नई दिल्ली। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच करीब 21 घंटे तक लंबी शांति वार्ता चली, लेकिन आखिर में कोई समझौता नहीं हो सका. इस बातचीत का मकसद दो हफ्ते के नाजुक युद्धविराम को स्थायी बनाना था. यह 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच सबसे बड़ी सीधी बातचीत मानी जा रही थी. पाकिस्तान इस प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका में था.
दोनों पक्ष अपने रुख पर अड़े रहे
अमेरिका चाहता था कि ईरान यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह बंद करे और परमाणु हथियार न बनाए. ईरान ने इसे ठुकरा दिया और कहा कि उसका कार्यक्रम सिर्फ शांति के लिए है. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी माना कि ईरान उनकी शर्तें मानने को तैयार नहीं था. वहीं ईरान ने अमेरिकी मांगों को ज्यादा और गलत बताया.
बातचीत का माहौल खराब रहा
शांति वार्ता के दौरान डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान को चेतावनी देते रहे कि अगर समझौता नहीं हुआ तो हमले बढ़ेंगे. इससे ईरान को लगा कि यह बातचीत दबाव बनाने के लिए है, जिससे भरोसा और कम हुआ.
लेबनान में हमले जारी रहे
इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने लेबनान में हिज्बुल्लाह पर हमले जारी रखे. ईरान चाहता था कि इन हमलों को रोका जाए, लेकिन अमेरिका और इजराइल ने इसे अलग मुद्दा बताया. इससे बातचीत और उलझ गई.
होर्मुज स्ट्रेट पर टकराव
स्ट्रेट ऑफ होर्मुजसबसे बड़ा विवाद बना रहा. अमेरिका चाहता था कि इसे तुरंत खोला जाए ताकि तेल सप्लाई सामान्य हो सके. वहीं ईरान पहले प्रतिबंध हटाने और सुरक्षा गारंटी की मांग कर रहा था. इस पर कोई सहमति नहीं बन सकी. ईरान होर्मुज पर कंट्रोल छोड़ने के लिए तैयार नहीं था.
दोनों देशों के बीच गहरा अविश्वास
सालों की दुश्मनी, हाल के हमले और अलग-अलग बयानबाजी ने भरोसे को खत्म कर दिया. ईरान को अमेरिका की हर पेशकश पर शक था, वहीं अमेरिका को ईरान की नीयत पर भरोसा नहीं था. इन्हीं कारणों से 21 घंटे की लंबी बातचीत के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला और फिलहाल शांति की उम्मीद अधूरी रह गई.







