पूर्व विधायक इंदर सिंह ने कहा, ‘इसका (टिकट से इनकार भी धूमल) राज्य में पार्टी के ‘मिशन रिपीट’ के लक्ष्य पर असर डालेगा। कोई नहीं जानता कि उन्हें (धूमल को) टिकट क्यों नहीं दिया गया। पार्टी ने पहले कहा था कि इस बार उम्र को एक मानदंड के रूप में नहीं माना जाएगा।”

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