नई दिल्ली: दुनियाभर में हर साल 4 फरवरी को विश्व कैंसर दिवस 2026 के रूप में मनाया जाता है। बता दें, यह खास दिन लोगों के बीच वैश्विक कैंसर जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है। बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि भारत में सिर और गर्दन का कैंसर (Head and Neck Cancers) सबसे सामान्य कैंसरों में बने हुए हैं, जिसके पीछे व्यवहारिक, सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक और स्वास्थ्य-प्रणाली से जुड़े कई जटिल कारण जिम्मेदार हैं।
बता दें, कई पश्चिमी देशों में कैंसर के पीछे धूम्रपान को प्रमुख जोखिम कारक माना जाता है, वहीं भारत में कैंसरकारी तत्वों के संपर्क का दायरा अधिक व्यापक है, विशेषकर धूम्रपान रहित तंबाकू और सुपारी (अरेका नट) के सेवन के कारण, जो रोग का बोझ काफी बढ़ाते हैं। फोर्टिस (गुड़गांव) के ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. बी. निरंजन नाइक से जानने की कोशिश करते हैं कि भारतीय लोगों में आखिर क्यों सिर और गर्दन का कैंसर आम हो रहा है।
तंबाकू का अधिक उपयोग
डॉ. बी. निरंजन नाइक कहते हैं कि कैंसर का सबसे बड़ा कारण है तंबाकू का अधिक उपयोग- धूम्रपान (बीड़ी, सिगरेट, हुक्का) और बिना धुएं वाले उत्पाद (गुटखा, खैनी, पान मसाला, जर्दा)। भारत में धूम्रपान रहित तंबाकू उपयोगकर्ताओं की संख्या दुनिया में सबसे अधिक है, और ये उत्पाद मुखगुहा (oral cavity), ग्रसनी (pharynx) और कंठ (larynx) के कैंसर से गहराई से जुड़े हैं। सुपारी, जिसे अक्सर हानिरहित और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य माना जाता है, स्वयं एक प्रमाणित कैंसरकारी पदार्थ है और इसे अकेले या तंबाकू के साथ मिलाकर खूब खाया जाता है। कम उम्र में इसकी शुरुआत और लंबे समय तक आदतन सेवन जोखिम को और बढ़ा देता है।
शराब का सेवन
शराब का सेवन तंबाकू के साथ मिलकर कैंसरकारी प्रभाव को और बढ़ा देता है। दोनों मिलकर श्लेष्मा ऊतकों (mucosal tissues) को नुकसान पहुंचाते हैं। इसके अलावा, खराब मौखिक स्वच्छता, ठीक से फिट न होने वाले दांतों के नकली सेट (dentures), और लंबे समय तक मुंह की अंदरूनी परत में जलन भी कैंसर बनने की प्रक्रिया में योगदान देते हैं। खासकर उन लोगों में जिनकी दंत चिकित्सा सेवाओं तक सीमित पहुंच है।
सामाजिक-आर्थिक असमानताएं
कैंसर के बढ़ते मामलों में सामाजिक-आर्थिक असमानताएं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। भारत में एक बड़ी आबादी ऐसी परिस्थितियों में रहती है जहां कैंसर के जोखिम कारकों के बारे में जागरूकता कम है और स्वास्थ्य सेवाएं न्यूनतम हैं। गरीबी और कम साक्षरता स्वास्थ्य सेवाएं लेने के व्यवहार को सीमित करती हैं, जिससे रोग का पता अक्सर तब चलता है जब कैंसर उन्नत अवस्था में पहुंच चुका होता है। ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी झुग्गियों में रहने वाले लोगों को विशेषज्ञ कैंसर सेवाओं तक पहुंचने में गंभीर बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
पान चबाने की सामाजिक स्वीकृति
सांस्कृतिक प्रथाएं और तंबाकू या पान चबाने की सामाजिक स्वीकृति, यहां तक कि महिलाओं और किशोरों में भी उच्च-जोखिम वाले व्यवहारों को सामान्य बना देती हैं । तंबाकू और सुपारी उद्योगों की आक्रामक मार्केटिंग, जो अक्सर युवाओं को लक्षित करती है, नियामक उपायों के बावजूद खपत को बनाए रखती है।
स्क्रीनिंग और प्रारंभिक पहचान की कमी
स्क्रीनिंग और प्रारंभिक पहचान (early detection) कार्यक्रमों की कमी भी एक अन्य महत्वपूर्ण कारण है। खासतौर पर मुंह का कैंसर, ऐसा कैंसर है, जिन्हें आंखों से देखा जा सकता है और शुरुआती अवस्था में पहचानना आसान है, फिर भी बड़े स्तर पर व्यवस्थित स्क्रीनिंग सीमित है। प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों की कमी और कैंसर केंद्रों का असमान वितरण स्थिति को और गंभीर बनाता है।
डॉ. बी. निरंजन नाइक कहते हैं कि कहा जा सकता है कि भारत में सिर और गर्दन के कैंसर की उच्च दर के पीछे तंबाकू और सुपारी का व्यापक उपयोग, सामाजिक-आर्थिक असमानताए, सांस्कृतिक मान्यताएं, सीमित जागरूकता और रोकथाम व शुरुआती जांच सेवाओं में कमी जैसे कारक जिम्मेदार हैं। इस बोझ को कम करने के लिए मजबूत तंबाकू नियंत्रण, जनजागरूकता, स्कूल आधारित रोकथाम, सुलभ स्क्रीनिंग कार्यक्रम और प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली को सशक्त बनाना आवश्यक है। एक व्यापक, बहु-क्षेत्रीय दृष्टिकोण के माध्यम से ही भारत इन रोके जा सकने वाले कैंसरों की दर को असरदार तरीके से कम कर सकता है।







