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Home राष्ट्रीय

मानसून सत्र : सरकार छह विधेयकों से साधेगी कामकाज, एक से राजनीति?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
July 21, 2026
in राष्ट्रीय
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loksabha
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नई दिल्ली। संसद का हर सत्र देश का मौजूदा माहौल अपने साथ लेकर सदन में आता है. इस बार भी दोनों पक्षों को भरोसा है कि माहौल उनके पक्ष में है. BJP के आत्मविश्वास की वजह भी है. पश्चिम बंगाल में पार्टी को केंद्र में दोबारा सत्ता में आने के बाद सबसे बड़ी सफलता मिली.

तृणमूल कांग्रेस (TMC) की विधानसभा और संसद दोनों में ताकत घटी है. BJP का मानना है कि उसका सबसे मजबूत क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी अब पहले जितना प्रभावशाली नहीं रहा. वहीं, बाकी विपक्ष भी सहज स्थिति में नहीं है. आम आदमी पार्टी (AAP) चुनावी और संगठनात्मक चुनौतियों से जूझ रही है.

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शिवसेना अब भी दो गुटों में बंटी हुई है और दोनों खुद को असली उत्तराधिकारी बताते हैं. दूसरी ओर, शरद पवार और अजित पवार के फिर साथ आने की चर्चाओं ने INDIA गठबंधन की चिंता बढ़ा दी है क्योंकि अगर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) फिर एक हो जाती है, तो उसके सरकार के साथ बैठने की संभावना है. इन सभी घटनाओं का असर विपक्ष की ताकत पर पड़ता है.

हालांकि विपक्ष की ताकत सिर्फ संख्या से नहीं मापी जाती. INDIA गठबंधन जानता है कि उसकी दूसरी ताकत शोर और आक्रामकता है. कम संख्या वाला विपक्ष अगर हर दिन सरकार को घेरता रहे तो टीवी पर उसकी तस्वीर अलग दिखती है. इसलिए इस सत्र में विपक्ष की पहली कोशिश यह दिखाने की होगी कि संख्या भले घटी हो लेकिन उसका तेवर नहीं बदला है. विपक्ष ने जिन मुद्दों को चुना है, वे वैचारिक नहीं बल्कि प्रशासनिक हैं.

अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी (SP) ने राम जन्मभूमि मंदिर परियोजना में कथित अव्यवस्था का मुद्दा उठाया है और इसे सदन में उठाने की तैयारी है. यह हमला मंदिर पर नहीं, बल्कि उसके प्रबंधन पर केंद्रित है. समाजवादी पार्टी यह सवाल अपेक्षाकृत आसानी से उठा सकती है क्योंकि उस पर मंदिर विरोधी होने का पुराना आरोप लगता रहा है. वह मंदिर के प्रबंधन पर सवाल उठा सकती है, बिना मंदिर के मुद्दे में उलझे. दूसरे विपक्षी दल भी इस रणनीति पर नजर रखेंगे.

इसके अलावा, NEET परीक्षा का मुद्दा है. पेपर लीक और परीक्षाएं रद्द होने से लाखों छात्र प्रभावित हुए, जिसके बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग फिर तेज हो गई. केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के स्टाफ को अचानक हटाया जाना छोटा मुद्दा है लेकिन इससे सरकार के भीतर अव्यवस्था का संकेत मिलता है और विपक्ष इसे भी उठाएगा. इसके साथ बेरोजगारी और महंगाई जैसे पुराने मुद्दे भी बने रहेंगे. विपक्ष की रणनीति सरकार की कार्यक्षमता और उसकी प्रमुख उपलब्धियों पर सवाल खड़े करने की है.

ध्यान देने वाली बात यह है कि इनमें से लगभग कोई भी मुद्दा सरकार के विधायी एजेंडे से जुड़ा नहीं है. इस सत्र की असली लड़ाई विधेयकों पर नहीं, बल्कि स्थगन प्रस्ताव, प्रश्नकाल और सदन के वेल में होगी. सरकार की विधायी रणनीति भी इसी को ध्यान में रखकर बनाई गई है.

संसद का सत्र तय समय के लिए चलता है. किसी विधेयक पर जितना समय लगेगा, उतना समय नियम 267 के तहत चर्चा या किसी मंत्री पर बहस के लिए नहीं मिलेगा. विपक्ष कौन-सा मुद्दा उठाएगा, यह सरकार तय नहीं कर सकती लेकिन कौन-सा विधेयक कब आएगा और उस पर कितना समय लगेगा, यह सरकार तय करती है.

सात विधेयकों में से अधिकांश विवाद से दूर हैं और किसी के लिए संविधान संशोधन जैसी बड़ी संख्या की जरूरत नहीं है. इससे सरकार अपना कामकाज सुचारु रूप से चलाती हुई दिखाई देगी. साथ ही, सभापति के पास नियम 267 के नोटिसों को टालने का आधार भी रहेगा कि सूचीबद्ध काम पहले होना चाहिए.

इसके पीछे एक और राजनीतिक गणित है जो विपक्ष के लिए असहज है. इस संसद में हंगामे से विधेयक रुकते नहीं, बल्कि कई बार और तेजी से पास हो जाते हैं. पहले भी दोनों सदनों में शोर-शराबे के बीच कुछ ही मिनटों में बिना विस्तृत चर्चा के विधेयक पारित हुए हैं. अगर विपक्ष धर्मेंद्र प्रधान के मुद्दे पर प्रश्नकाल नहीं चलने देता तो सरकार उसी माहौल में तकनीकी संशोधन वाले विधेयक भी आसानी से पारित करा सकती है. दोनों पक्ष यह बात जानते हैं. इसलिए विपक्ष को हर दिन यह तय करना होगा कि किसी एक मुद्दे पर पूरा दिन खर्च करना उचित है या नहीं.

अगर सरकार के विधेयकों और विपक्ष के मुद्दों को साथ रखकर देखें, तो यह रणनीति साफ नजर आती है. विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) में प्रस्तावित संशोधन 2014 से चली आ रही नीति का ही विस्तार है. सरकार का तर्क है कि विदेशी धन पर पारदर्शिता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से निगरानी जरूरी है और हर संशोधन के साथ नियम सख्त किए गए हैं.

विपक्ष पहले ही संकेत दे चुका है कि वह इस पर सवाल उठाएगा. FCRA उन नागरिक संगठनों को प्रभावित करता है जो शोध, सर्वे और जनहित याचिकाओं के जरिए रोजगार और कल्याण योजनाओं से जुड़े मुद्दे उठाते हैं. विपक्ष को आशंका है कि संशोधन का समय भी राजनीतिक है. सरकार का जवाब वही है जो पिछले दस वर्षों से रहा है कि उसका उद्देश्य रोक लगाना नहीं, बल्कि पारदर्शिता सुनिश्चित करना है. असली बहस तब होगी जब विधेयक पेश होगा और देखा जाएगा कि गृह मंत्रालय को कितने अधिकार मिलते हैं.

राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान की रोकथाम अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन इस सूची का अपवाद है और जानबूझकर ऐसा रखा गया है. वंदे मातरम को कानूनी संरक्षण देने के लिए किसी नई व्यवस्था की जरूरत नहीं है लेकिन इससे ऐसा राजनीतिक टकराव पैदा होगा, जिसे सरकार चाहती है.

मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्ग लंबे समय से वंदे मातरम गाने से परहेज करते रहे हैं. मुस्लिम संगठनों का कहना है कि जिन पंक्तियों में राष्ट्र को देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया है, वे इस्लामी मान्यताओं से मेल नहीं खातीं. ऐसे मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करने वाले दल इस विधेयक का आसानी से समर्थन नहीं कर पाएंगे और सरकार यह जानती है.

BJP के लिए इस विधेयक का विरोध कोई जोखिम नहीं, बल्कि यही उसका उद्देश्य है. अगर कोई दल राष्ट्रीय गीत को कानूनी संरक्षण देने के खिलाफ वोट देता है तो BJP उस रिकॉर्डेड वोट को भविष्य के चुनावों में इस्तेमाल करेगी. अगर समर्थन देता है तो उसे अपने समर्थकों को जवाब देना होगा, जो पहले से इस पर आपत्ति जताते रहे हैं.

राम मंदिर परियोजना के प्रबंधन पर सवाल उठाने की तैयारी कर रही समाजवादी पार्टी सबसे अधिक दबाव में होगी. उसे एक ही सप्ताह में अयोध्या के प्रबंधन और वंदे मातरम् दोनों मुद्दों का सामना करना पड़ेगा. बाकी छह विधेयक टकराव से बचते हैं लेकिन यह सातवां विधेयक लड़ाई का मैदान खुद तय करता है.

आर्थिक विधेयक सरकार की रक्षात्मक रणनीति का हिस्सा हैं. MSME विकास अधिनियम में संशोधन ऐसे समय लाया जा रहा है, जब भारत खुद को वैश्विक सप्लाई चेन के विकल्प के रूप में पेश कर रहा है. जबकि छोटे उद्योग अब भी भुगतान में देरी, कर्ज की कमी और नियमों की जटिलता की शिकायत करते हैं.

इसमें घरेलू राजनीति भी जुड़ी है. सबसे अधिक रोजगार छोटे और मध्यम उद्योगों से आते हैं इसलिए इनसे जुड़े कानूनों के जरिए सरकार रोजगार की बात कर सकती है. बिना बेरोजगारी के आंकड़ों पर सीधे चर्चा किए. यह उन छोटे कारोबारियों को भी संदेश है, जो नोटबंदी और GST के बाद से लगातार शिकायत करते रहे हैं.

जन्म और मृत्यु पंजीकरण कानून में संशोधन तकनीकी दिखाई देता है और सरकार भी इसे ऐसा ही बताती है. पहचान, कल्याणकारी योजनाओं और वित्तीय समावेशन जैसी डिजिटल व्यवस्थाएं सही पंजीकरण आंकड़ों पर निर्भर करती हैं.

बेहतर रिकॉर्ड से पूरी व्यवस्था मजबूत होती है लेकिन विपक्ष इसे अलग नजरिए से देखता है. ऐसा इसलिए क्योंकि यही रिकॉर्ड मतदाता सूची से भी जुड़े हैं. जनगणना और मतदाता सूची को लेकर पहले से सवाल उठाने वाले दल इस मुद्दे को भी सदन में उठाएंगे. इस विषय पर TMC सबसे मुखर रही है और कम संख्या होने के बावजूद वह इसे फिर उठाएगी.

विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक इस सूची का सबसे रणनीतिक विधेयक है. यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) को आगे बढ़ाते हुए उच्च शिक्षा की संस्थागत व्यवस्था में बदलाव करता है. इसे शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पेश करेंगे, जिनके इस्तीफे की मांग विपक्ष कर रहा है. किसी सुधार संबंधी विधेयक पर चर्चा करते समय मंत्री के पास बोलने का अवसर और तैयार जवाब रहेगा.

इससे वे NEET विवाद के बजाय शिक्षा सुधार पर चर्चा कर सकेंगे. इस विधेयक पर वास्तविक बहस नियुक्ति व्यवस्था और समवर्ती सूची के विषय में राज्यों की भूमिका को लेकर होगी. जबकि राजनीतिक लड़ाई इस बात पर होगी कि धर्मेंद्र प्रधान पूरे सत्र में भारतीय शिक्षा के भविष्य पर चर्चा करते हैं या NEET की विफलता पर.

आयकर संशोधन और सुप्रीम कोर्ट में स्वीकृत न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने वाले विधेयक सामान्य प्रशासनिक प्रकृति के हैं और सरकार की कहानी के अनुरूप हैं. पहला स्थिरता और नियामकीय भरोसे का संकेत देता है. दूसरा न्यायालयों में लंबित मामलों की समस्या को दूर करने की कोशिश के रूप में पेश किया जाएगा और इससे नियुक्तियों का दायरा भी बढ़ेगा. इन दोनों पर ज्यादा विवाद होने की संभावना नहीं है और यही सरकार की मंशा भी है.

सूची में क्या नहीं है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि क्या है. इसमें समान नागरिक संहिता (UCC), चुनाव सुधार या अनुच्छेद 370 जैसे बड़े राजनीतिक मुद्दे शामिल नहीं हैं. BJP पहले भी बड़े बदलाव वाले कानून लाती रही है लेकिन तब जब उसे राजनीतिक रूप से इसकी जरूरत होती है.

पश्चिम बंगाल में सफलता, TMC की कमजोरी, AAP की चुनौतियां, शिवसेना का बंटवारा और NCP के सरकार के करीब आने की संभावनाओं के बाद फिलहाल उसे ऐसी जरूरत नहीं दिखती. ऐसे में छह शांत विधेयकों और एक प्रतीकात्मक टकराव वाले विधेयक की रणनीति उसकी मौजूदा राजनीतिक स्थिति के अनुरूप है.

यह सत्र शांत नहीं रहेगा. विपक्ष अपने मुद्दे उठाएगा, सरकार सामान्य रूप से सदन चलाने की अपील करेगी और टकराव विधेयकों से ज्यादा स्थगन प्रस्तावों, प्रश्नकाल और सदन के वेल में दिखाई देगा. हालांकि, इसमें एक असमानता रहेगी.

विपक्ष शाम की खबरों में अधिक दिखाई देगा, जबकि सरकार कानून बनाने के अपने लक्ष्य पूरे करेगी और एक महत्वपूर्ण रिकॉर्डेड वोट भी अपने पक्ष में दर्ज कराएगी. दोनों पक्ष इसे अपनी सफलता बताएंगे और दोनों अपने-अपने नजरिए से सही होंगे. यह मानसून सत्र इस बात के लिए ज्यादा याद रखा जाएगा कि बहस की दिशा किसने तय की, संसद में अक्सर वही आगे की पूरी लड़ाई तय कर देता है.

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