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Home राष्ट्रीय

अमेरिका की वजह से क्या रूस को खो देंगे पीएम मोदी?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
June 21, 2023
in राष्ट्रीय, विशेष
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नई दिल्ली : केनेथ जस्टर 2017 से 2021 तक भारत में अमेरिका के राजदूत रहे थे. फरवरी 2022 में केनेथ ने एक भारतीय न्यूज चैनल के प्रोग्राम में कहा था कि भारत नहीं चाहता है कि अमेरिका पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी आक्रामकता के खिलाफ कुछ बोले.

केनेथ जस्टर ने कहा था, ”मोदी सरकार ने कहा था कि भारत और अमेरिका के बीच किसी भी वार्ता में चीन को लेकर बयान में संयम रखा जाए. क्वॉड से जुड़े साझा बयान में भी भारत का यही आग्रह रहता था. भारत इस बात को लेकर चिंतित रहता था कि चीन से सीधी नाराजगी मोल ना ली जाए.”

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जून 2020 में गलवान में जब भारतीय सेना के 20 जवान सरहद की रक्षा में शहीद हुए थे तब अमेरिका ने खुलकर भारत के साथ संवेदना जताई थी. यह काम रूस नहीं कर पाया था जबकि रूस भारत का पारंपरिक दोस्त रहा है. रूस ने बस इतना कहा था कि वह दोनों देशों के बीच बातचीत के जरिए समाधान चाहता है. भारत न तो अमेरिका की संवेदना से सार्वजनिक रूप से खुश हुआ था और न ही रूस की ठंडी प्रतिक्रिया को लेकर नाराजगी जताई थी.

अक्सर ऐसी उम्मीद की जाती है कि चीन को रोकने के लिए भारत अमेरिका के पाले में जा सकता है लेकिन भारत शायद ही इसे स्थायी समाधान के रूप में देखता है.

अमेरिका और भारत के रिश्तों को लेकर छिड़ी बहस

20 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पहली स्टेट विजिट पर अमेरिका पहुंच गए हैं. मोदी को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने स्टेट विजिट के लिए आमंत्रित किया है और इसकी अपनी अहमियत होती है. इससे पहले बाइडन ने फ्रांस और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति को स्टेट विजिट पर बुलाया था. पीएम मोदी अमेरिकी कांग्रेस को भी संबोधित करेंगे और प्रधानमंत्री के रूप में मोदी यह संबोधन दूसरी बार करेंगे.

अमेरिका और भारत में इस गर्मजोशी को कई तरह से देखा जा रहा है. कहा जा रहा है भारत और अमेरिका इतने करीब कभी नहीं थे. प्रधानमंत्री मोदी की स्टेट विजिट के बीच भारत-अमेरिका के रिश्तों को लेकर तमाम विश्लेषकों के बीच बहस भी छिड़ गई है.

थिंक टैंक ‘द हेरिटेज फाउंडेशन’ में एशियन स्टडी सेंटर के निदेशक जेफ एम स्मिथ ने लिखा है, ”अमेरिका के बाकी रणनीतिक सहयोगियों की तुलना में भारत-अमेरिका के बीच मूल्यों का टकराव काफी कम है. भारत अमेरिका के कई पारंपरिक साझेदारों के मुकाबले ज्यादा लोकतांत्रिक और भू-राजनीतिक रूप से ज्यादा अहम है. मुझे नहीं समझ में आता है कि लोगों के मन में भारत को लेकर इतने पूर्वाग्रह क्यों हैं.

जेएफ एम स्मिथ की इस टिप्पणी के जवाब में थिंक टैंक ‘रैंड कॉर्पोरेशन’ में नेशनल सिक्यॉरिटी और इंडो पैसिफिक के एनलिस्ट डेरेक ग्रॉसमैन ने लिखा, ”सही बात है लेकिन अमेरिका के हर सहयोगी को राजकीय डिनर और कांग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधित करने का मौका नहीं दिया जाता है. इसके अलावा, मुझे लगता है कि अमेरिका अपने बाकी सहयोगियों की तुलना में भारत से ज्यादा उम्मीदें लगाए बैठा है. इस नजरिए से देखा जाए तो भारत को लेकर हो रही बहस सही है.

जाने-माने विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी लिखते हैं कि भारत अमेरिका का पिछलग्गू नहीं बनने वाला है. उन्होंने लिखा, “अमेरिका को अपने सहयोगियों से चुनौती मिलने की आदत नहीं रही है. अमेरिका की शीत युद्ध के दौर में मानसिकता रही है कि वह कुछ कहे तो सारे सहयोगी उसकी बात मानें लेकिन भारत के साथ ये नीति नहीं चलेगी. यही वजह है कि अमेरिका का जोर भी भारत के साथ सॉफ्ट एलायंस बनाने पर है.”

भारत को रूस से दूर करना चाहता है अमेरिका?

पीएम मोदी के अमेरिकी दौरे को कई नजरिए से देखा जा रहा है. एक सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या अमेरिका भारत को रूस से दूर करना चाहता है? दूसरा कयास यह लगाया जा रहा है कि अमेरिका चीन के खिलाफ भारत को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है. तीसरी बात यह कही जा रही है कि अमेरिका भारत को हथियार बेचना चाहता है और उसकी नजर भारत के विशाल बाजार पर है. इन तीनों बातों के पीछे ठोस तर्क दिए जा रहे हैं.

थिंक टैंक हडसन इंस्टिट्यूट में इंडिया इनिशिएटिव की निदेशक अपर्णा पांडे ने अमेरिकी पत्रिका फॉरेन पॉलिसी से कहा, “अमेरिका हमेशा से भारत और रूस की रक्षा साझेदारी को लेकर चिंतित रहा है. अमेरिका को पहली बार मौका मिला है कि वह भारत को रोक सके क्योंकि भारत को रूस से रक्षा आपूर्ति में दिक्कतें आ रही हैं. इसके साथ ही रूसी उपकरणों में भी कई खामियां हैं. एक बड़ी वजह ये भी है रूस चीन के करीब जा रहा है. ये सारी बातें शायद भारत को अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ रक्षा साझेदारी बढ़ाने में मदद कर रही है.”

क्या भारत वाकई रूस से दूर होने का मन बना चुका है? पिछले हफ्ते ही भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ‘द इकनॉमिस्ट’ को दिए एक लंबे इंटरव्यू में इस सवाल का जवाब दिया है. विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इंटरव्यू में कहा, “रूस के साथ भारत का रिश्ता 60 सालों के इतिहास का नतीजा है.”

जयशंकर ने कहा कि 60 सालों के रिश्ते में ऐसा नहीं होता है कि एक झटके में चीजें बदल जाएं. हकीकत में ऐसा संभव नहीं है. अमेरिकी प्रशासन और नेतृत्व को भी इन बातों की समझ है. उन्हें पता है कि अमेरिका ने 1965 के बाद फैसला किया था कि वह भारत को हथियार नहीं बेचेगा, जिसके बाद भारत के पास सोवियत संघ के पास जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था. अब ऐसा नहीं हो सकता है कि आपके चुनाव की वजह से हम किसी खास दिशा में जाने पर मजबूर हुए और आप अचानक उसी पर आपत्ति करने लगें. अब ये एक सच्चाई है जिसे आपको स्वीकार करना होगा.

जयशंकर ने कहा, “हालांकि, मैं रूस-यूक्रेन युद्ध के मुद्दे पर भारत के रुख को रूस पर भारत की रक्षा निर्भरता तक सीमित नहीं रखूंगा. ये उससे कहीं ज्यादा जटिल मामला है.”

विदेश मंत्री ने कहा, “हमारे सामने तीन बड़ी यूरेशियन शक्तियां हैं- रूस, चीन और भारत और सबके अपने डायनैमिक्स हैं. ये लेन-देन तक सीमित नहीं है बल्कि ये भू-राजनीतिक है. हम महाशक्तियों के करीब आने या एक-दूसरे से दूर जाने के नतीजों के बारे में बात कर रहे हैं. यूरेशिया में जो कुछ होगा, वो इन तीन देशों के आपसी रिश्तों पर ही निर्भर करेगा. हमारी विदेश नीति का एक मूल सिद्धांत रहा है कि रूस के साथ अच्छे रिश्ते बहुत जरूरी हैं. इसलिए रूस के साथ भारत का रक्षा सहयोग एक अहम पहलू जरूर है लेकिन हमारे लिए रूस का भू-राजनीतिक महत्व ज्यादा बड़ा है.”

जयशंकर ने कहा, “भारत चाहता है कि उसके पास तमाम विकल्प हों और वह अपने लिए सबसे बेहतर चुने.”

जयशंकर ने कहा कि यूक्रेन युद्ध के बाद रूस का ध्यान पश्चिम के बजाय एशिया की ओर बढ़ रहा है. ऐसे में भारत और रूस के बीच सहयोग और बढ़ेगा ही. लेकिन इन सबके बीच भारत और अमेरिका की साझेदारी भी और मजबूत होगी. तो भारत किसी एक दिशा में नहीं चलेगा.

चीन के खिलाफ भारत के साथ खड़ा नहीं होगा रूस

जयशंकर भले रूस के साथ भारत के सुनहरे अतीत के आईने से भविष्य देख रहे हैं लेकिन बदलते वर्ल्ड ऑर्डर में कई विश्लेषकों का मानना है कि रूस के साथ भारत के संबंध अब पहले की तरह नहीं रह सकते. भारतीय मूल के अमेरिकी पत्रकार फरीद जकारिया भी उन्हीं में से एक हैं.

फरीद जकारिया ने करण थापर को दिए इंटरव्यू में कहा है कि चीन के साथ एलएसी पर भारत के साथ हुई हिंसक झड़प के बाद चीजें पूरी तरह से बदल गई हैं. फरीद जकारिया मानते हैं कि यूक्रेन युद्ध के कारण भी रूस के साथ भारत का रहना आसान नहीं है.

फरीद कहते हैं, ”चीन की बढ़ती ताकत और सीमा पर बढ़ती आक्रामकता के बाद भारत का अमेरिका के करीब जाना चौंकाता नहीं है. भारत चीन का सामना रूस के भरोसे नहीं कर सकता. यूक्रेन के साथ रूस की जारी जंग के बाद मॉस्को बीजिंग का जूनियर पार्टनर बन गया है. अब चीन रूस को अपने हिसाब से मोड़ सकता है. फर्ज कीजिए कि सीमा पर चीन के साथ भारत का टकराव बढ़ता है तो रूस की रक्षा आपूर्ति को चीन रोक सकता है. अगर ऐसा हुआ तो भारत क्या करेगा? भारत को अमेरिका के करीब जाने को इस कसौटी पर हमें देखना होगा. दूसरी तरफ, रूस के रक्षा उपकरण कितने प्रभावी हैं, यह यूक्रेन जंग में पता चल गया है. भारत इन उपकरणों के दम पर चीन से नहीं लड़ सकता है. ऐसे में अमेरिका और भारत के बीच स्ट्रैटिजिक पार्टनरशिप का बढ़ना दोनों के हित में है.”

प्रधानमंत्री मोदी के इस दौरे में अमेरिका से रक्षा और एडवांस टेक्नॉलजी को लेकर दो बड़े समझौतों की उम्मीद है. अमेरिका से MQ9B ड्रोन भारत को मिल सकता है और इसके साथ ही भारत में जेट इंजन के उत्पादन की बात चल रही है. फरीद जकारिया मानते हैं कि अगर दोनों डील भारत के साथ हो जाती है तो यह दोनों देशों के संबंधों के लिए लैंडमार्क होगा. ऐसा पहली बार हो रहा है कि अमेरिका भारत को टेक्नॉलजी ट्रांसफर के लिए तैयार हो रहा है.

बात केवल रक्षा समझौतों तक ही सीमित नहीं है. अमेरिका भारत का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है. भारत का अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार 191 अरब डॉलर का हो गया है. भारत का अमेरिका के साथ ट्रेड सरप्लस है.

पिछले वित्तीय वर्ष में भारत का अमेरिका के साथ ट्रेड सरप्लस 28 अरब डॉलर का था. चीन के साथ भी भारत का द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर के पार जा चुका है लेकिन भारत यहां भयानक रूप से व्यापार घाटा का सामना कर रहा है. यूक्रेन जंग के बाद भारत रूस से जमकर तेल खरीद रहा है, फिर भी दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 30 अरब डॉलर के पार ही जा पाया है.

ऐसे में, रूस के अतीत के दम पर भारत अमेरिका की उपेक्षा नहीं कर सकता है. यूक्रेन में जारी युद्ध के बाद से चीन और रूस की बढ़ती करीबी भी भारत के लिए चिंता बढ़ाने वाली है. यूक्रेन जंग के पहले चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति पुतिन की मुलाकात हुई थी. इस मुलाकात के बाद साझे बयान में कहा गया था कि दोनों देशों के संबंधों की कोई सीमा नहीं है. यह बयान अब सच भी होता दिख रहा है. दूसरी तरफ, पीएम मोदी के दौरे से पहले अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवियन ने कहा कि भारत और अमेरिका के संबंध सीमाओं से परे हैं.

चीन की अर्थव्यवस्था को निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था कहा जाता है. चीन दुनिया की फैक्ट्री तभी तक रह सकता है जब तक उसके सामान की मांग दुनिया भर में बनी रहेगी. चीन भी रूस के लिए पश्चिम को छोड़ नहीं सकता है क्योंकि उसके बड़े ट्रेड पार्टनर पश्चिम के ही देश हैं.

उसी तरह भारत शीत युद्ध के दौरान सोवियत यूनियन से बनी वैचारिक करीबी के दम पर रूस के साथ बंधा नहीं रह सकता है. पुतिन को उम्मीद थी कि यूक्रेन के साथ जंग वह कुछ हफ्तों में जीत लेंगे लेकिन यह युद्ध एक साल से ज्यादा वक्त होने के बाद भी जारी है. पुतिन इस युद्ध में खुद फंसे दिख रहे हैं, ऐसे में भारत चीन से युद्ध रूस के भरोसे नहीं जीत सकता है.

रूस हो या अमेरिका, अपना हित देखेगा भारत

हालांकि, रूस भले बदली परिस्थिति में भारत की रक्षा जरूरतें पूरी ना कर पाए लेकिन भारत के लिए उसकी अहमियत इससे आगे भी है. मध्य एशिया और ईरान में भारत की पहुंच रूस के जरिए ही हो सकती है. मध्य एशिया में रूस का खासा प्रभाव है और चीन यहां काफी मजबूत है. ईरान में भी भारत चाबहार पोर्ट बना रहा है और इसमें भी रूस की मदद चाहिए. अफगानिस्तान में अमेरिका अचानक से बोरिया बिस्तर बांध कर निकल चुका है, ऐसे में भारत अपने हितों की रक्षा रूस के जरिए ही कर सकता है.

भारत बार-बार एक बात दोहराता रहा है कि अमेरिका से उसकी दोस्ती रूस के खिलाफ नहीं है और रूस से उसकी दोस्ती अमेरिका के खिलाफ नहीं है. इस बात में सच्चाई भी है. मजबूत भारत न तो रूस के हित में है और ना अमेरिका के हित में. लेकिन एक साथ रूस और अमेरिका को साधना एक जटिल डिप्लोमैसी है और मोदी इस जटिल पिच पर खेलने की कोशिश कर रहे हैं.

 

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